श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१९)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१९)

हेमाडपंत को साईनाथजी से साईबाबा का चरित्र लिखने की अनुमति मिल गयी। बाबा की आज्ञा हेमाडपंत ने सिर आँखों पर रखकर अपना कार्य किया और उनके मन में सदा ही यही भाव था कि यह कार्य काफ़ी क़ठिन है और स्वाभाविक है कि यह कार्य स्वयं साई ही करनेवाले हैं। कहने का तात्पर्य यही है […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१८)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१८)

कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति करने के लिए सामान्य मनुष्य को सब से आसान मार्ग दिया गया है और वह है, ‘सद्गुरु का नामसंकीर्तन एवं भजन करना’। यह बात २७वी ओवी में स्पष्ट करके इसके पश्‍चात् हेमाडपंत श्रीसाईसच्चरितरूपी नामसंकीर्तन के संदर्भ में अपना अनुभव स्पष्ट करते हैं। श्री साईसच्चरित यह और कुछ नहीं बल्कि साईनाथ का नाम-गुण-संकीर्तन […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१७)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१७)

कृतयुग में जो प्राप्त होता था ‘ध्यान’ से। त्रेता में ‘यजन’ से, द्वापार में अर्चन से। वह सब प्राप्त होता है ‘नामसंकीर्तन’ से। ‘गुरुभजन’ से कलियुग में। परमात्मा को प्राप्त करने के लिए हर एक युग में विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है। संक्षेप में कहा जाये तो हर युग में परमात्मा की भक्ति […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१६)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१६)

तृतीय अध्याय को हेमाडपंत ने ‘ग्रंथप्रयोजन-अनुज्ञापन’ यह नाम दिया है। ग्रंथप्रयोजन का अर्थ है – ग्रंथ किस कारण से लिखा गया है यानी ग्रंथ लिखने का उद्देश्य। अनुज्ञापन का अर्थ है आज्ञा। ग्रंथ का प्रयोजन स्वाभाविक रूप में यही है कि परमात्मा श्री साई की लीलाओं की, उनकी महिमा की जानकारी हर एक मनुष्य को […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१५)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१५)

साईसच्चरित का अध्ययन कैसे करना चाहिए, साईसच्चरित को जीवन में कैसे उतारना चाहिए, यह तो हमने स्वयं बाबा के ही वचनों में सुना। बाबा के बगैर और कोई भी इस तरह से माँ की ममता से हमें नहीं बता सकता है। श्रवण, मनन एवं निदिध्यास अर्थात चिंतन इन तीनों स्तरों के अनुसार हम श्रीसाईसच्चरित के […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१४)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१४)

कथा कीजिए सादर श्रवण। उस पर कीजिए पूर्ण मनन। मनन पश्‍चात् कीजिए चिंतन। समाधान की प्राप्ति होगी। बाबा के मुख से निकलनेवाला हर एक शब्द हमारे लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। श्रीसाईसच्चरित के ‘साई उवाच’ अर्थात बाबा के मुख से निकले वचनों का संग्रह हम सभी लोगों को करना ही चाहिए और उसे बारंबार पढ़ना भी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१३)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१३)

काल के भी जबड़े में से। निजभक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा। करते ही केवल मत्कथाश्रवण (मेरी कथा का श्रवण)। रोगनिरसन भी हो जायेगा॥ इस गवाही में यह विदित होता है कि साईबाबा की काल पर भी सत्ता है। काल की सत्ता तो सभी पर होती है, फिर भी काल के भी काल होनेवाले […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१२)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१२)

मेरा नाम मेरी ही भक्ति। मेरा बस्ता मेरी ही पोथी। मेरा ध्यान अक्षय चित्त में। विषयस्फूर्ति कैसे वहाँ॥ श्रद्धावान की इच्छा यही रहती है कि ‘साई मेरे और मैं साई का हो जाऊँ’। लेकिन यह होने के लिए जो पाँच बातें महत्त्व रखती हैं, उन्हीं से संबंधित अध्ययन हम कर रहे हैं। हमने भगवान का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-११)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-११)

मेरा नाम मेरी ही भक्ति। मेरा बस्ता मेरी ही पोथी। मेरा ध्यान अक्षय चित्त में। विषयस्फूर्ति कैसे वहाँ॥ हमने अध्ययन किया कि साईराम संपूर्णत: हमारे मन में, हमारे जीवन में ‘कर्ता’ बनकर रहें इसके लिए हमें क्या करना चाहिए। बारंबार इस साईराम को हमारे बाह्य मन से अन्तर्मन की ओर प्रवाहित करते रहना यही हमारा […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१०)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१०)

इस अध्याय के आरंभ में तीन महत्त्वपूर्ण बातों के बारे में हमने अध्ययन किया, साईनाथ ने स्वयं अपने मुख से ये तीनों बातें हम से कही हैं। और उन्हें हमेशा याद रखना हमारे लिए बहुत ज़रूरी है। साई की गवाही, साई के वचन एवं साई का ब्रीद इनके बारे में स्वयं साईनाथ ही हमसे इस […]

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