श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२७)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२७)

हेमाडपंत सद्गुरुकृपा की महिमा लिखते समय कहते हैं – यही है गुरुकृपा की महिमा। कि जहाँ पर न हो रत्ती भर भी नमी। वहाँ पर भी वृक्ष पुष्पित हो उठता है। घना हो उठता है बिना प्रयास के ही॥ उपरोक्त पंक्ति से हमें यही सीख मिलती है कि जहाँ पर बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी, वहाँ […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२६)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२६)

यही है गुरुकृपा की महिमा। कि जहाँ पर न हो रत्ती भर भी नमी। वहाँ पर भी वृक्ष पुष्पित हो उठता है। घना हो उठता है बिना प्रयास के ही॥ हेमाडपंत इस पंक्ति के माध्यम से साई का गुणसंकीर्तन तो कर ही रहे हैं, परन्तु इसके साथ ही वे स्वयं का अनुभव भी दृढ़ विश्‍वास के […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२५)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२५)

मुझे अच्छा लगे या ना लगे। तुम जो चाहते हो वही हो। यही माँग करते हुए। जीभ मेरी न लड़खड़ाने पाये॥ ‘मुझे क्या पसंद है और क्या नापसंद है’ इसकी अपेक्षा ‘मेरे इस साईनाथ को क्या पसंद है और क्या पसंद नहीं है’ यही मेरे लिए अधिक महत्त्व रखता है। मुझे जो पसंद है वह […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२४)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२४)

श्रीसाईनाथ के गुणसंकीर्तन का मार्ग हेमाडपंत ने स्वीकार किया कारण यही साईनाथ की इच्छा थी। श्रद्धावान अपना कर्मस्वातंत्र्य साईनाथ के चरणों में अर्पण कर साईनाथ की इच्छा का, उनके आज्ञा की परतंत्रता स्वीकार करता है, पूर्ण आनंद के सातह क्योंकि उसे इस बात का पूरा विश्‍वास होता है। साईनाथ की परतंत्रता में ही सच्चा सुख […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२३)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२३)

यही है गुरुकृपा की महिमा। कि जहाँ पर न हो रत्ती भर भी नमी। वहाँ पर भी वृक्ष पुष्पित हो उठता है। घना हो उठता है बिना प्रयास के ही॥ हमारा मन शंका-कुशंका, तर्क-कुतर्क, अहंकार, षड्रिपु आदि से इतना अधिक रूक्ष (रूखा) बन चुका होता है कि ऐसे रूक्षस्थान पर भक्ति तो क्या, किसी भी बीज […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२२)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२२)

यही है गुरुकृपा की महिमा। कि जहाँ पर न हो रत्ती भर भी नमी। वहाँ पर भी वृक्ष पुष्पित हो उठता है। घना हो उ़ठता है बिना प्रयास के ही॥ साईनाथ की कृपा की महिमा का वर्णन हेमाडपंत इस तरह कर रहे हैं कि जहाँ पर बीज का अंकुरित होना भी असंभव होता है, वहाँ […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२१)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२१)

मैं तो केवल चरणों का दास। मत कीजिए मुझे उदास। जब तक चल रही है इस देह में साँस। निजकार्य पूरा करवा लीजिए॥ हेमाडपंत इस प्रार्थना के द्वारा बाबा से विनति करते हैं कि जब तक मैं जीवित हूँ मुझसे पुरुषार्थ करवा लीजिए। अकसर हर एक व्यक्ति यही सोचता है कि वह जो करना चाहता […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२०)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२०)

मैं तो केवल चरणों का दास। ना करना मुझे उदास। जब तक इस देह में साँसें चल रही हैं। निजकार्य पूरा करवा लिजिए॥ हेमाडपंत की यह बहुत ही सुंदर ओवी है, जिस में उन्होंने हमें यह समझाया है कि नरजन्म की इतिकर्तव्यता क्या है। ‘जब तक इस देह में श्‍वास है यानी मैं जीवित हूँ, […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१९)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१९)

हेमाडपंत को साईनाथजी से साईबाबा का चरित्र लिखने की अनुमति मिल गयी। बाबा की आज्ञा हेमाडपंत ने सिर आँखों पर रखकर अपना कार्य किया और उनके मन में सदा ही यही भाव था कि यह कार्य काफ़ी क़ठिन है और स्वाभाविक है कि यह कार्य स्वयं साई ही करनेवाले हैं। कहने का तात्पर्य यही है […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१८)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१८)

कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति करने के लिए सामान्य मनुष्य को सब से आसान मार्ग दिया गया है और वह है, ‘सद्गुरु का नामसंकीर्तन एवं भजन करना’। यह बात २७वी ओवी में स्पष्ट करके इसके पश्‍चात् हेमाडपंत श्रीसाईसच्चरितरूपी नामसंकीर्तन के संदर्भ में अपना अनुभव स्पष्ट करते हैं। श्री साईसच्चरित यह और कुछ नहीं बल्कि साईनाथ का नाम-गुण-संकीर्तन […]

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