श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६२

जिसे हरिनाम का आलस। बाबा भी रहते उससे दूर। कहते व्यर्थ ही रोहिले को क्यों परेशान करते हो। भजन की आदत जिसे॥ (जयासी हरिनामाचा कंटाळा। बाबा भीती तयाच्या विटाळा। म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा। भजनीं चाळा जयातें॥) रोहिले की कथा के संदर्भ में हमने पिछले भाग में नाम एवं नामस्मरण के संबंध में देखा। परमात्मा का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६१

जिसे हरिनाम का आलस। बाबा भी उनका साथ टालते। कहते क्यों व्यर्थ ही रोहिले को परेशान करते हो। जो भजन में ही रहता व्यस्त॥ (जयासी हरिनामाचा कंटाळा। बाबा भीती तयाच्या विटाळा। म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा। भजनीं चाळा जयातें॥) रोहिले की इस कथा से बाबा एक सबसे बड़ी सच्चाई को, हर एक श्रद्धावान के लिए प्रस्तुत […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६०

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६०

मानव अर्थात बुद्धि, मन एवं शरीर इन तीनों का संयोग। मन एवं बुद्धि ये दो तत्त्व हरएक मनुष्य के पास होता ही है। बुद्धिी, मन एवं शरीर का यह त्रैराशिक मानव का जीवन चलाते रहता है मात्र मानव का मन चलाने में मन एवं बुद्धी ये दोनों की जोड़ी (ही द्वयी) अगुआई (अग्रेसर) होती हैं। […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५९

यहाँ पर हेमाडपंत रोहिले की कथा सुनाते हैं। जिसके बारे में संक्षिप्त जानकारी हमने पिछले लेख में हासिल की। परन्तु हेमाडपंत यहाँ पर स्पष्टरूप में बता रहे हैं कि बाबा को ग्रामवासियों की खोखली शिकायतों एवं बेवजह के क्लेश की अपेक्षा नामजप अधिक प्रिय है। अर्थात बाबा को नाम सर्वाधिक प्रिय है। तात्पर्य यह है […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५८

शिरडी के ग्रामवासियोंद्वारा बाबा के पास रोहिले के संबंध में की गई शिकायत की ओर बाबा ने अनदेखा कर दिया और बाबा उन ग्रामवासियों को रोहिले की कथा सुनने लगे। इसीके कथा माध्यम से बाबा ने उन्हें यह बताया कि रोहिला उन्हें प्रिय क्यों है। अब बाबा उन ग्रामवासियों को रोहिले की कथा सुनाने लगे। […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५७

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५७

तृतीय अध्याय में हेमाडपंत अब रोहिले की कथा के बारे में बताना आरंभ करते हैं। आरंभ में वे कहते हैं, शिरडी में आया एक रोहिला। वह भी बाबा के गुणों से मोहित हुआ। वहीं पर काफ़ी दिनों तक रह। प्रेम लुटाता रहा बाबा पर॥ (शिरडीस आला एक रोहिला। तोही बाबांचे गुणांसी मोहिला। तेथेंचि बहुत दिन […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५६

‘मिल जायेगी उसे कोई भी नौकरी। करना है अब उसे मेरी चाकरी। इससे सांसारिक सुखों की प्राप्ती होगी॥ (‘मिळेल मेली तयासी नोकरी। करावी आतां माझी चाकरी। सुख संसारीं लाधेल॥ हेमाडपंत के नौकरी की इस कथा से एक बात मात्र सूर्यप्रकाश के समान ही स्वच्छ एवं स्पष्टरूप में दिखाई देती है कि बाबा का शब्द कभी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५५

बाबा के मधुरवाणी को सुनकर हेमाडपंत ने निश्‍चय किया कि अब इसके आगे नरसेवा त्यागकर गुरुसेवा में ही जीवन व्यतीत करना है। बाबा की आज्ञा सिर आँखों पर (प्रमाण) यही हेमाडपंत का ब्रीदवाक्य था। बाबा ने एक बार कह दिया कि अब नौकरी की, उदरनिर्वाह की चिंता मत करो। अब तुम केवल मेरी ही चाकरी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५४

श्री साईनाथ के नाम-जप में हम इस ॐकार का अवश्य ही सर्वप्रथम उच्चारण करते हैं। पिछले लेख में हमने ॐकार के महत्त्व की जानकारी संक्षिप्त रूप में हासिल की। ॐकार का महत्त्व सभी श्रद्धावान भली-भाँति जानते हैं और इसी लिए ॐकार उच्चारण सभी स्तोत्र, मंत्र, जप आदि के आरंभ में ही करते हैं। गायत्री मंत्र […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

अण्णा चिंचणीकर ने बाबा से कहा कि हेमाडपंत को नौकरी मिल जाए और उनकी घर-गृहस्थी एवं उनकी दैनिक ज़रूरतों की पूर्ति हो सके, इसके लिए आप ही कुछ कीजिए। अण्णा की इस विनती को सुनकर श्रीसाईनाथ ने हेमाडपंत से कहा ‘अब केवल मेरी ही चाकरी करो; मेरा बस्ता रखो, तुम्हारी झोली सदैव भरी ही रहेगी, […]

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