श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४४

गृहस्थी और परमार्थ को एकसाथ आसानी से सफल बनाया जा सके, हर कोई अपने जीवनविकास का मार्ग सहजता से प्राप्त कर सके इसके लिए सद्गुरु साईनाथजी का सगुण ध्यान सहजता से जिस पथ से हो सकता है, वह पथ है साईनाथजी की कथाओं का मार्ग श्री साईनाथ ने अपने श्रद्धावानों के लिए श्रीसाईसच्चरित के रूप […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४३

भक्तिभाव के साथ कथाएँ पढते ही। सहज साई का ध्यान होगा। सगुण रूप आँखों के समक्ष दिखाई देगा। साई की आकृति चित्त में दृढ़ हो जायेगी॥ अमृत भी जिनके सामने फीका पड जाता है, जो दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करती हैं, जो भवसागर के प्रवास को भी सुकर बनाती हैं, जो पापों के ढेर जलाकर […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४२

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन। प्रेमपूर्वक उनका श्रवण। होगा इससे भक्त-कश्मल-दहन। सरल साधन परमार्थ का॥ ‘क्यों साईबाबा, क्यों किया आपने ऐसा मेरे साथ’ इस तरह के अविश्‍वास भरे उलटे सवाल साईबाबा से पूछते समय हमारी जीभ बिलकुल भी नहीं लड़खड़ाती। बाबा से अपनी इच्छापूर्ति की माँग करते समय हमारी जीभ बिलकुल सी भी नहीं […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४१

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन। प्रेमपूर्वक उनका श्रवण। होगा इससे भक्त-कश्मल-दहन। सरल साधन परमार्थ का॥ बाबा के शुद्ध यश का वर्णन अत्यन्त प्रेमपूर्वक करना और उसी प्रेम के साथ उस गुणसंकीर्तन का श्रवण करना यही सबसे अधिक आसान साधन है। यह साधन भी है और यह साध्य भी है, इसीलिए यह सबसे अधिक आसान […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-४०)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-४०)

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन। प्रेमपूर्वक उनका श्रवण। होगा इससे भक्त-कश्मल-दहन। सरल साधन परमार्थ का॥ हेमाडपंत की यह अप्रतिम पंक्ति हमें परमार्थ के आसान साधन का, सहज सुंदर मार्ग का उपदेश करती है। हर एक भक्त को जो कुछ भी चाहिए होता है, वही ये साईनाथ हमें यहाँ पर दे रहे रहे हैं। हमारे […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३९)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३९)

हमने देखा कि साईनाथ की कथाएँ हमारे लिए कितनी अतुलनीय कार्यकारी हैं। हमारे जीवननौका के भवसागर के प्रवास को रसमय बनाने के लिए ये कथाएँ सभी प्रकार से बाह्य एवं आंतरिक दुर्घटनाओं से हमें सुरक्षित रखती हैं और इसी के साथ हमारे साईनाथ स्वयं नाविक बनकर हमारा प्रेम सहज सुगम बनाते हैं और यह कार्य […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३८)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३८)

साईनाथ की इन कथाओं की मधुरता के सामने अमृत कुछ भी नहीं है। भवसागर के दुष्कर पथ पर भी अपने आप ही इन से सहजता आ जाती है॥ साईनाथ की कथाएँ इतनी अधिक मधुर हैं कि उनके माधुर्य के सामने अमृत भी फीका पड़ जाता है। ये कथायें अमृत को भी पछाड़ देनेवाली हैं। अमृत […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३७)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३७)

असो टाळोनि भंवरे खडक। सागरीं नावा चालाव्या तडक। म्हणोनि जैसे लालभडक। दीप निदर्शक लाविती॥ तैशाचि साईनाथांच्या क था। ज्या गोडीने हिणवितील अमृता। भवसागरींचे दुस्तर पंथा। अति सुतरता आणितील॥ जिस तरह सागरी प्रवास में जहाज पत्थरों से टकराकर टूटने न पाये और वह जल समाधि से भी बच जायें इसीलिए दीपस्तंभ की योजना की जाती है; […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३६)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३६)

साई ही स्वयं लिखने-लिखवाने। भक्त कल्याण हेतु। कैसे बजेगी बंसी या पेटी। बजानेवाला चिंता न करे। यह कला तो उस बजानेवाली की। हम व्यर्थ ही कष्ट क्यों करें। वाद्य से कौनसा सुर निर्माण करना है, कौनसा राग निकालना है, इस बात का विचार वाद्य को नहीं करना होता है, बल्कि उसकी सारी ज़िम्मेदारी वादक के […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३५)

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३५)

साईनाथ, मैं तो केवल चरणों का दास। मत कीजिए मुझे उदास। जब तक है इस देह में साँस। अपना कार्य करवा लीजिए मुझ से॥ हेमाडपंत ने मन:पूर्वक यह माँग साईनाथ से की है। साईनाथ के चरणों का पूर्ण रूप से दास बनने के लिए हेमाडपंत तैयार हैं और इस माँग के अनुसार ही उनके जीवन में सब […]

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