परमहंस-११७

परमहंस-११७

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी के दौर में प्रायः भक्तिमार्गी समाज में होनेवाला प्रमुख विवाद था – निर्गुण निराकार ईश्‍वर सत्य है या सगुण साकार? इनमें से किसी भी एक संकल्पना को माननेवाले कई बार रामकृष्णजी के पास आते थे और रामकृष्णजी अपने तरी़के से, विभिन्न उदाहरण देकर उन्हें समझाते थे। ईश्‍वर मूलतः निर्गुण […]

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क्रान्तिगाथा-७४

क्रान्तिगाथा-७४

विदेशियों की गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ी अपनी मातृभूमि को आज़ाद करने के लिए उसके अनगिनत सपूत दिनरात तड़प रहे थे, दिनरात मेहनत कर रहे थे। भारत के किसी कोने के देहात में रहनेवाला कोई भारतीय हो या किसी शहर में रहनेवाला भारतीय, दोनों की परिस्थिति में चाहे कितना भी फर्क क्यों न हो, मग़र […]

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नेताजी-१७३

नेताजी-१७३

सुभाषबाबू यहाँ बर्लिन में ‘आज़ाद हिन्द सेना’ की भर्ती के लिए दिलोजान से कोशिशें कर रहे थे और वहाँ महायुद्ध के अतिपूर्वीय नये मोरचे पर मानो उनकी भावी कृतियोजना को फ़लित बनाने के लिए ज़मीन ही जोती जा रही थी! ७ दिसम्बर १९४१ को अमरीका के पर्ल हार्बर स्थित शक्तिशाली नौसेना अड्डे को जापान ने […]

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परमहंस-११६

परमहंस-११६

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख एक बार रामकृष्णजी से मिलने आये एक बैरागी से उन्होंने – ‘तुम कैसे भक्ति करते हो’ ऐसा पूछा। उसपर उसने – ‘मैं केवल नामस्मरण करता हूँ, क्योंकि हमारे शास्त्रों द्वारा कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति का वही प्रमुख साधन बताया गया है’ यह जवाब दिया। ‘सच कहा तुमने’ रामकृष्णजी ने कहा, ‘लेकिन […]

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समय की करवट (भाग ७२) – पकड़ने जाओ को काटता है, छोड़ दिया तो भाग जाता है

समय की करवट (भाग ७२) – पकड़ने जाओ को काटता है, छोड़ दिया तो भाग जाता है

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे […]

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नेताजी-१७२

नेताजी-१७२

अ‍ॅनाबर्ग शिविर के भारतीय युद्धबन्दियों के दिल जीतकर, वहाँ की ‘आज़ाद हिन्द सेना’ भर्ती की प्रक्रिया शुरू करवाकर सुभाषबाबू सन्तोषपूर्वक बर्लिन लौट आये। २५ दिसम्बर को १५ लोगों की पहली टुकड़ी को सैनिक़ी प्रशिक्षण के लिए फ़्रॅंकेनबर्ग भेजा गया था। उन्हें क़सरत और युद्ध-अभ्यास के साथ ही, अत्याधुनिक शस्त्र-अस्त्रों को चलाना, आक्रमण एवं बचाव की […]

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परमहंस-११५

परमहंस-११५

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख ईश्‍वरप्राप्ति के लिए श्रद्धावान को चाहिए कि वह शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आदि भावों से ईश्‍वर को देखना सीखें; इन भावों की उत्कटता को बढ़ाएँ। ‘शांत’ भाव – ईश्‍वरप्राप्ति के लिए तपस्या करनेवाले हमारे प्राचीन ऋषि ईश्‍वर के प्रति शांत, निष्काम भाव रखते थे। वे किसी भौतिक सुखोपभोगों के […]

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क्रान्तिगाथा-७३

क्रान्तिगाथा-७३

अँग्रेज़ सरकार ने इस असहकार आंदोलन के मार्गदर्शक महात्मा गाँधीजी को गिरफ़्तार करके उन्हें ६ साल की सज़ा सुनायी। लेकिन आगे चलकर फरवरी १९२४ में स्वास्थ के बिगड़ जाने के कारण उन्हें रिहा किया गया। आख़िर १२ फरवरी १९२२ को इंडियन नॅशनल काँग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर असहकार आंदोलन को स्थगित किये जाने की घोषणा […]

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नेताजी- १७१

नेताजी- १७१

अ‍ॅनाबर्ग शिविर के युद्धबन्दियों के सामने सुभाषबाबू द्वारा इतनी तड़प के साथ ‘आज़ाद हिन्द सेना’ की संकल्पना सुस्पष्ट करने के बावजूद भी युद्धबन्दियों से मिला प्रतिसाद तो ठण्डा ही था। लेकिन ‘ज़िद’ (‘नेव्हर से डाय स्पिरिट’) इस शब्द की साक्षात् मूर्ति ही रहनेवाले सुभाषबाबू हार न मानते हुए अपने ध्येय के साथ अटल रहकर कोशिशों […]

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परमहंस-११४

परमहंस-११४

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी यह कभी नहीं चाहते थे कि उनके शिष्यगण सूखे ज्ञानी – क़िताबी क़ीड़ें बनें। इस कारण – महज़ धार्मिक ग्रंथों के एक के बाद एक पाठ करने की अपेक्षा, उन ग्रन्थों में जो प्रतिपादित किया है उसे जीवन में, अपनी दिनचर्या में उतारने के प्रयास वे करें, ऐसा रामकृष्णजी […]

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