श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-४०)

तात्यासाहब की बात सुनते ही तुरंत (तेज़ी से)। दौड़ पड़ा मैं वहाँ बाबा थे जहाँ।
चरणधूलि में लोटांगण किया। आनंद न समा रहा था मन में॥

कल हमने हेमाडपंत के प्रथम शिरडीगमन में हुई श्रीसाईनाथ की चरणधूल भेट वाले प्रसंग के बारे में अध्ययन करते हुए तीन बातों पर प्रकाश डाला। सुनना, तेज़ी (उत्कटता) एवं दौड़ पड़ना इन तीन क्रियाओं का अध्ययन किया। आज हम अंतिम अर्थात चौथी परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण क्रिया पर प्रकाश डालेंगे। यह चौथी क्रिया है- ‘साईचरणधूल में ही लोटांगण किया साई के चरणों पर’। ये चारों क्रिया मिलकर जो बनता है वह है एक श्रद्धावान का भगवान की दिशा में उठाया गया पहला कदम।

श्रीसाईनाथ की चरणधूल

हम अकसर ऐसा कहते हैं कि एक भक्त का भगवान की दिशा में उठाया गया पहला कदम काफ़ी महत्त्वपूर्ण होता है। भक्त के पहला कदम उठाते ही भगवान सौ कदम चलकर उसकी दिशा में आ पहुँचता है। यहाँ पर हेमाडपंत के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इन चारों बातों को मिलाकर बननेवाला पहला कदम हेमाडपंत ने उठाते ही साईनाथ ने अनंत कदमों द्वारा उन के संपूर्ण जीवन को ही व्याप्त कर लिया। भगवान सौ कदमों के फ़ासले को भी काँटते हुए भक्त के पास आ पहुँचता है अर्थात वे अपने उस श्रद्धावान के संपूर्ण जीवन का ही कर्ता बनकर उसके पूरे जीवन को ही पादाक्रमित कर देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान के चरणों के चिह्न मेरे जीवन में अंकित होते ही उनके पदस्पर्श से संपूर्ण जीवन ही धन्य हो जाता है।

हमें भी इस प्रथम कदम को उठाना चाहिए। मेरे भगवान आये हैं इस बात का पता चलते ही मुझे प्रथम कदम उनकी दिशा में बढ़ाना चाहिए। हमें हेमाडपंत के आचरण से ‘इस पहले कदम को भक्त को कैसे उठाना चाहिए’ इस बात का स्पष्ट मार्गदर्शन होता है। इस पहले कदम में अन्तर्भूत रहनेवाली सबसे अधिक सुंदर बात जो है उसके बारे में आज हम चर्चा करेंगे।

४) साई की चरण-धूली में ही लोटकर साईचरणों पर किया लोटांगण –

मेरे भगवान साई आये हैं, यह मैंने सुना। यह सुनते ही बाकी सभी चीज़ों को गौण मानकर ‘मेरे ये साईनाथ ही सर्वप्रथम हैं’, इसी प्राथमिकता (प्रायॉरिटी) को ध्यान में रखकर तेज़ी से दौड़ते हुए मन का रूझान बाबा के ओर होने के कारण ‘कब एक बार मेरे भगवान मुझसे मिलते हैं’ ऐसी उत्कटता मुझमें निर्माण हो गई तथा इस उत्कट इच्छा को तत्काल ही क्रिया का साथ मिल गया अर्थात मैं उस दिशा में दौड़ पड़ा।

मैं जब दौड़ पड़ता हूँ, उसी क्षण मुझे पता चलता है कि भक्तों के लिए स्वयं भगवान ही दौड़ते हुए आकर अपने भक्त के समक्ष खड़े हो जाते हैं। भक्त की अपेक्षा भगवान का भक्त से अधिक प्रेम होता है। तो फ़िर ऐसे इस भगवान को देखते ही क्या करना चाहिए, यही बात हेमाडपंत यहाँ पर अपने स्वयं के आचरण के द्वारा स्पष्ट रूप में दर्शा रहे हैं।

साई की चरण-धूली में ही लोटकर साईचरणों पर किया लोटांगण।

पंढरपुर की वारी में इस लोटांगण को हम देख सकते हैं। पंढरपूर के चन्द्रभागातट पर के रेतीले प्रदेश में विठ्ठल के नामघोष में, गुणसंकीर्तन में दंग हरिभक्त एक-दूसरे को लोटांगण करते हैं। ना कोई बड़ा ना कोई छोटा,यही उनका इस क्रिया के पीछे का भाव रहता है। हर किसी के हृदय में पंढरी के विठोबा ही हैं, इस भाव को मन में रखकर सभी लोग लोटांगण करते रहते हैं। वह लोटांगण मनुष्य के द्वारा मनुष्य को किया जानेवाला लोटांगण नहीं होता है, बल्कि प्रेम से प्रेम को किया जानेवाले लोटांगण होता है। इसके साथ ही विठ्ठल की चरणधूली में लोटांगण करने का भाव भी इन यात्रियों के इस लोटांगण में होता है। इन यात्रियों का, वारकरियों का ऐसा भाव होता है कि ये विठ्ठल अपने भक्तों के संग इस चंद्रभागा के किनारे होनेवाले रेतीले स्थल में नाच रहे हैं, डोल रहे हैं। अर्थात इस मरूस्थल का हर एक कण इस विठ्ठल के पदस्पर्श के कारण उनकी चरणधूल बन चुका है। इसीलिए मेरे अपने इस विठ्ठल की चरणधूल में मैं लोटता ही रहूँगा, यही इन यात्रियों का भोला भाव होता है, उनकी मासूमियत होती है और यह भोलाभाव ही सर्वश्रेष्ठ होता है।

हम जब स्वयं लोटांगण करते हैं, उसी समय हमें क्या प्राप्त होता है, इस बात का पता चल जाता है। भगवान के सामने लोटांगण करने से हमें अपने विकास के लिए जिस जिस चीज की आवश्यकता होती है वह सब कुछ हमें लोटांगण करने से प्राप्त हो जाता है। लोटांगण इस स्थिति में जो कोई भी भगवान का नामस्मरण करके, ‘अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम’ इस भाव के साथ भगवान की शरण में जाता है, उसका बेड़ा पार हो जाता है। लोटांगण यदि कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व देता है तो वह है पूर्ण शारण्य, पूर्ण मर्यादाशीलता। जप-तप, उपवास-व्रत आदि कठिन उपायों द्वारा प्राप्त करने में जिसे काफ़ी समय लगता है, वहीं शारण्य लोटांगण से तत्काल ही प्राप्त हो जाता है। केवल शारण्यभाव से प्राप्त होनेवाली इस संपदा को हमें संभालकर रखना चाहिए।

मान लीजिए कि हम सामान्य मनुष्य होने के कारण लोटांगण करते समय अपने सर्वस्व को अर्पण करने का भाव मन में नहीं ला सकते हैं और लोटांगण से प्राप्त जो कुछ भी होता है उसे संभालकर भी नहीं रख सकते हैं। कोई बात नहीं। सद्गुरु इन सब बातों का ध्यान रखेंगे, यह विश्‍वास होना चाहिए। हम जब कभी भी गुरुवार के दिन दर्शन हेतु अथवा उपासना हेतु हमारे सद्गुरु के पास, हमारे साईनाथ के पास जाते हैं उस समय लोटांगण करते समय मेरे कपड़े खराब हो जायेंगे अथवा कोई कुछ कहता है ये सारी बातें इसके आड़े नहीं आनी चाहिए।

भगवान की चरणधूल यहीं सर्वोत्तम कवच है और यही एकमात्र अभेद्य शाश्‍वत कवच है। इस चरणधूली के कवच की विशेषता यह है कि अन्य कवच हमें स्वयं पहनने पड़ते हैं, उनके फ़ट जाने पर, टूट जाने पर उन्हें बदलना पड़ता है, परन्तु भगवान की चरणधूली का कवच यह अभेद्य शाश्‍वत अक्षय कवच है।

इसकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
१) भगवान की चरणधूली का यह कवच स्वयं ही हमारे चारों ओर एवं हमारे शरीर के हर एक घटक के चारों ओर ‘मज़बूती’ से जमकर स्थिर रहता है।

२) यह कभी भी अशुभ, अपवित्र स्पंदनों को हमारे शरीर में प्रवेश नहीं करने देता है और साथ ही हमारे शरीर में पहले से रहनेवाली सभी अनुचित चीजों को नष्ट कर देता है।

३) यह कभी भी घिसता नहीं है, ना ही फ़टता है और ना ही इसे कभी बदलना पड़ता है।

४) इस कवच के आगे कोई भी एवं कितनी भी बड़ी बुरी शक्ति सदैव निष्प्रभ हो जाती है, कोई भी राक्षस, दुराचारी मेरा बाल तक बाँका नहीं कर सकता।

५) ये मुझे कभी भी अंधकार के रास्ते पर नहीं जाने देता।

६) ये कवच मेरे जीवन में हरिकृपा प्रवाहित करनेवाले सभी मार्ग (channels) खोल देता है और मन के सभी उचित बीजों को अंकुरित करके बुरे बीजों को जला देता है।

७) यह कवच महज़ इसी जन्म में ही नहीं बल्कि मेरे अगले जन्म में तथा मृत्यु पश्‍चात् पुन: जन्म होने तक की अवधि में भी मेरी सुरक्षा करता है।

८) यह कवच मुझे कभी भी किसी भी बात की कमी नहीं पड़ने देता, मुझ पर चाहे कितना भी बड़ा संकट क्यों न आ जाये, मग़र फ़िर भी उसमें से सही सलामत बाहर निकलने में मेरी सहायता करता है और उस ‘संकट’ का रूपांतर ‘अवसर’ में कर देता है।

९) प्रारब्ध की कितनी भी मार, कितना भी बड़ा आघात क्यों न हो, उसे सहन करने की ताकत यह कवच मुझे प्रदान करता ही है और साथ ही कलि-काल-प्रारब्ध का कोई भी शस्त्र इसे भेद नहीं सकता है। ऐसा यह एकमेव अभेद्य कवच है।

भगवान की चरणधूल का यह कवच मुझे यदि चाहिए तो मेरे पास उनकी चरणधूल में लोटांगण करने के अलावा अन्य कोई भी रास्ता नहीं है। मैं चाहे जैसा भी हूँ, छोटी-मोटी भी भक्ति यदि मैं करता हूँ, फ़िर भी लोटांगण करते समय, भले उतने ही समय तक के लिए ही क्यों न हो, परन्तु संपूर्ण शारण्यभाव उन तक पहुँच जाता है। मेरा भाव उतनी ही देर तक के लिए क्यों न हो परन्तु संपूर्ण शारण्यभाव में विलीन हो जाता है। इसीलिए शारण्यभाव को सहज रूप में प्राप्त करने के लिए हमें भगवान की चरणधूल में लोटांगण करने के इस सहज आसान मार्ग का अवलंबन करना चाहिए। जिसे चरणधूल का कवच प्राप्त हो जाता है, उसके जीवन में भला आनंद के आलावा और क्या हो सकता है! आनन्द ही आनन्द! इसीलिए हेमाडपंत हमसे कहते हैं कि बाबा के चरणकमलों में लोटांगण करते ही ‘आनंद समा न पाये मन में’ ऐसी मेरी स्थिति हो गयी थी। हमें भी साई की चरणधूल का कवच प्राप्त कर संपूर्ण जीवन को आनंदमय बनाना होगा। और इसके लिए एक ही सहज-सरल उपाय हमें हेमाडपंत के आचरण से सीखना चाहिए और वह है –

‘साई की चरण-धूली में ही लोटकर साईचरणों पर किया लोटांगण’।