क्रान्तिगाथा-९०

क्रान्तिगाथा-९०

पराक्रम और बुद्धि की चतुरता के साथ जाँबाज राम्पा लोगों के साथ लडनेवाले अल्लुरि सीताराम राजु को पकडने के बाद भविष्य में क्या होनेवाला है, यह भारतीय बिना बताये ही समझ गये। चिंतापल्लि के जंगल से अल्लुरि सीताराम राजु को गिरफ्तार किया गया। अँग्रेज़ों ने उन्हें बहुत तकलीफे देना शुरू कर दिया। आखिर एक नदी […]

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क्रान्तिगाथा-८९

क्रान्तिगाथा-८९

अल्लुरि सीताराम राजु का जन्म इस आदिम जनजाति में नहीं हुआ था, लेकिन इन लोगों की तकलीफें, दुख और अँग्रेज़ों द्वारा उनका किया जानेवाला शोषण इन सभी बातों को उन्होंने करीब से देखा और उन्होंने राम्पा लोगों मे चेतना जगायी। एक अभूतपूर्व ब्रिटिश विरोधी संषर्घ की शुरुआत हुई। दर असल इन पहाड़ों और जंगलों से […]

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परमहंस-१४६

परमहंस-१४६

इस लेखमाला में हमने रामकृष्णजी के – ‘गदाधर’ से ‘परमहंस’ तक के जीवनप्रवास का अध्ययन करने के प्रयास किए। रामकृष्णजी के दौर में समाज में विभिन्न विचारधाराएँ प्रचलित थीं। ‘ईश्‍वरप्राप्ति यह बहुत ही मुश्किल बात है और आम गृहस्थाश्रमी इन्सान के बस की वह बात हरगिज़ नहीं है’, ‘भक्ति और गृहस्थी ये अलग बातें होकर, […]

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परमहंस-१४५

परमहंस-१४५

बारानगर में रामकृष्ण संप्रदाय के पहले मठ की स्थापना हुई। इस मठ की स्थापना होने में सुरेंद्रनाथजी का अहम सहभाग था। उन्होंने उस घर के किराये की ज़िम्मेदारी तो उठायी ही; साथ ही, उन संन्यस्त गुरुबंधुओं के दैनंदिन खर्चे में भी हिस्सा उठाया। शुरू शुरू में किराये के साथ ३० रुपये प्रतिमाह खर्चे के लिए […]

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क्रान्तिगाथा-८८

क्रान्तिगाथा-८८

दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश में स्थित विझागपटम् के पहाड़ी इलाके में राम्पा नामक आदिम जनजाति सदियों से बस रही थी। कई सदियों से ये लोग आजादी का अनुभव कर रहे थे। अन्य आदिम जनजातियों के तरह ये लोग भी परंपरागत व्यवसाय कर रहे थे। ताड़ के पेड़ का रस जिसे प्रारंभिक अवस्था में नीरा और […]

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परमहंस-१४४

परमहंस-१४४

रामकृष्णजी की महासमाधि के पश्‍चात् उनके शिष्यों को, ख़ासकर नित्यशिष्यों को निराधार होने जैसा प्रतीत हो रहा था। काशीपुरस्थित जिस घर में, जहाँ रामकृष्णजी के आख़िरी कालखण्ड में उनका निवास रहा, उसमे वे अभी भी रह रहे थे, क्योंकि उस घर की नियत अवधि (काँट्रॅक्ट) के कुछ दिन और बाक़ी थे। लेकिन उस कालखण्ड में […]

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परमहंस-१४३

परमहंस-१४३

इस प्रकार १५–१६ अगस्त १८८६ की मध्यरात्रि के बाद रामकृष्णजी ने इस भौतिक विश्‍व से और नश्‍वर देह से बिदा ली थी। ‘ईश्‍वर से नितांत प्रेम करके उसकी प्राप्ति की जा सकती है, जो कि आम इन्सान के लिए भी आसानी से संभव है’ इस तत्त्व को जीवनभर प्रतिपादित करनेवाले रामकृष्णजी के चले जाने से […]

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क्रान्तिगाथा-८७

क्रान्तिगाथा-८७

१८वीं सदी के उत्तरार्ध से यानी कि अँग्रेज़ों का भारत में प्रवेश होने के बाद इन आदिम जनजातियों ने अँग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ना शुरू किया। सन १७७४–७९ में छत्तीसगड की हलबा नामक जनजाति अँग्रेज़ों से लडने के लिए सिद्ध हो गयी। सन १७७८ में छोटा नागपूर के पहारिया सरदार अँग्रेज़ों के खिलाफ़ खड़े हुए। १९वीं […]

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परमहंस-१४२

परमहंस-१४२

रविवार, १५ अगस्त १८८६….श्रावण अमावस का दिन! रामकृष्णजी ने कुछ दिन पूर्व जोगिन से कहकर कॅलेंडर मँगवाया था और उसमें से, अगले कुछ दिनों के लिए हररोज़ की भारतीय तिथियाँ एक एक करके श्रावण अमावस तक ही पूछीं थीं और फिर रूकने के लिए कहा था। ‘वह’ श्रावण अमावस का दिन आया था। सुबह से […]

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परमहंस-१४१

परमहंस-१४१

१८८६ साल धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा – मई….जून…जुलाई! रामकृष्णजी की तबियत में कोई सुधार नहीं था, उल्टी वह ढ़हती ही जा रही थी। उनके इस भौतिक अवतार की समाप्ति नज़दीक आ रही होने का एहसास उनके शिष्यों को हो रहा था। रामकृष्णजी के वियोग की कल्पना हे वे सभी हालाँकि एकान्त में रो पड़ते […]

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