श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ : भाग-३०

गेहूँ पीसने वाली कथा में हमने देखा कि बाबा ने जाते में गेहूँ को पीसकर महामारी को दूर कर दिया। आटे से महामारी नामक काँटा निकाल फेंका।

उस कथा में क्या हम उस जाते को शाबासी देते हैं कि क्या बात है, इस जाते ने महामारी को दूर भगा दिया? नहीं।

महामारी का नाश करने का श्रेय (credit) क्या हम आटा निर्माण करने वाले जाते को देते हैं कि उस जाते ने शिरडी को महामारी से छूटकारा दिलवाया! नहीं।

फिर हम अपने आप को करतबी होने का किताब क्यों देते हैं? हर बात में, हर एक कार्य में हम स्वयं श्रेय लेने के लिए क्यों आगे-आगे दौड़ते रहते हैं? उस प्रथम अध्याय की कथा में जिस तरह हम उन चारों स्त्रियों की कथा से सीखते हैं, उसी तरह उस प्रथम अध्याय के कथा में जाते से भी महत्त्वपूर्ण बात सीखनी चाहिए और वह है ‘निमित्तमात्र’ बनकर साई के अवतार कार्य में पूर्ण क्षमता सहित सम्मिलित होना।

इस दूसरे अध्याय का अध्ययन करते समय प्रथम अध्याय के उस जाते की याद हमें रखनी ही चाहिए। यह स्चहै कि जाते में गेहूँ पीसा गया है, मग़र फिर भी गेहूँ पीसनेवाला साईनाथ ही है, ‘पीसनेवाला’ यह सम्मान जाते को नहीं जाता है। इसीलिए महामारी के नाश के लिए आटा उत्पन्न करने के लिए जिस तरह जाता निमित्तमात्र है, उसी तरह हमें भी इस साईनाथ के अवतार-कार्य में अपनी भूमिका अदा करते रहना चाहिए। जाते को घुमाने का सामर्थ्य जिस तरह साईनाथ के ही हाथों में है, ठीक उसी तरह साईसच्चरित लिखने का सामर्थ्य केवल साईनाथ के ही हाथों में हैं। कलम जिस तरह लिखने का कार्य करते हुए दिखाई देती है, फिर भी वह स्वयं कुछ भी नहीं लिख सकती है। कलम को क्या लिखना है, कैसे लिखना है यह सब पता नहीं होता है। उसे जो हाथ में पकड़ता है वही अपनी इच्छा नुसार उसे जो कुछ भी लिखना होता है, लिखते रहता है और लेखनी तो केवल निमित्त मात्र होती है। साईनाथ ने इस लेखनी के ही समान मुझे अपने हाथों में पकड़ रखा है और अपना चरित्र वे स्वयं ही लिख रहे हैं! हेमाडपंत का यह भाव दृढ़ है। ‘मुझे बनाकर कलम’ यही हेमाडपंत की भूमिका है।

जाता घुमता हुआ दिखाई दे रहा है, जाते से आटा भी बाहर निकलता हुआ दिखाई दे रहा है। फिर भी इस गेहूँ पीसने वाली क्रिया में जाता केवल ‘निमित्तमात्र’ ही है। गेहूँ पीसने वाले श्रीसाईनाथ ही हैं, यह सत्य जिस तरह प्रथम अध्याय में ‘पीसनेवाला केवल यही एक है’ इन शब्दों में हेमाडपंत हमें बतला रहे हैं। उसी तरह इस अध्याय में हेमाडपंत हमें लिखते हुए दिखाई देते हैं, फिर भी ‘लिखने वाले यही एक हैं’ इसी सत्य को वे उजागर कर रहे हैं। हमें भी अपने जीवन में अकसर इस सत्य का अहसास रखकर हर एक कर्म करते रहना चाहिए। अपनी अहंवृत्ति को साईचरणों में समर्पित कर देना ज़रूरी है।  ‘निमित्तमात्र’ बनकर अपना कार्य पूरी इमानदारी के साथ करते रहना चाहिए और ‘साईनाथार्पणमस्तु’, ‘इदं न मम’ इस भाव के साथ कर्म को ‘साईनाथापर्णमस्तु’ करना यही हर एक श्रद्धावान का पुरुषार्थ है। साईनाथजी कहते हैं-

व्यवहार में इस प्रकार का आचरण जो करता है। मैं पूरी तरह से उसकी सहायता करता ही हूँ।
इस कथा के सार को जो जीवन में उतारता है। ऐसे मनुष्य की सेवा मैं स्वयं करता हूँ॥
अहंवृत्ति जब खत्म हो जाती है। तब उसका अपना कर्तृत्वभाव भी खत्म हो जाता है।
मैं ही उसमें उसका मैं बनकर संचार करता हूँ। अपने ही कर से लिखूँगा मैं॥
इस बुद्धि से जो कर्म का आरंभ करता है। श्रवण मनन एवं लेखन मुझे समर्पित करता है।
जिसका है उसी ने उसका संपादन किया। उसे उसने केवल निमित्त बनाया॥

इस तरह अपनी अहंवृत्ति को साईचरणों में अर्पण कर जो कर्म करता है, उसके इस परमात्मार्पण-बुद्धि के द्वारा किए जाने वाले कर्म को सुसंपूर्ण करने का कार्य परमात्मा ही करते हैं, वह भक्त उस कर्म के प्रति निमित्तमात्र होता है। जिसका था उसने ही उस कार्य का संपादन किया? अर्थात उस परमेश्‍वर के कार्य को वह परमात्मा ही करते रहता है, उसे अपना कार्य पूरा करने के लिए कोई भी रोक नहीं सकता है, केवल ‘उसके कार्य में मैं निमित्त-मात्र कैसे बन सकता हूँ’ इसके लिए मुझे ही प्रयास करना चाहिए।

गोवर्धन पर्वत को उठाने के लिए मात्र अकेले श्रीकृष्ण ही समर्थ हैं। अपने दाहिने हाथ की थानी ऊँगली के ऊपरी छोर पर ही वे बड़ी ही आसानी से गोवर्धन पर्वत को पूरा का पूरा उठा सकते हैं। मुझे तो बस अपनी लाठी गोवर्धन को लगानी है। श्रीकृष्ण के द्वारा उठाए गए गोवर्धन को मेरी लकड़ी, मेरा हाथ, मेरा सिर जो कुछ भी मैं लगा सकता हूँ वह लगाना और वह लगाते समय ‘श्रीकृष्ण ही ‘कर्ता’ हैं, उन्होंने ही गोवर्धन उठा रखा है, मुझे उनके कार्य में सहभागी होने का अवसर मिल रहा है यह उनकी ही कृपा है’ इस बात का अहसास रखते हुए पूरी ताकत के साथ जोर लगाना, यही निमित्तमात्र बनकर श्रीकृष्ण के कार्य में सहभागी होना कहलाता है। ऐसा आचरण रखनेवाले गोपों के ही वे श्रीकृष्ण सखा बनते हैं, दास बनते हैं, उस गोप की खातिर ही वे लगातार प्रयासशील रहते है, उसकी सेवा करते हैं। गोपों की जो ‘बुद्धि’ है, उसी बुद्धि से अर्थात स्वयं को ‘निमित्तमात्र’ मानकर ‘कर्तृत्व केशव का ही है’ ऐसा दृढ़ विश्‍वास रखनेवाली बुद्धि से जो कर्म करता है, उसे ही इस श्रीकृष्ण का निरंतर सामीप्य प्राप्त होता है। उस श्रद्धावान की ओर से इस गोविन्द को जो भी कार्य करवाना होता है, उसे यह गोविन्द करवा ही लेता है।

हेमाडपंत को साईनाथ के द्वारा दिया गया उपदेश हम सभी लोगों के लिए बहुमूल्य है। हमें अपना जीवन जीते हुए व्यावहारिक, गृहस्थ, परमार्थिक ऐसे सभी स्तरों पर हमें किस भूमिका में अपना कार्य करना चाहिए, इस बात का मार्गदर्शन बाबा हमें कर रहे हैं। हेमाडपंत ने बाबा के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द को अत्यन्त अचूकता से हमारे सामने प्रस्तुत किया है। हेमाडपंत के पास जिस तरह चरित्र लेखन का कार्य था, उसी तरह हम सभी लोगों के पास भी साईनाथ के किसी न किसी कार्य को करने का हुनर और अवसर होता ही है। अर्थात हमें इस साईनाथ ने अपने अवतार कार्य में कुछ न कुछ किरदार दे ही रखा होता है, फिर वह रामायण की उस नन्हीं गिलहरी जितना ही हिस्सा क्यों न हो, परन्तु हर किसी के लिए विकास का समान अवसर दिया ही गया है। अपनी भूमिका को यानी अपने ‘बस्ते’ को हमें ही रखना है और उसे रखते समय बाबा के द्वारा दिये गये उपदेश का स्मरण सदैव रखना चाहिए। हमारे पास साईनाथ का ‘बस्ता’ है और वह मुझे संभालना है, इस बात का अहसास रखकर अपना काम हमें दृढ़ विश्‍वास के साथ करते रहना चाहिए। ये साई इतना दयालु है कि उनका यह बस्ता संभालना हमारे लिए कभी भी कठिन नहीं होता है। क्योंकि उसे संभालने की ताकत तो वे हमें देते ही रहते हैं।

भौतिक जगत के बस्ते का उदाहरण लेते हैं। दफ्तर और दप्तर (बस्ता) इन दो शब्दों में अंतर है। दफ्तर यानी ऑफिस, कार्यालय, कार्यस्थान। दप्तर यानी बस्ता। स्कूल में लगने वाली सामग्री भर कर पीठ पर रखने वाली थैली यानी बस्ता। परन्तु शाब्दिक साम्यता के कारण हम उनमें होने वाली भावसाम्यता पर भी विचार करेंगे। भौतिक जगत में एक सामान्य माँ भी जितना वज़न उसका बच्चा उठा सकता है उतना ही ‘बस्ता’ (बैग) उसे देती है। उसे भारी बस्ता उठाने नहीं देती है। तो फिर हमारी यह साईमाऊली जो मैं उठा नहीं पाऊँगा ऐसा ‘बस्ता’ मुझे संभालने के लिए दे सकती है क्या? नहीं। कभी नहीं। ‘मुझसे यह क्या होगा? मैं यह कर पाऊँगा क्या? मैं यह कैसे कर पाऊँगा?’ ऐसे प्रश्‍न साईनाथ की भक्ति में कोई मायने नहीं रखते हैं, क्योंकि ‘पूरा करना साई का गुण है।’ उस बस्ते को संभालने का, उसे रखने के लिए जो सामर्थ्य आवश्यक है वह वे हमें देते ही हैं। इसीलिए हमें तो केवल अपने बस्ते को संभालने का कार्य करना है, ‘यह कार्य कैसे होगा’ इस बात की चिंता हमें नहीं करनी हैं।

हेमाडपंत भी बाबा के ‘बस्ता रख दो’ यह शब्द सुनकर आनंदित हो उठे। अब बाबा ही उनके साईसच्चरित-लेखन का बस्ता रखने का, संभालने का सामर्थ्य हेमाडपंत को प्रदान कर उनसे यह कार्य पूरा करवा लेंगे। परन्तु यह बस्ता बाबा की आज्ञा से रखा गया है, इस बात का ध्यान रखना हमेशा ही ज़रूरी है, यानी बाबा के चरित्र-लेखन का कार्य बाबा की आज्ञा से ही मैंने अपने हाथ में लिया है, इस बात का स्मरण नित्य जागृत रखना महत्त्वपूर्ण है।

अवश्यमेव बस्ता रख दो। घर-बाहर चाहे जहाँ भी रहो।
बारंबार स्मरण रहे। जीवन हो जायेगा धन्य॥

मुझे भी इस बात का ध्यान रखना ही है कि मैं अपने साईनाथ का श्रद्धावान हूँ, फिर चाहे मैं कहीं भी क्यों न रहूँ, दुनिया के किसी भी कोने में भी क्यों न रहूँ। साई मेरा है, मैं साई का हूँ।