क्रान्तिगाथा-९३

क्रान्तिगाथा-९३

अँग्रेज़ों का भारत में आगमन होने से पहले आम भारतीय लोग और भारत के किसी भी प्रांत में बसी आदिम जनजातियाँ एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रह रही थी। आम भारतीयों की जीवनशैली और आदिम जनजातियों के लोगों की जीवनशैली इनमें काफ़ी अंतर था। भारत के जमीनदार, साहूकार इन लोगों के साथ ही इन आदिम जनजातियों […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-९२

क्रान्तिगाथा-९२

अँग्रेज़ों की सेना, उन्हें दिया जानेवाला प्रशिक्षण, उनके शस्त्र-अस्त्र, उनके पास उपलब्ध साधन-सुविधाएँ इनकी अगर आदिम जनजातियों के पास रहनेवाली इन्हीं बातों के साथ तुलना की जाये, तो यकिनन ही ये संघर्ष समान बलवालों में नहीं हुए थे। लेकिन फिर भी कई स्थानों पर अँग्रेज़ों को धूल चटाने में और कुछ समय के लिए ही […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-९१

क्रान्तिगाथा-९१

अँग्रेज़ों के खिलाफ़ भारत की कई आदिम जनजातियों द्वारा किये गये संघर्ष का इतिहास काफ़ी विस्तृत है और बहुत प्रेरणादायी भी है। भले ही अपने जन्मजात अधिकारों पर आँच आने के कारण आदिम जनजातियों के लोग अँग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ने के लिए खड़े हुए, मगर फिर भी उनके संघर्ष का एक पहलु यह भी है […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-९०

क्रान्तिगाथा-९०

पराक्रम और बुद्धि की चतुरता के साथ जाँबाज राम्पा लोगों के साथ लडनेवाले अल्लुरि सीताराम राजु को पकडने के बाद भविष्य में क्या होनेवाला है, यह भारतीय बिना बताये ही समझ गये। चिंतापल्लि के जंगल से अल्लुरि सीताराम राजु को गिरफ्तार किया गया। अँग्रेज़ों ने उन्हें बहुत तकलीफे देना शुरू कर दिया। आखिर एक नदी […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-८९

क्रान्तिगाथा-८९

अल्लुरि सीताराम राजु का जन्म इस आदिम जनजाति में नहीं हुआ था, लेकिन इन लोगों की तकलीफें, दुख और अँग्रेज़ों द्वारा उनका किया जानेवाला शोषण इन सभी बातों को उन्होंने करीब से देखा और उन्होंने राम्पा लोगों मे चेतना जगायी। एक अभूतपूर्व ब्रिटिश विरोधी संषर्घ की शुरुआत हुई। दर असल इन पहाड़ों और जंगलों से […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-८८

क्रान्तिगाथा-८८

दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश में स्थित विझागपटम् के पहाड़ी इलाके में राम्पा नामक आदिम जनजाति सदियों से बस रही थी। कई सदियों से ये लोग आजादी का अनुभव कर रहे थे। अन्य आदिम जनजातियों के तरह ये लोग भी परंपरागत व्यवसाय कर रहे थे। ताड़ के पेड़ का रस जिसे प्रारंभिक अवस्था में नीरा और […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-८७

क्रान्तिगाथा-८७

१८वीं सदी के उत्तरार्ध से यानी कि अँग्रेज़ों का भारत में प्रवेश होने के बाद इन आदिम जनजातियों ने अँग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ना शुरू किया। सन १७७४–७९ में छत्तीसगड की हलबा नामक जनजाति अँग्रेज़ों से लडने के लिए सिद्ध हो गयी। सन १७७८ में छोटा नागपूर के पहारिया सरदार अँग्रेज़ों के खिलाफ़ खड़े हुए। १९वीं […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-८६

क्रान्तिगाथा-८६

दक्षिणी भारत के युवाओं को भारतीय स्वतन्त्रता के लिए सक्रिय करने में सुब्रह्मण्य भारती, व्ही. ओ. चिदंबरम् पिल्लै और सुब्रह्मण्य शिवा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। दक्षिणी भारत के देशभक्तों में गर्व से लिया जानेवाला एक और नाम है-पट्टाभि सीतारामय्या का। आंध्र प्रदेश में १८८० में इनका जन्म हुआ। मद्रास ख्रिश्‍चन कॉलेज में से […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-८५

क्रान्तिगाथा-८५

रेल, तार, डाक जैसी अनेक सुविधाएँ भारत में उपलब्ध हो गयीं। लेकिन उनके शुरू होने की वजह बन गये थे अँग्रेज़। जब भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ‘स्वदेशी’ का आन्दोलन ज़ोर शोर पर था; तब भारत में अनेक स्थित्यन्तरण हुए थे। स्वदेशी का पुरस्कार करते हुए अनेक भारतीयोंने अपने भारतवासी भाईयों के लिए कुछ सुविधाओं की […]

Read More »

क्रान्तिगाथा-८४

क्रान्तिगाथा-८४

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक का जो संघर्षमय काल था, उस काल में भारतीय जनमानस में चेतना को जगाने का काम कई देशभक्तिपर घोषणाओं और गीतों ने किया। ‘वंदे मातरम्’ जैसी देशभक्तिपर घोषणाएँ, ‘जन गण मन’ जैसे देशभक्तिपर गीत हर एक भारतीय को देश के लिए कुछ करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। तमिलनाडु […]

Read More »
1 2 3 10