भक्ति का अर्थ

प्रथम अध्याय के मुख्य कथा का आरंभ करने से पहले हेमाडपंत भक्ति की व्याख्या एवं शद्ब स्व-धर्म का विवेचन करते हैं। शास्त्र में ‘अनुबन्धचतुष्टय’ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। अभिधेय, प्रयोजन, संबंध एवं अधिकारी इन चार बातों को अनुबन्धचतुष्टय कहते हैं। अभिधेय यानी मुख्य विषय, जिसके बारे में बात करना है वह होता है मुख्यार्थ। साईसच्चरित यानी साईनाथ एवं उनके भक्तों का चरित्र। इस श्रीसाईसच्चरित नाम में ही अभिधेय स्पष्ट होता है। बाबा एवं भक्तों का चरित्र यहाँ अभिधेय है यानी ‘भक्ति’ यही यहाँ का मुख्य विषय है इसीलिए भक्ति के प्रति हेमाडपंत प्रतिपादन कर रहे हैं। प्रयोजन, संबंध एवं अधिकारी इनका विवेचन हेमाडपंत अगले अध्याय में करेंगे, हम भी उसी उनका अध्ययन करेंगे।

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स्वरुप का अनुसंधान यानी स्वयं के मूल‘स्व’ का अनुसंधान अर्थात हकीकत में ‘मैं’ कौन हूँ, इस बात का गहराईसे परीक्षण सतत करते रहना, यह भक्ति है। ऐसा वेदशास्त्रसंपन्न आचार्यों के मत हैं। (का विचार है ) सच्चा ‘मैं’ ‘ना-मी’ है, मैं इस परमात्मा का अंश हूँ परन्तु मैं अपने ‘स्वस्वरुप’ पर प्रज्ञापराध से आगे बढ़कर सच्चे ‘मैं’ की पहचान को खो चूका हूँ। इस ‘स्व’स्वरुप का विस्मरण यानी ‘रामस्य दासोस्यम्यहम्‌’ का विस्मरण यही विभक्ति है, वहीं ‘स्वस्वरुप’ का अनुसंधान ही भक्ति है।

पाराशर व्यास मुनी के मतानुसार अर्चना द्वारा – यानी सप्रेम पूजन द्वारा भक्ति अभिन्न हुई है। सद्‌गुरु पूजन के लिए उपवन में जाकर प्राजक्ता के फूल चुनकर लाना (एकत्रित करके) (गोमयाने सडासंमार्जन) गाय के गोबर से आँगन लिपना-पोतना, सद्‌गुरु के घर के आँगन की साफ-सफाई करना, स्वयं आह्निक करके सद्‌गुरु पूजन के लिए चंदन घिसना, सद्‌गुरु को पंचामृत से स्नान कराना, धूप-दीप एवं नैवेद्य अर्पण करके आरती-धूपारती करना इस प्रकार जो सप्रेम पूजन होता है उसे अर्चन कहते हैं। अपने हृदय को यानी अन्त:करण की चित्कला, चित-शक्ति सद्‌गुरु के मूर्ति के प्रति आमंत्रित करना चाहिए। अपने अंतर की आनंदशक्ति को ही सद्‌गुरु के प्रभा के आगे प्रतिष्ठित करके अर्चन करना चाहिए तथा पूजन के बाद फिर से इस चित्कला को अपने हृदय में स्थापित कर लेना चाहिए। सद्‌गुरु मेरे हृदय में ही प्रतिष्ठित हैं इस भाव के साथ हृदयस्थ सद्‌गुरु को मूर्ति के प्रति आमंत्रित करना चाहिए यानी मेरे सामनेवाली यह प्रतिमा केवल प्रतिमान होकर साक्षात मेरे सद्‌गुरु ही हैं इस भाव के साथ अर्चन करना चाहिए। हृदयस्थ रहनेवाले सद्‌गुरुतत्त्व को मैं सगुण साकार रुप में प्राणप्रतिष्ठित कर रहा हूँ और अर्चन के बाद फिर से मेरे हृदय के गहराई में (डोहात) विसर्जित कर रहा हूँ। यही इस प्रेमभक्ति का शुद्ध प्रेमभाव है। मेरे सामने की मूर्ति साक्षात मेरे सद्‌गुरु ही हैं इसी विश्वास के साथ पूजन करना चाहिए। हृदयस्थ निर्गुण निराकार का पूजन मेरे जैसे सामान्य मानव के लिए संभव नहीं है मुझे जरूरत है सगुण साकार सद्‌गुरु रुप की ही अर्चन के लिए, इसीलिए यह सगुण साकार के अर्चन का सीधा-सरल रास्ता व्यास महर्षि ने हम जैसे भक्तों को दिखाया है।

गर्भाचार्यजी के मतानुसार सद्‍गुरु के, भगवान के गुणसंकीर्तन में जब तल्लीन हो जाता है पूर्णत: समरस हो जाता है तब अपने-आप ही मन संपूर्णत: हरिरंग में रंग जाता है और ऐसे सावले के सावले रंग में मन का रंग जाना ही भक्ति है। मेरे स्वयं के अहंकार का, षट-रिपुओं का, विकारों का सभी रंग लुप्त होकर सिर्फ उस सावरे का रंग ही मत पर पूर्णत: छा जाता है। फिर उनके बिना और कुछ भी नहीं, कोई भी वृत्ति बाकी नहीं रह जाती, इसी को भक्ति कहते गंर्गाचार्यानुसार। भक्ति करने के लिए घर-दार छोड़ने की जरुरत नहीं, संसार का त्याग नहीं करना पड़ता, बाह्य वेशभूषा भी नहीं बदलनी पड़ती केवल परमात्मा के गुणसंकीर्तन से ही यह भक्ति हर कोई कर सकता है, मेरे अपने साईनाथ का गुणगान करते रहना। साई की गुण-लीला जो भी मिले उनको बताना एवं बारंबार उसमें तल्लीन होकर मन:पूर्वक साई रंग में रंग जाना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।

शाण्डिल्य मुनी के मतानुसार अखंड आत्मानुसंधान गुणकथा संकीर्तन एवं उचित आचरण ही भक्ति होता है। (कहलाती है) मेरे आत्मरुप का अहसास एवं आत्माराम का अनुसंधान अखंड करते रहना यानी ‘यह साईराम ही मेरा स्वामी है और में उनका दास हूँ’ इस बात का सदैव स्मरण करते रहना यही भक्ति का प्रथम सोपान है। साथ ही बाबा की कथाओं का संकीर्तन एवं उन्हें जो अच्छा लगता हैं (वे जैसा हमसे चाहते है) वैसा आचरण करना ये उसके बाद के दो सोपान हैं। वेदविहित आचरण यानी उचित आचरण, नीति मर्यादा का पालन बिल्कुल इमानदारी से करना (बारीकी से करना) हम साई भक्तों के लिए ‘हमारे वेदशास्त्रपुरान। श्रीसद्‌गुचरण सेवन।’ यही सत्य है और बाबा की आज्ञा ही हम सबके लिए वेद है इसीलिए बाबाने श्रीसाईसच्चरित में जैसे कहा है उस तरह का उचित आचरण रखना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।
भक्ति यह कोरी चर्चा का विषय न होकर प्रत्यक्ष कृति है, पुरुषार्थ है, श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज में भक्ति यह पंचम पुरुषार्थ है, इसका उल्लेख स्पष्टरुप से किया गया है तथा साईसच्चरित में भी हेमाडपंतजी ने इसी बात को लिखा है, जिसका अध्ययन आगे चलकर हम करने ही वाले हैं। भक्ति यानी खोखले शब्दों का ज्ञान न होकर आचरण से व्यक्त होनेवाली है। और यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है इसीलिए भक्तिमार्ग में उचित आचार का अनन्यसाधारण महत्त्व है। नीतिमर्यादा का यथाक्रम पालन करना ही भक्ति की नींव है।

कर्म से कोई भी नहीं बच पाता। बिलकुल सभी प्रकार के शारीरिक कर्म को छोड़कर बैठनेवाला भी मानसिक कर्म करते ही रहता है। ‘कर्म की गति गहन (अटल) है, यदि यह सच भी है फिर भी कर्मत्याग यानी कुछ भी न करना यह उसका उपाय नहीं है, निश्चित ही नहीं कारण कुछ भी न करना यानी काल का अपव्यय करना भी कर्म ही है और काल का अपव्यय यह प्रज्ञापराध है श्रीमद्‌पुरुषार्थ गरजकर कहते हैं। ‘कर्म का त्याग न करके फलाशा का त्याग करना चाहिए’। यही श्रीमद्‌पुरुषार्थ द्वारा कहा गया परम रहस्य है। कर्म करते समय उस करम के फल के प्रति कल्पना करते रहना और कर्म की ओर ध्यान न देने से ही फलाशा हमारा नुकसाअन करते रहती है। इसीलिए यह कर्म ‘मैं; कर रहा हूँ और इसका फल मुझे इसीप्रकार से मिलनेवाला है। इस फलाशा में ही बद्ध होने की अपेक्षा कर्ता साईराम ही है और मेरे कर्म के फल के प्रति कल्पना करने की अपेक्षा यह मेरा साईराम पूर्ण न्यायी है वह उचित समय पर उचित फल देगा ही, मुझे अपना कर्तव्य पूर्ण जागरुक रहकर करना चाहिए और ‘कर्म ही कर्मफल है’ इस दृढ़भाव को मन में रखक्र कर्म करते समय ही इस कर्म के आनंद का अनुभव करना चाहिए। कर्म के कर्तृत्व एवं फलाशा इन दोनों से मुक्त होकर काम्यत्यागसह कर्म करते रहने से निरहंकारी भाव से निष्काम कर्मयोग अपने आप ही साध्य होता है कारण फलाशा का पूर्णविराम मिलने पर होनेवाले निष्काम कर्म से ही शुद्ध स्वधर्म का पालन अपने आप ही होते रहता है। कहते हैं काँटे से काँटा निकाला जाता है अर्थात भगवान को अर्पण किए गए इस निष्काम कर्मयोग से ही कर्म के जटिल जंजाल से हमें मुक्ति मिलती है श्रीगोपीनाथशास्त्री पाध्ये खानदान (वंश) में फलाशा का पूर्णविराम करनेवाली आसान युक्ति उपयोग में लायी जाती है जो हेमाडपंत यहाँ चाहते हैं। इसके बारे में हम कल देखेंगे।