श्रीसाईसच्चरित : अध्याय २ (भाग- ९)

‘चाहा इस इतिहास को लिखना।’

ऐसा कहकर हेमाडपंत ने श्रीसाईसच्चरित लिखने के प्रति अपनी इच्छा व्यक्त कर दी। (इसका गुढ़ार्थ स्पष्ट कर दिया) इस इतिहास को लिखते समय तथा इसका प्रयोजन स्पष्ट करते समय ये आदरपूर्वक उन लोगों का उल्लेख करते हैं। जिन्होंने इससे पहले गद्य एवं पद्यरुप में बाबा की कथाओं का वर्णन किया है। दासगणू विरचित पंक्तिबद्ध रचना में साईबाबा के कथाओं का अध्याय, रघुनाथ एवं उनकी पत्नीद्वारा विरचित साईगीत एवं गुजराती भाषा में अमीदास भवानी मेथा द्वारा लिखी गई साई कथाओं का निर्देश करते हुए वे मधुर ही हैं यह भी कहते हैं। मुझसे पहले जिन लोगों ने इस क्षेत्र में कार्य किया हैं, उनके नामों का उल्लेख करके साथ ही उनके कार्य का गौरव करते हुए हेमाडपंत इस ग्रंथ की विरचना के प्रयोजन के बारे में बतलाते हैं। इस में सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि हेमाडपंत उन तीनों ही पूर्व कृतियों की परस्पर तुलना नही कर रहे हैं और ना ही इन तीनों ही कृतियों के साथ इस ग्रंथ की तुलन कही भी करते हैं। हर एक भक्त की कृति उसके प्रेम से परिपूर्ण होने के कारण वह अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ ही है कारण वह कृति करने वाला भक्त निमित्त मात्र होता है और कर्ता-करविता तो साईनाथ ही हैं इस बात को हेमाडपंत भली-भाँति जानते ही हैं।

हर एक भक्त की लाईन

हर एक भक्त की लाईन इस साईनाथ के पास अलग होती है। ना किसी के आगे और ना ही किसी के पिछे। हर कोई अपनी लाईन में अकेला ही होता है और वही अपनी कृतिनुसार अपनी खुद की ही लाईन में आगे-पिछे होता रहता है। इसीलिए हमें कभी भी किसी की भी किसी के साथ तुलना नहीं करनी चाहिए, परन्तु किसी के सेवा के साथ भी परस्पर तुलना नहीं करनी चाहिए। यह बाबा के आरती की थाली ऐसे सजाता है, वह वैसे सजाता है। इसके पहले वाला और भी अच्छा सजाता था आदि बातों की तुलना भी नहीं करनी चाहिए, हर कोई अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार बुद्धिनुसार, मन के अनुसार काम करता ही रहता है। इसीलिए वह अपनी पूरी क्षमता के साथ बाबा के सेवाकार्य में सहभागी होता है या नहीं यह बात अधिक महत्त्व रखती है। मान लो किसी को कोई काम करने में तकलीफ़ होती है और यदि उसके मनपसंद काम उसे मिल जाता है, जो वह खुशी से कर सकता है तो बहुत अच्छी बात है। परन्तु ऐसा हमेशा होगा यह भी ज़रूरी नहीं है। सेवाकार्य में जो मुझे मिल रहा है, उस कार्य को मन लगाकर अपनी पूरी क्षमता के साथ करते रहना चाहिए।

जिस तरह दो भक्तों की एवं उनके सेवा की परस्पर तुलना नहीं करनी चाहिए। उसी प्रकार दो सेवाओं की भी तुलना नहीं करनी चाहिए। किसी भी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए। साई के दरबार में पोथी पढ़ने वाला और झाडू लगाने वाला दोनों ही समान महत्त्व रखते हैं, कोई भी काम छोटा नहीं होता, मुझे अपनी क्षमतानुसार उसे करते रहना चाहिए। मान लीजिए, मेरी किसी बीमारी के कारण उदा. घुटनों का दर्द, मधुमेह आदि के कारण यदि अन्य कोई काम करना मेरे लिए संभव नहीं है, तो कम से कम उत्सव के लिए आनेवालों को, बाबा के दर्शन हेतु कड़ी धूप में खड़े रहनेवाले भक्तों को प्यार से पानी पिलाने का काम तो मैं कर सकता हूँ। जो लोग पढ़े-लिखे नहीं होते उन्हें पढ़ना सिखाना आदि अच्छी बात है, परन्तु तब तक उन्हें साईसच्चरित पढ़कर सुनाना, बाबा की कथा बताना, बाबा का गुणवर्णन करना ये सारे काम तो मैं सहजतापूर्वक कर सकता हूँ।

हेमाडपंत द्वारा लिखी गईं पंक्तियाँ पढ़कर दिखाना, उसका अर्थ समझाना यह सबकुछ भी मैं कर ही सकता हूँ। ‘जो जो हम जानते हैं उसे दूसरों को बतलायें।’ संतश्रेष्ठ श्रीरामदास के इस उक्तीनुसार हम जो कुछ भी जानते हैं उसे दूसरों को बतलाते रहना है। हेमाडपंत ने इसी भाव के साथ इस ग्रंथ की रचना की और इस ग्रंथ का आरंभ ही अपने अनुभव के आधार पर किया। मुझे मेरे सद्गुरु ने कैसे अनुभव प्रदान कर आगे बढ़ाया, उन्होंने मेरा विकास कैसे किया, यह स्वयं का अनुभव, उसका वर्णन करना अत्याधिक महत्त्व रखता है। साथ ही जिसका भी अनुभव मैंने सुना उनके अनुभवों के बारे में दूसरों को बतलाना चाहिए, मेरे ये साईनाथ कितने कृपालु हैं, कितने दयालु हैं, कितने प्रेमी है यह हमें दूसरों को बतलाते रहना चाहिए।

साई के चरित्र का यथोचित वर्णन करना शायद मेरे लिए संभव नहीं हैं कारण सहस्त्रमुखी शेष जिनका वर्णन सहस्त्र मुख से सदैव करते रहते हैं और फ़िर भी बाबा का वर्णन पूर्णत्व प्राप्त करने वाला है ऐसा भी नहीं कह पाते हैं, वहाँ पर मेरे समान सामान्य मानव की क्या बिसात! परन्तु हमें ना उम्मीद भी नहीं होना है। मुझे इस आदिशेष के पथ पर मार्गक्रमण करते रहना है अर्थात बाबा का गुणवर्णन जितना मैं कर सकता हूँ उतना करते रहना चाहिए।

साईसच्चरित महासागर।
अनंत अपार रत्नाकर।
मैं टिड्डा उसे सौख लूँगा।
संभव यह कैसे होगा।
वैसे ही साई का चरित्र गहन।
असभंव उसका साफ़ वर्णन।
इसीलिए कर सकूँ जितना कथन।
उसी में समाधान कर लो।

हेमाडपंत इन पंक्तियों के माध्यम से हमें यही कहना चाहते हैं कि, मैं चाहे कितना भी छोटा क्यों न होऊँ पर मेरे बाबा महान हैं और इसीलिए मुझसे जितना भी हो सकेगा इतना गुणसंकीर्तन मैं करूँगा, वही मेरे लिए संतोषप्रद है। मुझे कभी भी अपने मन में हीन भावना न लाते हुए अपना काम अपनी योग्यतानुसार करते ही रहना है, उसी में मुझे संतुष्ट मिलेगी। साई की इन कथाओं को सुनते समय भूख-प्यास का विस्मरण हो जाता है, साई लीला श्रवण के आनंद में अन्य सुख तृण समान लगते हैं उन कथाओं को सावधानी से सुनने से अन्तर्मन अपने आप संतुष्ट हो जाता है हमारा मन कभी भी संतुष्ट नहीं होता है, कितना भी मिले पर अतृप्त ही रहता है। इसका कारण यह है कि हम अपने मन को जिस विषय की पूर्ति करते हैं, वह मूलत: अपूर्ण ही होने के कारण उसे पा लेने के पश्‍चात भी हमें तृप्ति नहीं मिलती परन्तु जब अपने मन को इन साई लीलाओं का श्रवण हम करवाते हैं, तब ये साईनाथ एवं उनकी लीलाएँ दोनों ही पूर्ण होने के कारण मन अपने आप संतुष्ट हो जाता है। यूँ तो हमारा मन अशांत होता है परन्तु जब शांतिसिंहासनस्थ साईनाथ हमारे अन्तर्मन की द्वारकामाई में स्थिर हो जाते हैं तब शांतरस अपने-आप ही प्रवाहित होने लगता है।

जहाँ राम वहाँ सीता यही सिद्धांत यहाँ पर हेमाडपंत प्रतिप्रादित कर रहे हैं। हमारे मन में साईराम को छोड़कर अन्य प्रकार के विषय जब तक हैं, तब तक तृप्तिरुपी, शांतिरुपी सीतामाई भला कैसे प्रतिष्ठित हो सकेगी? साई की कथा अर्थात भक्तिरुपिणी सीतामाई। सीतामाई एवं इस भक्तिरुपिणी सीतामाई ही इस साईराम को हमारे मन में सद्गुरु रुप में प्रतिष्ठित करती हैं और फ़िर इस राम की पत्नी सीतामाई ही तृप्ति-शांति रुप में हमारे मन में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। इस तरह हमारे मन को शांति-तृप्ति अर्थात समाधान प्राप्त होता है।

सीतामैय्या के ही ये दोनों रुप हमारे जीवन में भक्ति एवं आनंदिनी इन दो रुपों में कार्यरत रहते हैं। अपने बच्चों के लिए यह माता, विश्‍वमाता सच्चिदानंदा सदैव परिश्रम करते रहते हैं, भक्तिरुप में ये हमारे जीवन में भगवान को क्रियाशील बनाती हैं एवं स्वयं भगवान की ऐश्‍वर्यशक्ति बनकर शांति एवं तृप्तिरुप में हमारे जीवन में आनंद प्रदान करती हैं। अब हम समझ सकते हैं कि साईनाथ की भक्ति ही हमारे जीवन में संतुष्टि प्रदान करने वाली है। इस साईनाथ के भक्ति बगैर अन्य किसी भी प्रकार से ये संतुष्टि-समाधान हमें प्राप्त नहीं हो सकता है।

बिजली निर्माण करने के लिए जिस तरह विद्युत यंत्रणा कनेक्शन (टॉव्र जनित्र) मिटर को चलाने से पहले उस विद्युत-मिटर को विद्युतभार संवाहन करना पड़ता है और फ़िर उस मिटर के माध्यम से हमें बिजली मिलती है, उसी तरह यहाँ भक्ति एवं शांति-तृप्ति का संबंध हमारे जीवन में होता है। प्रथम बिजली निर्माण करने के लिए लगने वाली उर्जा भी बिजली ही होती है, उसी तरह यहाँ भक्ति एवं शांति-तृप्ति ये दोनों रुप भी मर्यादास्वरुपिणी सच्चिदानंदा की ही है।