परमहंस-८०

अपनी विभिन्न उपासनाओं के दौरान हुए अनुभवों के ज़रिये रामकृष्णजी ने अब तक अर्जित किया ज्ञान अब दुनिया को बाँटने का समय आया था। यहाँ से आगे धीरे धीरे उनके शिष्यगणों का ताँता दक्षिणेश्‍वर में लगने लगा, जिनमें से कई लोग आगे चलकर जगन्मान्यता को प्राप्त हुए।

इनमें से कुछ लोग पहले से ही सामाजिक सम्मान प्राप्त किये हुए थे और कोलकाता-बंगाल के समाजजीवन में उनका डंका बज रहा था। इन्हीं में से एक थे – ब्राह्मो समाज के तत्कालीन नेता केशवचंद्र सेन। मानो दो विभिन्न छोर ही हों ऐसे ये दो थे। केशवचंद्रजी पर अँग्रेज़ी शिक्षा का अच्छाख़ासा प्रभाव था; वहीं, रामकृष्णजी की स्कूली शिक्षा भी कुछ ख़ास नहीं हुई थी। केशवचंद्रजी उस समय कोलकाता के सामाजिक जीवन में अपने अमोघ वक्तृत्व के कारण सर्वत्र चमक रहे थे और ख़ासकर कोलकाता के युवावर्ग के लाड़ले वक्ता एवं लेखक छे; वहीं, रामकृष्णजी को भाषणबाज़ी कतई पसन्द नहीं थी। केशवचंद्रजी निर्गुण निराकार ब्रह्म की प्राप्ति को ही अंतिम ध्येय मानकर चल रहे थे; वहीं, अद्वैत साधना के दौरान निराकार ब्रह्म के साथ तादात्म्यता प्राप्त होने के बावजूद भी रामकृष्णजी ने साकार देवतारूपों का त्याग नहीं किया था।

रामकृष्ण परमहंस, इतिहास, अतुलनिय भारत, आध्यात्मिक, भारत, रामकृष्णऐसे कई विरोधाभास होनेवाले इन दोनों की पहली मुलाक़ात मार्च १८७५ में हुई। उस समय केशवचंद्रजी कुछ मूलभूत तात्त्विक मुद्दों को लेकर ब्राह्मो समाज से अलग हो चुके थे और अपना खुद का अलग संप्रदाय शुरू करने की कोशिशों में थे।

‘केशवचंद्रजी को ईश्‍वर के दर्शन हुए हैं’ ऐसे आसपास के गाँवों में चल रहे चर्चे सुनकर रामकृष्णजी उनसे मिलना चाहते थे। केशवचंद्रजी उस समय अपने कुछ ख़ास अनुयायियों के साथ, दक्षिणेश्‍वर से लगभग दो मील की दूरी पर होनेवाले बेलघरिया में जयगोपाल सेन के फार्महाऊस में ठहरे हैं ऐसा रामकृष्णजी को पता चला और रामकृष्णजी हृदय के साथ वहाँ पहुँच गये।

हमेशा की तरह वहाँ पर उपस्थित सभी विचारवंतों की आध्यात्मिक विषय पर गहरी चर्चा चल रही थी। हृदय ने प्राथमिक सूतोवाच करते हुए रामकृष्णजी का परिचय कराया। लेकिन सादी-सी लाल किनार की धोती और क़मीज़ पहने रामकृष्णजी को देखकर केशवचंद्र अथवा वहाँ पर एकत्रित हुए अन्य लोग कुछ ख़ास प्रभावित नहीं हुए।

रामकृष्णजी ने केशवचंद्रजी से पूछा, ‘मैंने ऐसा सुना है कि आपको ईश्‍वर के दर्शन हुए हैं। उसके बारे में मैं जानना चाहता हूँ।’ उसके बाद ‘ईश्‍वर’ इस विषय पर वहाँ जो कुछ संभाषण हुआ, उसमें रामकृष्णजी ने सीधी-सरल भाषा में किये गहरे विवरण ने उपस्थितों के दिलों को छू लिया। रामकृष्णजी के बारे में शुरू में हुआ उनका उदासीन मत पूरी तरह बदल चुका था।

उसके बाद रामकृष्णजी ने, कालीमाता पर रचा एक भजन उत्कटतापूर्वक गाया। दिल से यह भजन गाते समय वे अचानक समाधीअवस्था में गये और स्तब्ध हुए। लेकिन केशवचंद्रजी अथवा उनके अनुयायी इस मार्ग से परिचित न होने के कारण इसके महत्त्व को नहीं जानते थे। लेकिन हृदय ने विशिष्ट पद्धति से ॐकार का जाप रामकृष्णजी के कान में करना शुरू करने के बाद जब धीरे धीरे वे सभान हुए और स्मितहास्य करनेवाला उनका चेहरा अत्यधिक तेजस्वी दिखायी देने लगा; तब उसे देखकर उपस्थित अवाक हो चुके थे।

फिर रामकृष्णजी ने निराकार तथा साकार ईश्‍वर ये मूलतः एक ही कैसे हैं, इस बारे में कुछ उदाहरणों के साथ विवेचन किया। उदा. ‘जब कुछ अँधे लोग हाथी की सूँड़, कान, पैर आदि अवयवों को स्पर्श करते हैं, तब उन्हें हाथी का आकार उस उस अवयव जैसा प्रतीत होता है। वही बात ईश्‍वर के साकार रूपों के बारे में भी कह सकते हैं। जिसे जिस प्रकार की अनुभूति होती है, वैसा ईश्‍वर उसे प्रतीत होता है; जो मूलतः एक ही होता है।’

इस सारे विवरण को सुनते समय केशवचंद्रजी के मन का अहंकार नष्ट होता जा रहा था। जिन्हें उनके संप्रदाय में सर्वोच्च साधकों में से एक माना जाता था, उन्हें – ‘रामकृष्णजी के सामने मैं केवल एक अज्ञानी बालक हूँ’ इसका एहसास हो चुका था। उसके बाद केशवचंद्रजी रामकृष्णजी के चरणों में लीन हो गये थे। वे या तो रामकृष्णजी को अपने घर बुलाते या फिर कभी स्वयं भी दक्षिणेश्‍वर जाते थे। केशवचंद्रजी का बंगाल के सामाजिक दायरे में बहुत ही आदर किया जाता होने के कारण, धीरे धीरे रामकृष्णजी की ख्याति अपने आप ही सर्वत्र फैलने लगी। केशवचंद्रजी के बाद उनके कई अनुयायी भी रामकृष्णजी को गुरु मानने लगे।

इस घटना के एक साल बाद मार्च १८७६ में रामकृष्णजी को मातृशोक हुआ। चंद्रादेवी वैसे बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं और एक के बाद एक हुए निजी पारिवारिक आघातों से उनकी शारीरिक-मानसिक ताकत बहुत ही कम हुई थी; लेकिन आख़िरी कुछ दिन उन्होंने अपनी ज़बरदस्त आध्यात्मिक ताकत के बल पर ही खींचे। आख़िरी तीन दिन रामकृष्णजी नित्यनियम के साथ उनके कमरे में जाकर बैठते थे, उनसे हल्के से गपशप करते थे, उनके मन को आनंदित करनेवालीं यादों को ताज़ा करते थे, उन्हें जो चाहिए वह लाकर दे देते थे। चौथे दिन वे लगभग बेहोशी में ही चली गयीं। उन्हें रामकृष्णजी के कहेनुसार गंगा किनारे ले जाया गया। वहाँ पर रामकृष्णजी ने माँ के चरणों में अंजुली भर फूल अर्पण करके नमस्कार किया और उसी पल चंद्रादेवी के प्राणपँखेरू उड़ गये।

रामकृष्णजी ने अपनी अद्वैतसाधना के समय संन्यास लिया होने के कारण, अपनी माँ के अन्त्यसंस्कार उन्होंने नहीं किये। उनके भतीजे ने – रामलाल ने उस ज़िम्मेदारी को निभाया।

मथुरबाबू के बाद रामकृष्णजी की सेवा की ज़िम्मेदारी अपने कन्धे पर उठानेवाले, उनकी ज़रूरतों का ख़याल रखनेवाले शंभुचरण मलिक का भी इसी दौरान निधन हुआ। वे बहुत दिनों से बीमार थे। रामकृष्णजी नियमित रूप से उनसे मिलने जाते थे, उनका हालचाल पूछते थे। एक दिन उनके यहाँ से घर आते समय रामकृष्णजी ने हृदय से कहा कि ‘शंभु के दीये का तेल ख़त्म हो चुका है।’

….और उसके एक-दो दिनों में ही शंभुचरणजी की मृत्यु हुई।