परमहंस-१४६

परमहंस-१४६

इस लेखमाला में हमने रामकृष्णजी के – ‘गदाधर’ से ‘परमहंस’ तक के जीवनप्रवास का अध्ययन करने के प्रयास किए। रामकृष्णजी के दौर में समाज में विभिन्न विचारधाराएँ प्रचलित थीं। ‘ईश्‍वरप्राप्ति यह बहुत ही मुश्किल बात है और आम गृहस्थाश्रमी इन्सान के बस की वह बात हरगिज़ नहीं है’, ‘भक्ति और गृहस्थी ये अलग बातें होकर, […]

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परमहंस-१४५

परमहंस-१४५

बारानगर में रामकृष्ण संप्रदाय के पहले मठ की स्थापना हुई। इस मठ की स्थापना होने में सुरेंद्रनाथजी का अहम सहभाग था। उन्होंने उस घर के किराये की ज़िम्मेदारी तो उठायी ही; साथ ही, उन संन्यस्त गुरुबंधुओं के दैनंदिन खर्चे में भी हिस्सा उठाया। शुरू शुरू में किराये के साथ ३० रुपये प्रतिमाह खर्चे के लिए […]

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परमहंस-१४४

परमहंस-१४४

रामकृष्णजी की महासमाधि के पश्‍चात् उनके शिष्यों को, ख़ासकर नित्यशिष्यों को निराधार होने जैसा प्रतीत हो रहा था। काशीपुरस्थित जिस घर में, जहाँ रामकृष्णजी के आख़िरी कालखण्ड में उनका निवास रहा, उसमे वे अभी भी रह रहे थे, क्योंकि उस घर की नियत अवधि (काँट्रॅक्ट) के कुछ दिन और बाक़ी थे। लेकिन उस कालखण्ड में […]

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परमहंस-१४३

परमहंस-१४३

इस प्रकार १५–१६ अगस्त १८८६ की मध्यरात्रि के बाद रामकृष्णजी ने इस भौतिक विश्‍व से और नश्‍वर देह से बिदा ली थी। ‘ईश्‍वर से नितांत प्रेम करके उसकी प्राप्ति की जा सकती है, जो कि आम इन्सान के लिए भी आसानी से संभव है’ इस तत्त्व को जीवनभर प्रतिपादित करनेवाले रामकृष्णजी के चले जाने से […]

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परमहंस-१४२

परमहंस-१४२

रविवार, १५ अगस्त १८८६….श्रावण अमावस का दिन! रामकृष्णजी ने कुछ दिन पूर्व जोगिन से कहकर कॅलेंडर मँगवाया था और उसमें से, अगले कुछ दिनों के लिए हररोज़ की भारतीय तिथियाँ एक एक करके श्रावण अमावस तक ही पूछीं थीं और फिर रूकने के लिए कहा था। ‘वह’ श्रावण अमावस का दिन आया था। सुबह से […]

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परमहंस-१४१

परमहंस-१४१

१८८६ साल धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा – मई….जून…जुलाई! रामकृष्णजी की तबियत में कोई सुधार नहीं था, उल्टी वह ढ़हती ही जा रही थी। उनके इस भौतिक अवतार की समाप्ति नज़दीक आ रही होने का एहसास उनके शिष्यों को हो रहा था। रामकृष्णजी के वियोग की कल्पना हे वे सभी हालाँकि एकान्त में रो पड़ते […]

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परमहंस-१४०

परमहंस-१४०

इस प्रकार आनेवाले समय के लिए रामकृष्ण संप्रदाय की नींव रामकृष्णजी के जीवन के इस आख़िरी पर्व काशीपुर के वास्तव्य के दौरान रखी गयी। लेकिन रामकृष्णजी का स्वास्थ्य दिनबदिन बिगड़ता ही जा रहा था। बीच में हो थोड़ासा सुकून मिलता था, कि उनके शिष्यवर्ग की उम्मीदें फिर से जाग जातीं थीं; लेकिन यह सुकून अल्प […]

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परमहंस-१३९

परमहंस-१३९

रामकृष्णजी के काशीपुरस्थित वास्तव्य में भविष्यकालीन रामकृष्ण संप्रदाय की नींव रखी गयी। आध्यात्मिक प्रगति करने की एकमेव चाह होनेवाले उनके कुछ पटशिष्य, जिनके मन का रूझान संन्यस्तवृत्ति की ओर था, ऐसे शिष्यों के माध्यम से यह नींव रखी गयी। उनमें से कुछ पटशिष्य – नरेंद्र – आगे चलकर ‘स्वामी विवेकानंद’ नाम से विख्यात। राखाल – […]

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परमहंस-१३८

परमहंस-१३८

काशीपुरस्थित घर में स्थलांतरित होने के बाद भी रामकृष्णजी की बीमारी बढ़ती ही चली गयी। अब उनका शरीर यानी महज़ अस्थिपंजर शेष बचा था। लेकिन उनकी मानसिक स्थिति तो अधिक से अधिक आनंदित होती चली जा रही थी, मानो जैसे बुझने से पहले दीये की ज्योति बड़ी हो जाती है, वैसा ही कुछ हुआ था। […]

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परमहंस-१३७

परमहंस-१३७

इस नये काशीपूरस्थित विशाल फार्महाऊस में अब रामकृष्णजी और उनके शिष्यगण धीरे धीरे नये माहौल से परिचित हो रहे थे। यहाँ पहली मंज़िल पर होनेवाले बड़े हॉल में रामकृष्णजी के निवास का प्रबंध किया गया था और वे वहीं पर, आये हुए भक्तों से मिलते थे। उससे सटे एक छोटे कमरे में, उस उस दिन […]

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