क्रान्तिगाथा-६९

क्रान्तिगाथा-६९

जालियनवाला बाग में घटित इस घटना का भारत में हर एक स्तर पर निषेध ही किया गया। इस हत्याकांड का निषेध करने के लिए रविन्द्रनाथ टागोर ने अँग्रेज़ सरकार के द्वारा उन्हें प्रदान किया गया सर्वोच्च सम्मान (उपाधि) लौटा दी। लेकिन इस घटना से भारतीयों के मन में मातृभूमि को आज़ाद करने के ध्येय की […]

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क्रान्तिगाथा-६८

क्रान्तिगाथा-६८

हालाँकि भारत में सर्वत्र इस अमानुष गोलीबारी की खबर तेज़ी से फैल गयी, लेकिन इंग्लैंड़ में इस घटना की सविस्तार खबर पहुँची, दिसंबर १९१९ में। अँग्रेज़ सरकार को लगा कि अब भारतीय सहम गये होंगे, इसलिए इसके बाद अँग्रेज़ों के खिलाफ बगावत करने से पहले दस बार सोचेंगे। लेकिन अँग्रेज़ों को जल्द ही भारतीयों की […]

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क्रान्तिगाथा-६७

क्रान्तिगाथा-६७

जनरल डायर के आदेश के अनुसार लगभग दस मिनट तक जालियनवाला बाग में उपस्थित जनसमुदाय पर अंधाधुंध गोलियाँ चलायी जा रही थी और वहाँ पर उस वक्त उपस्थित बेगुनाह मासूस बच्चे, महिलाएँ, पुरुष, बडे बूढे सभी अचानक उनपर हुए इस हमले से अपनी जान बचाने के लिए यहाँ वहाँ भाग रहे थे। लेकिन जैसा कि […]

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क्रान्तिगाथा-६६

क्रान्तिगाथा-६६

पूरे भारत के बारे में अँग्रेज़ों के द्वारा जो रवैय्या अपनाया गया था, उसका पूरे भारत में से अब विरोध होने लगा। अब इस समूचे घटनाक्रम में पंजाब प्रान्त से अँग्रेज़ों को हो रहा विरोध दिन ब दिन तेज़ होने लगा था और पंजाब के साथ साथ बंगाल में भी अँग्रेज़ों के खिलाफ जनमत खौल […]

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क्रान्तिगाथा-६५

क्रान्तिगाथा-६५

भारतीयों के द्वारा ‘रौलेट अ‍ॅक्ट’ को ‘काला कानून’ इस नाम से संबोधित किया गया। इसे ‘काला कानून’ इसलिए कहा गया था, क्योंकि वह भारतीयों का सभी प्रकार से अहित करनेवाला था। दरअसल प्रथम विश्‍वयुद्ध के समय लागू किये गये ‘डिफेन्स ऑफ इंडिया अ‍ॅक्ट’ की मियाद इस महायुद्ध के बाद के छः महीने तक ही थी। […]

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क्रान्तिगाथा-६४

क्रान्तिगाथा-६४

प्रथम विश्‍वयुद्ध समाप्त हो गया। इस विश्‍वयुद्ध में अँग्रेज़ सरकार उलझी हुई होने के कारण यहाँ पर भारतीय क्रांतिवीरों की अंग्रेज़ सरकार विरोधी गतिविधियाँ ज़ोर शोर से शुरू हो ही चुकी थी। भारत के बाहर निवास करनेवाले भारतीय, जो शिक्षा या व्यवसाय के कारण वहाँ पर रह रहे थे, वे वहाँ से अपनी मातृभूमि के […]

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क्रान्तिगाथा-६३

क्रान्तिगाथा-६३

गुजरात का खेडा जिला। सूखे के कारण खेतों में फसल ही नहीं हुई थी। सरकारी नियम के अनुसार यदि निर्धारित किये हुए से फसल कम हो जाती है तो लगान में छूट या माफी दी जा सकती थी। खेडा जिले के किसानों के खेतों में सूखे के कारण फसल इतनी कम हुई थी की सरकारी […]

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क्रान्तिगाथा-६२

क्रान्तिगाथा-६२

अब भी गांव-देहातों में रहनेवाले भारतीय कई सुविधाओं-सुधारों से दूर थे। खेती ही अधिकांश देहातों का रोजीरोटी का साधन था। खेती की कमाई पर ही गांव के आम भारतीय अपने परिवार सहित गुजारा करते थे। लेकिन, इसके बावजूद भी कुछ प्रांतों में ‘खेतों में क्या उगाना है’ इसका वहाँ के किसानों को अधिकार नहीं था। […]

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क्रान्तिगाथा-६१

क्रान्तिगाथा-६१

अँग्रेज़ सरकार प्रथम विश्‍वयुद्ध की दौड़-धूप में व्यस्त था। मगर इसके बावजूद भी भारत पर रहनेवाली उनकी पकड़ जरा भी ढिली नहीं पडी थी। दरअसल इस प्रथम विश्‍वयुद्ध की घटना का उपयोग करके उन्होंने भारत में स्थित अपने शासन को अधिक मजबूत करने की दृष्टि से प्रयास किये। इंग्लैंड के प्रथम विश्‍वयुद्ध में शामील हो […]

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क्रान्तिगाथा-६०

क्रान्तिगाथा-६०

कित्तूर यह बहुत बड़ा राज्य नहीं था, मगर फिर भी वैभवशाली राज्य था। कहा जाता है कि वहाँ हिरे, जवाहरातों का व्यापार चलता था। तो ऐसे इस वैभवशाली राज्य पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर नहीं पडती, तो ही आश्‍चर्य की बात थी। जिन अँग्रेज़ों को इस भारत पर अपना एकच्छत्र अमल कायम करना […]

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