श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५७

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५७

तृतीय अध्याय में हेमाडपंत अब रोहिले की कथा के बारे में बताना आरंभ करते हैं। आरंभ में वे कहते हैं, शिरडी में आया एक रोहिला। वह भी बाबा के गुणों से मोहित हुआ। वहीं पर काफ़ी दिनों तक रह। प्रेम लुटाता रहा बाबा पर॥ (शिरडीस आला एक रोहिला। तोही बाबांचे गुणांसी मोहिला। तेथेंचि बहुत दिन […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५६

‘मिल जायेगी उसे कोई भी नौकरी। करना है अब उसे मेरी चाकरी। इससे सांसारिक सुखों की प्राप्ती होगी॥ (‘मिळेल मेली तयासी नोकरी। करावी आतां माझी चाकरी। सुख संसारीं लाधेल॥ हेमाडपंत के नौकरी की इस कथा से एक बात मात्र सूर्यप्रकाश के समान ही स्वच्छ एवं स्पष्टरूप में दिखाई देती है कि बाबा का शब्द कभी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५५

बाबा के मधुरवाणी को सुनकर हेमाडपंत ने निश्‍चय किया कि अब इसके आगे नरसेवा त्यागकर गुरुसेवा में ही जीवन व्यतीत करना है। बाबा की आज्ञा सिर आँखों पर (प्रमाण) यही हेमाडपंत का ब्रीदवाक्य था। बाबा ने एक बार कह दिया कि अब नौकरी की, उदरनिर्वाह की चिंता मत करो। अब तुम केवल मेरी ही चाकरी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५४

श्री साईनाथ के नाम-जप में हम इस ॐकार का अवश्य ही सर्वप्रथम उच्चारण करते हैं। पिछले लेख में हमने ॐकार के महत्त्व की जानकारी संक्षिप्त रूप में हासिल की। ॐकार का महत्त्व सभी श्रद्धावान भली-भाँति जानते हैं और इसी लिए ॐकार उच्चारण सभी स्तोत्र, मंत्र, जप आदि के आरंभ में ही करते हैं। गायत्री मंत्र […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

अण्णा चिंचणीकर ने बाबा से कहा कि हेमाडपंत को नौकरी मिल जाए और उनकी घर-गृहस्थी एवं उनकी दैनिक ज़रूरतों की पूर्ति हो सके, इसके लिए आप ही कुछ कीजिए। अण्णा की इस विनती को सुनकर श्रीसाईनाथ ने हेमाडपंत से कहा ‘अब केवल मेरी ही चाकरी करो; मेरा बस्ता रखो, तुम्हारी झोली सदैव भरी ही रहेगी, […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५२

‘‘जिन लोगों का भगवान पर विश्‍वास नहीं, भगवान के न्यायी होने पर विश्‍वास नहीं, जिन्हें कर्म का अटल सिद्धांत मान्य नहीं, ऐसे नीति-न्याय-नियमों की परवाह न करनेवाले दुराचारियों से सर्वप्रथम दूर रहो।’’ ‘जिनका भगवान पर विश्‍वास न हो, जिन्हें कर्म का अटल सिद्धांत मान्य न हो ऐसे नीतिनियमों को ठुकराकर अपनी मनमानी करनेवाले दुराचारियों का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५१

बाबा ने हेमाडपंत से जो कुछ भी कहा, वह हम सभी के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। हमें कोई भी नौकरी-व्यवसाय आदि करते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखना है कि हम साईनाथ के चाकर हैं। इसी लिए कहीं पर भी नौकरी करते समय वहाँ पर पवित्रता है या नहीं, वहाँ पर परमेश्‍वरी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५०

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५०

हम अपनी क्षमतानुसार, अपने सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी व्यवसाय अथवा नौकरी करते हैं, वह तो हमें करना ही है, परन्तु हमें यह याद रखना चाहिए कि हमें किसी की ‘गुलामी’ नहीं करनी चाहिए। यह बात काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। लौकिक तौर पर हम न्याय, नीति, मर्यादा आदि के अनुसार कोई भी पवित्र व्यवसाय, नौकरी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४९

सन १९१६ की गुरुपूर्णिमा के दिन घटित हुई घटना के बारे में हेमाडपंत हमें बता रहे हैं। गुरुपूर्णिमा का दिन होने के कारण स्वाभाविक बात है कि द्वारकामाई में भक्तों की भारी भीड़ थी। अण्णा चिंचणीकर के साथ वहाँ पर हेमाडपंत भी उपस्थित थे और उसी समय अण्णा चिंचणीकर ने हेमाडपंत की समस्या बाबा के […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४८

सन् १९१६ में हेमाडपंतजी सरकारी नौकरी से निवृत्त हो गए और उन्हें पेंशन मिलने लगी, परन्तु गृहस्थी का भार बढ़ जाने से, जो पेंशन उन्हें मिल रही थी, उसमें उनका गुजर-बसर ठीक से नहीं हो रहा था, इसके लिए उपाय ढूँढ़ने में वे सदैव लगे रहते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘जहाँ चाह वहाँ […]

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