श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०६)

मेरा चरित्र, मेरे पोवाड़े (यशगान)।
जो कोई शुद्ध भाव के साथ गायेगा।
फिर चाहे उसकी वाणी अशुद्ध भी क्यों न हो।
मैं उसके आगे-पीछे, चारों ओर खड़ा ही रहूँगा॥

इस एक छोटी सी ओवी (पद्यरचना) में भावार्थ का अपरंपार संचय है, मथित-अर्थ का अनंत भांडार है। यहाँ पर बाबा जो भरोसा दे रहे हैं, उसका सरलार्थ तो हमने देख लिया, परन्तु इसके साथ ही उस भरोसे का भावार्थ भी हमारे समक्ष काफ़ी कुछ कह जाता है। उलझी हुई मन:स्थिति रखनेवाला मनुष्य भी यदि पश्‍चात्ताप-पूर्वक स्वयं को सुधारने के लिए प्रयत्नशील रहता है और वह श्रीसाईनाथ के चरित्र का गान करता है तो ऐसे व्यक्ति का उद्धार बाबा करते ही हैं। दुष्प्रारब्धपीडित मनुष्य को यहाँ बाबा दिलासा दे रहे हैं। कोई भी मनुष्य यदि मेरा चरित्र सच्चे दिल से गाता है, तो उस व्यक्ति का उद्धार करने के लिए उसके आगे-पीछे, चहूँ ओर मैं खड़ा रहता ही हूँ, यह भरोसा इन पंक्तियों के माध्यम से बाबा दे रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इसके लिए तीन बातें महत्त्व रखती हैं।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई

१) मुझमें बहुत सारी कमियाँ हैं इस बात को कबूल करना।

२) अपनी इन कमियों को लेकर दिन-रात रोने पीटने के बजाय पश्‍चात्तापपूर्वक स्वयं को सुधारने के लिए प्रयासरत होकर साईनाथ की शरण में जाना।

३) बाबा के ही चरित्र का गान करना, बाबा के ही पवाड़े (यशगान) गाना।

इस ओवी के मूल मराठी शब्दों के बारे में अब सोचते हैं।

१) ‘वाडेकोडे’ (उलटे-सीधे) –
मेरा मन, मेरा प्रारब्ध, मेरा आचार-विचार, उच्चार, आहार, विहार आदि सब कुछ उलटा-सीधा ही है। सर्वप्रथम मुझे इस बात को कबूल करना चाहिए। नहीं तो हम अकसर यही मानकर चलते हैं कि मुझ में कोई खामी है ही नहीं। मैं गलत हो ही नहीं सकता। सामनेवाला व्यक्ति ही गलत है। सारी दुनिया ही गलत है इसीलिए वे ही मेरे साथ गलत व्यवहार करते हैं। मेरी कोई भी गलती न होते हुए भी मेरी किस्मत में यह दुष्प्रारब्धभोग क्यों आया है?

आगे चलकर हम परमात्मा को ही दोषी ठहराना शुरु कर देते हैं। अपने-आप को सुधारने की बजाय हम दूसरों को ही गलत साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। दूसरों के सिर पर हम अपना दोष मढ़ते रहते हैं। यदि हम अपनी गलती को मानने की तैयारी ही नहीं रखेंगे तो उसे सुधारने के लिए हमारा पहला कदम भी कैसे उठ पायेगा? इसी लिए हमें सर्वप्रथम श्रीसाईनाथ के समक्ष अपनी गलती, अपनी कमजोरियों को कबूल कर लेना अति आवश्यक होता है।

२) ‘यदि’ –
‘यदि’ ये शब्द काफ़ी महत्त्व रखता है। क्योंकि यह ‘यदि’ शब्द ही हमारे जीवन के अगले प्रवास को गति प्रदान करनेवाला है। हमें अपनी गलती का अहसास हो गया। हमें अपने अंदर की कमियों का अहसास हो गया। परन्तु इन कमियों का अहसास हो जाने पर भी यदि मैं साईनाथ के समक्ष वह कबूल करने की बजाय, बाबा की शरण जाने की बजाय व्यर्थ ही स्वयं को कोसने लगता हूँ, स्वयं को छोटा मानने लगता हूँ, मैं तो कभी सुधर ही नहीं सकूँगा। ‘मेरे अंदर तो सारी बुराइयाँ ही भरी हुई हैं, मेरे उद्धार के लिए कोई रास्ता ही नहीं बाकी रह गया है, मेरा इस दलदल से बाहर निकलना मुमकीन ही नहीं है, इस प्रकार की निराशाओं में ही घिरे रहकर मायूस बने रहेंगे, तो फिर हमारा उद्धार होगा भी कैसे?

इसीलिए इस ‘यदि’ का हमारे जीवन में आना अति आवश्यक है। मुझे अपनी इस गलतियों का अहसास हो जाने पर ‘यदि’ मैं बाबा के समक्ष इस बात को कबूल कर लेता हूँ, मन:पूर्वक पश्‍चात्ताप करता हूँ और इसके लिए प्रायश्‍चित करने की तैयारी रखता हूँ और अपनी गलती को सुधारने के लिए मेरी पूरी तैयारी है ‘तो फिर’ मेरा उद्धार करने के लिए ये साईनाथ सदैव तत्पर रहते ही हैं। ‘मैं कदापि तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा’ इस अपने अभिवचन को वे सच कर दिखलाते हैं। इसके लिए हमारे जीवन में इस ‘यदि’ का आना काफ़ी महत्त्व रखता है।

३) ‘जो गाता है’ –
गलतियों को, अपनी कमजोरियों को कबूल करने पर ये साईनाथ मेरा उद्धार अवश्य करने ही वाले हैं, इस विश्‍वास के साथ जो बाबा का चरित्र, बाबा के पवाड़े (यशगान) आदि गाने लगता है, उसका उद्धार बाबा करते ही हैं। बाबा का चरित्र एवं पवाड़े गाना (यशगान) यानी बाबा के यश का, बाबा के पराक्रम का गान करना। ‘रामो राजमणि: सदा विजयते’ इस सत्य को बारंबार गाना यानी बाबा का, श्री साईराम का चरित्र गाना। बाबा की हर एक लीला यही दर्शाती है कि साईराम ही सदैव विजयी होते हैं। जब मैं श्रीसाईनाथ के निर्मल यश का गुणगान करता हूँ तब मेरे जीवन में भी श्रीसाईराम का यश प्रवाहित होता है और साथ ही दुष्ट प्रारब्धरूपी रावण की हार एवं समूल विनाश भी होता ही है।

तुलसीदासजी हमें हनुमान चलीसा में श्रीराम का यशगान करना अर्थात श्रीराम के पवाड़े गाने का महत्त्व बताते हैं।

श्रीगुरुचरण सरोजरज। निज मन मुकुर सुधारि।

बरनऊ रघुबर बिमल जसु। जो दायकु फल चारि॥

श्रीरघुवीर राम के विमल यश का वर्णन करने से, श्रीराम के पवाड़े गाने से चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं ऐसा तुलसीदासजी यहाँ पर बता रहे हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चारों ही पुरुषार्थ यह सरलार्थ तो है ही यहाँ पर, परन्तु इनके साथ श्रद्धा, सबूरी, विवेक और वैराग्य ये चारों पुरुषार्थ भी इनसे ही संबंधित हैं।

हमें अपने इस साईराम का गुणसंकीर्तन करने से श्रद्धा, सबूरी, विवेक और वैराग्य ये चारों भी तत्त्व प्राप्त होते हैं और यही सर्वोत्तम एवं महत्त्वपूर्ण है। हमें अपने इस अनमने मन को सीधा करके हमारा उद्धार करने के लिए अपने साईनाथ को जीवन में कर्ता एवं बनाने के लिए ये ही चार तत्त्व आवश्यक हैं। हमारे उलटे-सीधे प्रारब्ध के लिए ज़िम्मेदार भी हम ही होते हैं। हमारे उलटे-सीधे कर्म ही हमारे उलटे-सीधे प्रारब्ध को जन्म देते हैं और फिर हमारे नसीब में आता है इसी प्रारब्ध का भोग, जो हमें भुगतना ही पड़ता है। हर कोई यही चाहता है कि उसका जीवन सहज सुंदर बना रहे, परन्तु क्या हम इतने सहज और सुंदर होते हैं? नहीं। क्या हमारा आचार, विचार, आहार, विहार और हमारा मन सरल है? नहीं। फिर हमारा जीवन सरल कैसे होगा?

जो जो जैसा-जैसा करेगा।
वह वह वैसा-वैसा भरेगा॥

बाबा के ये बोल हमें ध्यान में रखने चाहिए, क्योंकि यही हमारे उलटे-सीधेपन के कारण स्पष्ट करने वाले बोल हैं। मनुष्य का मन चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न करें, मग़र फिर भी वह अपने मन को सरल नहीं बना सकता है। मन का यह साँप सदैव रेंगते ही रहता है, इतना ही नहीं बल्कि उलटे-सीधे रेंगने की उसकी आदत ही होती है। इसीलिए तो कहते हैं कि मन बेलगाम घोड़े की तरह होता है। उसे सीधे रास्ते पर ला सकनेवाले केवल ये साईनाथ ही हैं। इसीलिए उलटे-सीधे मन का अहसास होते ही, अपने कृतकर्म का सच्चे दिल से पश्‍चात्ताप करके श्रीसाईनाथ की शरण में जाकर साई के पवाड़े गाना (यशगान) यही सभी प्रकार के संकटों से मुक्त होने का, भय आदि से छूटने का सच्चा राजमार्ग है, जो इन पंक्तियों के द्वारा श्रीसाईनाथ हमें दिखा रहे हैं।

बाबा का चरित्र एवं पवाड़े गाना (यशगान) इसका अर्थ है मन को बाबा के हाथों में सौंप देना। फिर बाबा इस मन को यानी मेरे प्रारब्ध को अर्थात् मुझे सहज सुंदर बना देंगे। दुष्प्रारब्ध का नाश करके मुझे हरिकृपा के प्रांत में ले आयेंगे। अपना मन बाबा को सौंप देना यही उद्धार का सच्चा मार्ग है और इन पंक्तियों के माध्यम से बाबा हम से यही कह रहे हैं।