श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१०)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१०)

इस अध्याय के आरंभ में तीन महत्त्वपूर्ण बातों के बारे में हमने अध्ययन किया, साईनाथ ने स्वयं अपने मुख से ये तीनों बातें हम से कही हैं। और उन्हें हमेशा याद रखना हमारे लिए बहुत ज़रूरी है। साई की गवाही, साई के वचन एवं साई का ब्रीद इनके बारे में स्वयं साईनाथ ही हमसे इस […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०९)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०९)

जो मेरे प्रति अनन्यशरण। विश्‍वासपूर्वक करता है मेरा भजन। मेरा चिंतन, मेरा स्मरण। उसका उद्धार करना है ब्रीद मेरा॥ साईबाबा यहाँ पर अपना स्वयं का ब्रीद हमें बतला रहे हैं। हमें स्वास्थ्य प्रदान करना यह तो डॉक्टर का ब्रीद होता ही है, परन्तु इसके लिए हमें तीन बातों का ध्यान रखना ही पड़ता है। १) […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०८)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०८)

जो मेरे प्रति अनन्य शरण हो जाता है। विश्‍वास के साथ मेरा भजन करता है। मेरा भजन, मेरा ही चिन्तन, मेरा ही स्मरण। उसका उद्धार करना मेरा बिरुद है॥ साईनाथ स्वयं ही अपने स्वयं के बिरुद के बारे में बता रहे हैं। अन्य मार्गों से भक्तिमार्ग यह सहज एवं सरल क्यों है, इस प्रश्‍न का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०७)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०७)

और जो गाये उलटे-सीधे। मेरा चरित्र मेरे पँवाड़े। उन्हीं के आगे-पिछे। चहुँ ओर मैं खड़ा ही रहता हूँ॥ यदि हम सभी भी यही चाहते हैं कि साईनातह मेरे भी आगे-पिछे, चहुँ ओर खड़े ही रहें तो हमें भी बाबा का चरित्र बाबा के पँवाड़े आदि जैसे भी आये उनका गुणगान करते रहना चाहिए। हम यदि […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०६)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०६)

मेरा चरित्र, मेरे पोवाड़े (यशगान)। जो कोई शुद्ध भाव के साथ गायेगा। फिर चाहे उसकी वाणी अशुद्ध भी क्यों न हो। मैं उसके आगे-पीछे, चारों ओर खड़ा ही रहूँगा॥ इस एक छोटी सी ओवी (पद्यरचना) में भावार्थ का अपरंपार संचय है, मथित-अर्थ का अनंत भांडार है। यहाँ पर बाबा जो भरोसा दे रहे हैं, उसका […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०५)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०५)

फिर जो कोई भी गायेगा उलटे-सीधे। मेरा चरित्र, मेरा पँवाड़ा (यशगान)। उसके आगे-पिछे चहुँ ओर। मैं रहूँगा खड़ा॥ ये पंक्तियाँ अर्थात साक्षात् साईनाथ द्वारा दिया गया भरोसा ही है। ये भरोसा हमें बताता है कि मेरी आवाज में कर्कशता है अथवा मधुरता, मैं कथा कहते समय कितने बड़े-बड़े गिने-चुने शब्दों का उच्चारण कर सकता हूँ […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०४)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०४)

मेरा चरित्र, मरे पोवाड़े (यशगान)। जो कोई शुद्ध भाव के साथ गायेगा। फिर चाहे उसकी वाणी अशुद्ध भी क्यों न हो। मैं उसके आगे-पीछे, चारों ओर खड़ा ही रहूँगा॥ यह अभिवचन साईनाथ स्वयं दे रहे हैं। ‘जो कोई भी मेरा चरित्र गायेगा, मेरी लीलाओं का यशगान करेगा, फिर भले ही उसमें उसके उच्चारण अशुद्ध होंगे, […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०३)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०३)

इसी में तुम्हारा कल्याण है। मेरे भी अवतार की सार्थकता है। जो अनन्यरूप से नित्य मेरा ध्यान करता है। उसका ध्यान मैं सदैव रखता ही हूँ॥ साईबाबा ‘निज-दासों का ध्यान मैं रखता ही हूँ’ इस बात की गवाही देते हैं। निज-दासों के योगक्षेम का ध्यान रखने के लिए बाबा सदैव तत्पर हैं ही और वे […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०२)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०२)

ये शब्द आ जाते ही बाबा के होठों पर। उसे ही शुभचिह्न मान लिया। होगा यह चरित्रलेखन अपने आप। मैं तो ठहरा बंधवा मजदूर॥ हेमाडपंत का ‘भक्त’ से ‘दास’ तक का प्रवास बाबा ने किस तरह करवाया, यह तो हम पिछले अध्याय में देख ही चुके हैं। बाबा ने हेमाडपंत को उदी लगाकर, उदी-प्रसाद देकर […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०१)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०१)

पढ़ा हमने गत अध्याय में। दिया संपूर्ण अनुमोदन साई ने। कहा मेरी पूरी अनुमति है। चरित्र-लेखन करने के लिए॥ तृतीय अध्याय के आरंभ में हेमाडपंत हमें द्वितीय के विषय का स्मरण कराते हुए यह बता रहे हैं कि बाबा ने हेमाडपंत को चरित्र-लेखन करने की अनुमति देते हुए कहा, ‘‘मेरी ओर से तुम्हें पूर्णत: अनुमति […]

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