श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ५०)

श्रीसाईसच्चरित के प्रथम अध्याय का नाम है- ‘मंगलाचरण’। इस में से मुख्य एवं मध्यवर्ती कथानक है- बाबा के द्वारा गेहूँ पीसा जाना और यह केवल कथानक नहीं है, सामान्य कथा नहीं है, बल्कि वह है एक घटित होनेवाली अद्भुत घटना। ऐसी घटना जिस घटना से हेमाडपंत का संपूर्ण जीवन ही बदल गया। पीसनेवाले जाँते की वर्तुलाकार गति – यह गति ‘परमात्मा’ हम सभी के जीवन में निर्माण करता ही रहता है। सिर्फ जिस पल मुझे इस बात का अहसास होता है, उसी पल ‘मुझे’ उस वर्तुल को पूर्ण करने की दिशा में अपना पहला कदम उठाना ही चाहिए, क्योंकि जिस पल मैं पहला कदम उठाता हूँ, उसी पल ‘मैं’ उस वर्तुलाकार गति एवं दिशा के द्वारा परमात्मसमर्पित जीवन जीने लगता हूँ।

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अब पूर्ण रूप से उस ‘परमात्मारूपी’ केंद्र के हाथों में मैंने अपनी गति सौंप दी होती है और तब मेरा काम केवल चुनकर दिए गए रास्ते पर चलना इतना ही रहता है और इसके लिए भी वह परमात्मा मुझे जितनी ज़रूरत एवं उचित है उतनी ताकत की पूर्ति करता ही रहता है।

आज हम इस गेहूँ पीसनेवाली कथा को एक अन्य ही अँगल से देखेंगे। इस गेहूँ पीसनेवाली घटना को देखकर जिन हेमाडपंत के मन में बाबा का चरित्र लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई उन्हीं हेमाडपंत की भूमिका के बारे में हम विचार करेंगे।

एक सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात इस घटना के माध्यम से सामने आती है, वह है कि हेमाडपंत जब इस घटना को देखते हैं, तब उस घटना की समाप्ति पश्‍चात् भी वे बाबा से कहीं भी यह प्रश्‍न नहीं पूछते हैं कि ‘‘बाबा, अब इस आटे का आप क्या करोगे?’’ अथवा यह भी नहीं पूछते है कि ‘‘बाबा, आपने इस गेहूँ को पीसने के लिए इतनी मेहनत की और अब इसे सीमा पर डालने के लिए कह रहे हो ऐसा क्यों?’’ इस प्रकार का कोई भी प्रश्‍न हेमाडपंत बाबा से नहीं पूछते हैं। वे स्पष्टत: कहते हैं- ‘‘बाद में मैंने लोगों से पूछा। बाबा ने ऐसा क्यों किया॥

यहीं पर हेमाडपंत और एक सामान्य मनुष्य इनके बीच का अंतर बिलकुल स्पष्ट हो जाता है। हेमाडपंत के सामने साक्षात परमात्मा होने पर भी उन्होंने ‘उनसे’ प्रश्‍न नहीं पूछा। लेकिन हम वे सामने हो (किसी भी स्वरूप में) या ना हो, हमसे संबंधित यदि कोई घटना हमारे मन के विरुद्ध घटित हो जाती है कि तुरंत ही हम उनसे सबसे पहले यह प्रश्‍न पूछते हैं, ‘‘अरे भगवान, तुमने ऐसा क्यों किया?’’ तुरंत ही हमारा दूसरा प्रश्‍न भी तैयार हो जाता है, ‘‘मैं ही मिला तुम्हें ऐसा करने के लिए?’’ और कितनी बार तो मेरा जिन बातों के साथ कोई संबंध ही नहीं रहता, उन बातों के संदर्भ में भी ‘उन्हीं’ से प्रश्‍न पूछते रहता हूँ और मेरी ओर से मेरे इस ‘क्यों’रूपी पूछनेवाली वृत्ति का अंत होता ही नहीं।

हमारे इस हर एक ‘क्यों’ का उत्तर योग्य समय आने पर वे परमात्मा देते ही हैं। परन्तु जब हमें ऐसा अनुभव मिलता है तब उस अनुभव से सीखकर सँभल जाना यह तो मनुष्य के हाथ में ही होता है। आरंभ के काल में जब मैं उन से अकसर ‘क्यों’ यह सवाल पूछता हूँ। मगर जब मैं स्वयं इस ‘क्यों’ के उत्तर का अनुभव करता हूँ , उस समय इस ‘क्यों’ का सिलसिला खत्म करना मेरे लिए हितकारी है, यह मैं जान जाता हूँ। क्योंकि इस हर एक ‘क्यों’ का उत्तर हर मनुष्य के कर्म में ही छिपा रहता है।

उदाहरण के तौर पर यदि हम देखे तो – मान लो कि परमात्मा ने कभी यह निश्‍चय कर लिया और हर मनुष्य से उसके हर व्यवहार के बारे में, उसके हर एक कर्म के प्रति पूछना शुरू कर दिया कि ‘अरे बालक, तुमने ऐसा क्यों किया?’ तो हमारी स्थिती क्या होगी, इतना यदि हम जान भी ले तो काफी है।

परन्तु वे अकारण करुणा के महासागर कभी भी मनुष्य से ‘क्यों’ यह प्रश्‍न नहीं पूछते, उलटे उस हर एक मनुष्य के ‘क्यों’ का उत्तर उस हर एक व्यक्ति को वह व्यक्ति उसे सह सके इस कदर देते ही रहते हैं।

इसीलिए हमें भी जीवन के किसी न किसी मोड़ पर परमात्मा से प्रश्‍न पूछने कि इस मनोवृत्ति को बदलना ही चाहिए। यही बात हेमाडपंत ने जान ली थी और इसी कारण वर्तुलाकार मार्गक्रमण उन्होंने गहराई तक किया था।

आरंभ बाबा का कोई न जान पाये। क्योंकि प्रथमत: कुछ भी न समझ में आये।
धीरज रखकर ही बाद में परिणाम सामने आ जाये । महिमा अपार बाबा की॥

हेमाडपंत की उपर्युक्त पंक्तियों से ही बाबा की गेहूँ पीसने की क्रिया की पहेली सुलझ जाती है। इसीलिए वे कहते हैं कि बाबा का किसी भी क्रिया के आरंभ करने के पीछे का रहस्य समझ में आ ही नहीं सकता है। लेकिन जो धैर्य रखता है उसे अवश्य ही इस कारण का पता चल जाता है।

इस संसार में कोई भी घटना जब घटित होती है तो उस घटना के परिणाम-स्वरूप उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती ही है। बाबा ने गेहूँ पीसनेवाली क्रिया के आरंभ करते ही अनेक प्रतिक्रियाएँ उठीं, परन्तु हेमाडपंत के मन में ‘प्रतिसाद’ उत्पन्न हुआ।

सर्वप्रथम हम हेमाडपंत का प्रतिसाद देखते हैं,
महदाश्‍चर्य से भर गया मेरा मन। गेहूँ पीसने की यह क्या कल्पना।
अपरिग्रह अकिंचना । ऐसी यह विवंचना क्यों॥

शिरडी के अन्य लोगों की इसके बारे में क्या प्रतिक्रिया थी-
साईलीला देखकर लोग हो गये साश्‍चर्य-चित्त। हिंमत न पूछने की किसीमें कि बाबा आप ये क्या और क्यों कर रहे हो।
गाँव में फैलते ही यह समाचार। पहुँच गए तुरंत ही नरनारी॥

बाबा की गेहूँ पीसने की क्रिया पर अन्य ग्रामवासियों की प्रथम भूमिका ‘आश्‍चर्य’ यही थी। और उन्होंने शायद प्रेमवश अथवा बाबा का अधिकार देखकर साईनाथ से यह प्रश्‍न नहीं पूछा कि ‘‘बाबा, आप यह क्यों कर रहे हो?’’

ठीक है, परन्तु कभी किसी के मन में यह प्रश्‍न उठ सकता है कि मुझे परमात्मा को ‘क्यों’ यह पूछने का पूरा अधिकार है और स्वतंत्रता भी है । मुझे भला कौन रोक सकता है!

परमात्मा ने हर एक जीव को कर्मस्वतंत्रता दे रखी है! इसीलिए ‘उनसे’ प्रश्‍न पूछना और न पूछना इन दोनों बातों का कर्मस्वातंत्र्य मनुष्य को है। अर्थात यह अपनी-अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। बाबा जो कुछ भी कर रहे हैं, वह निश्‍चित ही सत्य, प्रेम, आनंद एवं पावित्र्य के अनुसार ही है, यह ‘श्रद्धा’ रखकर बाबा की लीला एवं प्रेम को ‘प्रतिसाद’ देते हुए ‘सबुरी’ धारण करके जो भक्त स्वयं की ‘भूमिका’ भली भाँति निभाता है, उसे ‘धीर धरिता परिणामी फळे ।‘कौतुक’ आगळे बाबांचे ।’ अर्थात ‘सबर का फल मीठा यानी उचित होता है’ यह अनुभव प्राप्त होता है।

बाबा के हर कार्य को प्रेमपूर्वक निहारते हुए, जो उनका गुणगान करता है, श्रद्धा-सबुरी रखता है, वही उन्हें प्रतिसाद देता है। इसके विपरीत जो ‘क्यों’ यह प्रश्‍न पूछता है, श्रद्धा-सबुरी नहीं रखता, ‘प्रतिसाद’ की जगह ‘प्रतिक्रिया’ करता है, उसके लिए बाबा को पहचानना नामुमकिन है और वह शिरडी की सीमा से दूर ही रहेगा। अर्थात बाबा के कृपाछत्र से स्वयं ही दूर चला जायेगा।

इस अध्याय में होनेवाली गेहूँ पीसनेवाली कथा का मतितार्थ जानने के बाद यह निश्‍चित हमें ही करना है कि बाबा की क्रिया को प्रतिसाद देना है अथवा उस पर प्रतिक्रिया करनी है?

जो जो मज भजे जैशा जैशा भावे। तैसा तैसा पावे मी ही त्यासी॥

जिस भाव से जो मुझे भजता है, उसी भाव से उसे मेरा अनुभव प्राप्त होता है। बाबा का यह वचन सदैव कार्यकारी है ही, इस बात का स्मरण हमें सदैव रखना ही चाहिए।