नेताजी- १८०

नेताजी- १८०

२९ मई, १९४२। सुभाषबाबू की हिटलर के साथ होनेवाली उस ऐतिहासिक मुलाक़ात की घड़ी क़रीब आ रही थी। शाम को ठीक ४ बजे, आदिमाता चण्डिका का स्मरण करके सुभाषबाबू ने रास्टेनबर्ग स्थित हिटलर के सेना मुख्यालय के उसके व्यक्तिगत अध्ययन कक्ष में प्रवेश किया। उनके साथ जर्मन विदेशमन्त्री रिबेनट्रॉप, अ‍ॅडम ट्रॉट आदि कुछ गिने-चुने ही […]

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नेताजी-१७९

नेताजी-१७९

आख़िर सुभाषबाबू ने जर्मनी में कदम रखने के दिन से जिस उद्देश्य के लिए दिनरात एक करके मेहनत की थी, वह लक्ष्य उनके सामने आ गया था – तेरह महीनों के लंबे इन्तज़ार के बाद हिटलर ने उनसे मिलने की बात को क़बूल कर लिया और मुलाक़ात का दिन मुक़र्रर किया गया था – २९ […]

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नेताजी- १७८

नेताजी- १७८

भारतीय स्वतन्त्रतासंग्राम के लिए मुसोलिनी का अधिकृत समर्थन प्राप्त करने के कारण, अब जर्मनी से जापान जाकर अगली जंग जारी रखी जाये, यह विचार सुभाषबाबू के मन में ज़ोर पकड़ रहा था। स्वतन्त्रतासंग्राम को निर्णायक पड़ाव तक ले जाने की दृष्टि से, फ़िलहाल जापान में चल रहीं सक्रिय गतिविधियों को मद्देनज़र रखते हुए उनके मन […]

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नेताजी- १७७

नेताजी- १७७

वहाँ जर्मनी में भारतीय मुक्तिसेना बनाने की सुभाषबाबू की कोशिशों को क़ामयाबी मिल रही थी और जापान में भी इसी तरह की कोशिशें चल रही हैं, यह जानने के बाद उनका हौसला बुलन्द हो गया था। इसी दौरान सुभाषबाबू के साथ हुई मुलाक़ात के बाद जापानी राजदूत ने उनके बारे में स्वयं की अनुकूल राय […]

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नेताजी-१७६

नेताजी-१७६

दूसरे विश्‍वयुद्ध के अतिपूर्वीय मोरचे पर सब जगह जापानी सेना की पकड़ मज़बूत होती जा रही थी और अँग्रेज़ी सेना पीछे हट रही थी। जगह जगह से जापानी सेना द्वारा गिऱफ़्तार किये गये ब्रिटीश फ़ौज के भारतीय युद्धबन्दियों को भारतीय मुक्तिसेना में से लड़ने के लिए कॅप्टन मोहनसिंग के हवाले किया जा रहा था। बँकॉक […]

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नेताजी-१७५

नेताजी-१७५

१५ फ़रवरी १९४२ को सिंगापूर की पराजय होने के बाद, जर्मनी में घटित हो रहे धीमे घटनाक्रम की अपेक्षा अब महायुद्ध का पूर्वीय मोरचा सुभाषबाबू को अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत हो रहा था। वैसे भी वे अपनी ‘ओर्लेन्दो मेझोता’ इस विद्यमान पहचान को त्यागकर सही पहचान ज़ाहिर करने के अवसर की ही तलाश में थे। ‘सिंगापूर […]

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नेताजी- १७४

नेताजी- १७४

मलाया के जंगल में अँग्रेज़ों की चौदहवी रेजिमेंट को जापानी सेना द्वारा गिऱफ़्तार किये जाने के बाद उस रेजिमेंट के मेजर मोहनसिंग आदि भारतीय सैनिकों के साथ, उनके ‘भारतीय’ रहने के कारण जापानी सैनिकों द्वारा मैत्रीपूर्ण सुलूक़ किया जा रहा था। वे भारतीय सैनिक ‘एशिया एशियाइयों को लिए’ इस जापान के ध्येय के लिए जापानी […]

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नेताजी-१७३

नेताजी-१७३

सुभाषबाबू यहाँ बर्लिन में ‘आज़ाद हिन्द सेना’ की भर्ती के लिए दिलोजान से कोशिशें कर रहे थे और वहाँ महायुद्ध के अतिपूर्वीय नये मोरचे पर मानो उनकी भावी कृतियोजना को फ़लित बनाने के लिए ज़मीन ही जोती जा रही थी! ७ दिसम्बर १९४१ को अमरीका के पर्ल हार्बर स्थित शक्तिशाली नौसेना अड्डे को जापान ने […]

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नेताजी-१७२

नेताजी-१७२

अ‍ॅनाबर्ग शिविर के भारतीय युद्धबन्दियों के दिल जीतकर, वहाँ की ‘आज़ाद हिन्द सेना’ भर्ती की प्रक्रिया शुरू करवाकर सुभाषबाबू सन्तोषपूर्वक बर्लिन लौट आये। २५ दिसम्बर को १५ लोगों की पहली टुकड़ी को सैनिक़ी प्रशिक्षण के लिए फ़्रॅंकेनबर्ग भेजा गया था। उन्हें क़सरत और युद्ध-अभ्यास के साथ ही, अत्याधुनिक शस्त्र-अस्त्रों को चलाना, आक्रमण एवं बचाव की […]

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नेताजी- १७१

नेताजी- १७१

अ‍ॅनाबर्ग शिविर के युद्धबन्दियों के सामने सुभाषबाबू द्वारा इतनी तड़प के साथ ‘आज़ाद हिन्द सेना’ की संकल्पना सुस्पष्ट करने के बावजूद भी युद्धबन्दियों से मिला प्रतिसाद तो ठण्डा ही था। लेकिन ‘ज़िद’ (‘नेव्हर से डाय स्पिरिट’) इस शब्द की साक्षात् मूर्ति ही रहनेवाले सुभाषबाबू हार न मानते हुए अपने ध्येय के साथ अटल रहकर कोशिशों […]

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