श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-१८)

‘साधु संत अथवा श्रीहरि। किसी श्रद्धावान का हाथ पकड़कर
अपनी कथा स्वयं ही लिखते हैं। अपना हाथ उसके सिर पर रखकर॥

श्रीसाईनाथजी का यह चरित्र लिखने वाले हेमाडपंत को चरित्र लिखते समय बाबा के ‘निज-कर’ का यानी बाबा के अपने हाथ का पूरा विश्‍वास हो जाता है। इसका अध्ययन हम पहले ही कर चुके हैं।

भक्त का संपूर्ण जीवनविकास

प्रत्यक्ष परमात्मा का ‘निज-कर’ जब भक्त के सिर पर रहता है, तब उस भक्त का संपूर्ण जीवनविकास होने लगता है। इसके लिए ज़रूरत होती है तो केवल संपूर्ण शारण्यभाव की। जिस समय साईनाथ का दर्शन लेने की चाह में हेमाडपंत शिरडी गए और लेंडी-स्थल जा रहे बाबा की उन्होंने धूल-भेंट लेकर लोटांगण किया, उसी पल अण्णासाहब दाभोलकर के जीवन की नदी ‘हेमाडपंत’ इस नाम को धारण कर कृपासिंधु श्रीसाईनाथ के चरणों में जा मिली। अण्णासाहब दाभोलकर साईनाथजी के श्रेष्ठ भक्त थे और श्रीसाईसच्चरितकार हेमाडपंत यह एक ऐसे व्यक्ति का प्रवास है, जिसके सिर पर परमात्मा का, साईनाथ का निज-कर पड जाते ही उसका जीवन देवयान पथ पर अधिक से अधिक विकसित होने लगता है।

परमात्मा का यह निज-कर वैसे तो हर एक जीव के सिर पर होता ही है, लेकिन श्रद्धाहीन मानव को परमात्मा के उस निज-कर का एहसास नहीं होता है; वहीं यह एहसास जिस मनुष्य को हो जाता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

‘अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ यह भगवान श्रीकृष्ण का अभिवचन, ‘भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे’ (डर मत जाना, मैं तुम्हारे पीछे हूँ) यह अक्कलकोटनिवासी स्वामीसमर्थजी का अभिवचन यह उस सद्गुरुतत्त्व का हम सभी के सिर पर रहनेवाला निज-कर है। उसे केवल पहचानना आना चाहिए, जानना आना चाहिए क्योंकि इसी में हम सभी का कल्याण है।

जिस क्षण इस परमात्मा के निज-कर को हम महसूस करने लगते हैं, उसी क्षण से मेरे लिए मेरे जीवन का प्रवास अत्यधिक आसान हो जाता है।

परमात्मा का यह निज-कर माँ की ममता से हमें थपथपाता है, दु:ख के क्षणों में हमारे आँसू पोछता है, धैर्य बँधाता है, मुसीबत की घड़ियों में लड़ने की ताकत एवं सामर्थ्य देता है। हमसे यदि कोई छोटासा, उचित एवं सुंदर कार्य भी होता है, तब हमारे द्वारा किया जाने वाला कार्य चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, मग़र तब भी यही हाथ हमारे पीठ पर शाबसी देता है, हमारी प्रशंसा करता है। यही हाथ हमें एक स्वाभिमानी मनुष्य बनाकर सिर उठाकर मर्यादापुरुषोत्तम की राह पर चलना भी सिखाता है और जब कोई गलती हमारे हाथों से हो जाती है, तब यही निज-कर मुझमें सुधार करने के लिए थप्पड़ भी लगाता है। मेरी खुशी में यह भी मेरे साथ ही रहता है। यही हाथ हमें बिना वजह सतानेवाले शत्रु को एक ज़बरदस्त घूँसा भी लगाता है। यह सब कुछ यह निज-कर मेरे लिए क्यों करता है? तो ‘यह मेरा ही बच्चा है’ इस प्रेम के साथ वह यह सब कुछ करता है। जिस पल मनुष्य को परमात्मा के इस निज-कर की पहचान होती है और उसके मन में यह भावना दृढ़ हो जाती है, उसी क्षण से परमात्मा यही उस मनुष्य का सर्वस्व बन जाता है।

परमात्मा जिससे अपना चरित्र लिखवाना चाहता है,उसी के सिर पर परमात्मा अपना निज-कर रख देता है। यही सच हेमाडपंत हमें बता रहे हैं।

‘‘मेरी कथा मैं ही कथन करूँगा। मैं ही भक्तेच्छा पूरी करूँगा।
इस कथा से अहं-वृत्ति दूर हो जायेगी। टूटकर बिखर जायेगा अंहकार मेरे चरणों में॥

‘‘बस्ता रख दो यही ठीक होगा। उसे मुझसे पूरी सहायता मिलेगी।
वह तो है केवल निमित्त-मात्र। लिखूँगा मेरी कथा मैं ही।’’

बाबा कहते हैं कि इस चरित्र से हम मानवों के अहंकार का पूर्ण रूप से नाश हो जायेगा। जब उस मनुष्य के अहंकार का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है, तब उसका ‘मैं’ खत्म होकर वहाँ पर केवल परमात्मा का ‘मैं’ ही होता है।

साईनाथ कहते हैं-
मनुष्य की अहंवृत्ति जब नष्ट हो जाती है। तब उस मनुष्य का कर्तापन भी खत्म हो जाता है।
‘मैं’ ही तब ‘मैं’ संचार करता हूँ। मेरे ही हाथों लिखूँगा मैं।

हमने जैसा पहले देखा था कि हर एक मनुष्य के सिर पर इस परमात्मा का निजकर सदैव होता ही है। जब साक्षात् परमात्मा ने मेरे सिर पर निजकर रखा ही है तो फ़िर मेरा क्या काम? यदि परमात्मा का निजकर मेरा हर एक उचित कार्य करने वाला है तो फ़िर मुझे मेहनत क्यों करनी है?

इसका अर्थ क्या यह है कि मैं स्कूल में न जाकर घर पर ही बैठूँगा तो मेरा पेपर स्कूल में लिख लिया जायेगा अथवा मैं बिलकुल भी पढ़ाई किए बिना ही जाऊँगा और तब भी मैं अपना पेपर व्यवस्थित रूप में लिखूँगा? मेरे थाली को छुए बगैर ही खाना अपने आप ही मेरे मुँह में जायेगा?

ऐसा कदापि नहीं होगा। क्योंकि सदैव कार्यरत रहनेवाले भगवान को मानवों की ओर से केवल उस मानव के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की एवं परिश्रम की अपेक्षा रहती है और किसी भी उचित कार्य के लिए परिश्रम करना यही पुरुषार्थ है।

जिस पल मेरा परिश्रम शुरू होता है, तब यह निज-कर अ‍ॅक्टीव हो जाता है। जब मैं अपना परिश्रम रोक देता हूँ उसी क्षण वह निज-कर साक्षी बन जाता है। जब पुन: मेरा परिश्रम शुरू होता है उस क्षण अ‍ॅक्टीव हो चुका यह निज-कर फ़िर मुझे हर एक कार्य में उचित मार्गदर्शन देकर मेरा हर एक कार्य सुफ़ल एवं संपूर्ण बनाता है। और फ़िर जब मैं स्वयं अभ्यास करता हूँ, व्यवस्थित रूप में स्कूल जाता हूँ, तब मुझे मेरी पढ़ाई में मदद करने से लेकर, परीक्षा के समय मेरा पेपर पूरा करवाकर मुझे उत्तीर्ण करने की जिम्मेदारी यह निज-कर ही उठाता है। मैं जब उचित मार्ग पर चलकर परिश्रम करके पैसा कमाता हूँ, तब मुझे यही निज-कर कभी भी भूखा नहीं रखता।

संक्षेप में यदि देखा जाये तो मानव जब स्वयं परिश्रम करना शुरू करता है, तब यह निज-कर उसके जीवन में अ‍ॅक्टीव हो जाता है। हेमाडपंत ने साईबाबा से उनका चरित्र लिखने की इजाज़त प्राप्त कर ली और वे यूँ ही केवल चुप नहीं रहे, बल्कि बाबा के भक्तों से मिलकर उनसे चर्चा करके उनके अनुभवों को हेमाडपंत ने संग्रहित किया और उन सभी अनुभवों को लिखकर पद्यरचनाबद्ध कर दिया।

वहीं, जब कोई मनुष्य कोई भी परिश्रम किए बिना केवल हाथों पर हाथ धरे बैठा रहता है, तब परमात्मा का यही निजकर उसके लिए साक्षी बन जाता है। परन्तु उस मनुष्य को परिश्रम करने का अवसर परमात्मा बारंबार देते रहते हैं।

और परमात्मा के द्वारा बनाये गये नियमों को लाँघकर जब मानव अनुचित कर्म करता है, तब परमात्मा उसके सिर पर से अपने इस निजकर को हटा देते हैं। और यदि एक बार परमात्मा का यह निजकर हमारे सिर पर से हट जाता है, तब उस व्यक्ति की स्थिति क्या होती होगी यह सभी जानते हैं।

यह निजकर मनुष्य के सिर पर होनेवाला छत्र होता है, मनुष्य का कवच होता है। ‘वे हैं और वे मेरे हैं’ यह विश्‍वास जब तक हमारे मन में दृढ़ रहता है, तब तक ही ‘उनका’ ‘निज-कर’ हमारे सिर पर रहता है।

मानव के सिर पर परमात्मा के निज-कर का होना इसका अर्थ क्या है?

परमात्मा का हाथ जहाँ पर है वहाँ पर वे परमात्मा संपूर्णत: होते ही हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे भगवान सदैव मेरे साथ होते ही हैं, यह भाव रखना ही परमात्मा का निज-कर कहलाता है। भले ही फ़िर वे हमें दिखाई दे अथवा न दिखाई दें, ‘वे’ वहाँ पर होते ही हैं।