श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१७)

कृतयुग में जो प्राप्त होता था ‘ध्यान’ से। त्रेता में ‘यजन’ से, द्वापार में अर्चन से।
वह सब प्राप्त होता है ‘नामसंकीर्तन’ से। ‘गुरुभजन’ से कलियुग में।

परमात्मा को प्राप्त करने के लिए हर एक युग में विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है। संक्षेप में कहा जाये तो हर युग में परमात्मा की भक्ति विभिन्न पद्धतियों के अनुसार की जाती है। हेमाडपंत इस ओवी के माध्यम से यही कह रहे हैं कि हर युग में परमात्मा की भक्ति करने के लिए किस मार्ग का अवलंबन किया जाता था।

कृतयुग में अर्थात् सत्ययुग में ‘ध्यान’ यह मार्ग था। त्रेतायुग में ‘यजन’ अर्थात् ‘यज्ञ’ किया जाता था, द्वापारयुग में ‘पूजन’ किया जाता था और कलियुग में अर्थात् आज के युग में ‘नामसंकीर्तन’ यह परमात्मा की भक्ति करने का मार्ग हैं। अन्य तीन युगों के बारे में यदि देखते हैं तो कलियुग में भक्ति करना यह का़ङ्गी आसान है। ध्यान करना यह सर्वसामान्य लोगों को काफ़ी मुश्किल प्रतीत होता है। क्योंकि ध्यान करने के लिए मन का स्थिर होना अतिआवश्यक होता है। सत्ययुग में मन की इस तरह की स्थिरता, जो ध्यान करने के लिए आवश्यक है, उसे साध्य करना संभव था और इसका प्रमुख कारण था सत्वगुण की अधिकता।

आगे चलकर जैसे-जैसे सत्वगुण की अधिकता कम होने लगी वैसे भक्तिमार्ग का स्वरूप भी बदलने लगा। अर्थात यह बदलाव सर्वसामान्य मानवों के लिए ही किया गया।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईत्रेतायुग में ‘यजन’ अर्थात यज्ञ किया जाने लगा। यज्ञसंस्कृति का विस्तार यह त्रेतायुग में हुआ। इस काल में यह माना जाता था कि यज्ञ की अग्नि जो होती थी वह अग्नि ही, यज्ञ में अर्पण करने वाली वस्तुएँ, जिन्हें ‘हविर्भाग’ कहा जाता था, उन हविर्भागों को ईश्‍वर तक पहुँचाती है।

यज्ञ संस्कृति के पश्‍चात् ‘अर्चन’ इस मार्ग का अवलंबन द्वापार-युग में किया जाने लगा। ‘अर्चन’ अर्थात समन्त्रक पूजन। द्वापारयुग में ईश्‍वर की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं और इन्हीं मूर्तियों की पूजा की जाने लगी। अर्थात ध्यान और यजन इन मार्गों में अमूर्त रहनेवाले ईश्‍वर द्वापार युग में मूर्तिस्वरूप में आ गए। अर्थात जो अंतिम एवं आद्यतत्त्व हैं ऐसे परमात्मा जो केवल ऋषियों के चिंतन में थे, जो प्रत्यक्ष रूप में सगुण साकार दिखायी नहीं देते थे, उन्हीं की ऋषिसंस्था के द्वारामूर्ति बनायी जाकर, जिन्हें हम देख सके ऐसे रूप में ईश्‍वर की भक्ति की जाने लगी। सत्त्वगुण का र्‍हास हो जाने के कारण निर्गुण निराकार की उपासना करना साधारण मानव के लिए कठिन हो गया था, यह देखकर ऋषिसंस्था के द्वारा यह महत्त्वपूर्ण कार्य किया गया, क्योंकि ऋषि जानते थे कि प्रभु के सगुण-निर्गुण रूप में कोई अन्तर नहीं हैं।

सत्त्वगुण के र्‍हास की यह प्रक्रिया युगप्रवाह में चलती रही और कलियुग में हुए सत्त्वगुण के अत्यधिक र्‍हास को ध्यान में रखते हुए, ऋषियों ने कलियुग के मानव को कलियुग में सब से आसान रहनेवाले मार्ग का यानी भक्तिमार्ग का अवलंबन करने को कहा। यही है वह ‘नामसंकीर्तन’ का मार्ग! अर्थात इस युग में केवल नामस्मरण करने से ही ईश्‍वर प्राप्ति हो सकती है। ध्यान, यज्ञ एवं पूजन करने में कलियुग के मानव को कठिनाई पेश आ सकती है यह ध्यान में रखते हुए ऋषिसंस्था के द्वारा यह मार्ग दिग्दर्शित किया गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि कलियुग में ध्यान, यज्ञ और पूजन यह सब करना गलत है अथवा करने की ज़रूरत ही नहीं है ऐसा बिलकुल भी नहीं है, परन्तु नामस्मरण के आसान साधन का ही अवलंबन करके भगवान की प्राप्ति साधारण मानव कर सकता है, यह दिलासा सामान्य मानव को नामस्मरण के मार्ग से मिल गया। नामसंकीर्तन का उल्लेख करके अगली पंक्ति में हेमाडपंत कहते हैं – ‘गुरुभजन कलियुग में’ अर्थात कलियुग में गुरुभजन करना यानी सद्गुरुभक्ति करना यह ईश्‍वरप्राप्ति करने का सहज एवं सरल मार्ग है।

नामस्मरण और सद्गुरु-भजन ये दो बातें बताने का महत्त्वपूर्ण कारण है – कलियुग के मनुष्य की अल्प-सत्त्वगुण-स्थिति। मनुष्य की स्थिति अर्थात उसके मन की स्थिति और हमने पहले जो देखा कि उत्तरोत्तर युगानुसार होनेवाले सत्त्वगुण के पतन के कारण कलियुग में इस दृष्टिकोन से देखा जाए तो अन्य सभी युगों की तुलना में सत्त्वगुण का अत्यधिक र्‍हास इसी युग में हुआ है। अर्थात मन में होनेवाले सत्त्वगुण के अधिक्य के कम हो जाने से रज और तम ये गुण अपने आप ही बढ़ जाते हैं। इन दोनों गुणों के बढ़ जाने से चंचलता, जडत्व, अज्ञान आदि विकार मनुष्य में निर्माण हो जाते हैं और इनके बढ़ जाने से मर्यादा उल्लंघन का प्रमाण भी बढ़ जाता है।

कलियुग में चंचलता एवं अज्ञान को दूर करने के लिए अर्थात मर्यादा उल्लंघन को टालने के लिए सद्गुरु का नाम यह सर्वश्रेष्ठ है।

कलियुग में मन की चंचलता और अज्ञान को ध्यान में रखते हुए ही नामस्मरण एवं भजन ये साधन बतलाये गए हैं। अर्थात जितना हो सके उतने समय तक भगवान के नाम का स्मरण करना, गुणगान करना यह मन में सत्त्वगुण को बढाता है। मन पर नियंत्रण बनाये रखना यह किसी भी मनुष्य के लिए असंभव सा है। एकमात्र वे परमात्मा ही हैं, जो ॐकार स्वरूप हैं, जो इस विश्‍व के आदिस्वरूप हैं, विश्‍व के आदिबीज हैं, वे ही केवल हर एक सजीव के मन पर नियंत्रण बनाए रख सकते हैं। उस मन को काबू में रखने में एवं मर्यादा में रखने का काम केवल परमात्मा ही कर सकते हैं और इसीलिए परमात्मा का, सद्गुरु का, साईराम का नाम लेना और गाते रहना ही हर एक मनुष्य के लिए आवश्यक है।

नाम और नामी अर्थात भगवान का नाम और भगवान ये एक ही हैं।

कैसे? यह समझना बिलकुल आसान बात है।

जैसे हम किसी वस्तु का नाम लेते हैं उस समय उस वस्तु का चित्र मन पर अंकित हो जाता है। अर्थात जब हम ‘पुस्तक’ यह शब्द कहते हैं, तब उस पुस्तक की आकृति हमारे मानसपटल पर उभर आती है।

मनुष्य के बारे में भी कुछ ऐसा ही होता है। सामने रहनेवाले किसी मनुष्य को जब हम उसका नाम लेकर बुलाते हैं, तब वह मनुष्य ही स्वयं आता है या हामी भरता है।

इन दो उदाहरणों से हम जान सकते हैं कि किसी भी वस्तु के अथवा मनुष्य के नाम में उस वस्तु या मनुष्य का समग्र अस्तित्व बना रहता है। ठीक इसी तरह भगवान का नाम ही भगवान स्वयं होते हैं। जब कभी भी हम यह भगवान का नाम लेते हैं उस वक्त उस नाम के साथ ही भगवान की आकृति उस नाम के साथ हमारे मन में अंकित हो जाती है और जब हम उस भगवान को पुकारते हैं, तब भगवान हमारी उस पुकार को प्रत्युत्तर देते ही हैं।

तात्पर्य यह है कि नामसंकीर्तन से अर्थात भगवान का नाम लेने से मनुष्य को दो लाभ सहज ही हो जाते हैं। एक – भगवान की आकृति हमारे मन में अंकित हो जाती है और दूसरा यह है कि हमारे द्वारा किए जानेवाली हर एक पुकार के साथ ये साईनाथ हमारी पुकार का प्रत्युत्तर देते ही हैं। और यही कहलाता है मेरी पुकार को उनके द्वारा दिया जानेवाला प्रतिसाद (रिस्पाँज़)।

भजन करना यानी क्या करना? हम से जितना हो सके उतना, जैसा हो सके वैसा भगवान का नाम लेते रहना। इसके लिए हमारी आवाज़ चाहे जैसी भी हो, सुर कैसा भी हो, इन सब बातों से भगवान को कोई भी फ़र्क नहीं पड़ता है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि नामस्मरण हो अथवा भजन, इसके लिए समय, स्नान आदि बातों का, विधि-निषेध आदि नियमों का कोई भी बंधन नहीं होता है। अर्थात मनुष्य को नामस्मरण करने के लिए अथवा भजन करने के लिए किसी भी प्रकार का बंधन नहीं होता। किसी भी प्रकार का बंधन न होने के कारण उस क्रिया में और भी सहजता आ जाती है। बाकी के साधनों का अवलंबन करते समय ‘कहीं मुझ से इसमें कोई गलती न हो जाये’ यह डर मानव के मन में रहता है; वहीं, नामस्मरण के मार्ग में इस तरह की सारी कठिनाइयों को दूर कर दिया गया होने के कारण सब कुछ आसान हो जाता है।

नामसंकीर्तन को ही सामान्य मानव प्यार से नाम गुनगुनाना कहते हैं। इससे एक और भी महत्त्वपूर्ण फायदा होता है और वह है – भगवान का नामसंकीर्तन, गुणसंकीर्तन करते समय भगवान से प्रेम करनेवाले संतों की, भक्तों की रचनाओं का जन्म होता है। इन रचनाओं के माध्यम से भगवान के नाम के साथ ही भगवान के गुण भी विशेष तौर पर वर्णित किया गया होता है। इस माध्यम से अपने आप ही भगवान के नाम के साथ साथ भगवान के गुणों का भी गायन होता है। नाम-गुण-संकीर्तन के इस मार्ग से भगवान की आकृति के साथ ही उनके गुण भी मेरे मन में दृढमूल होने लगते हैं। बढ़ते हुए नाम-गुण-संकीर्तन के साथ साथ भगवान की आकृति और भगवान के गुण मेरे मन को अपने अधिकार में, नियन्त्रण में ले लेते हैं और एक बार जब इस तरह से भगवान की सत्ता मन पर स्थापित हो जाती है, तब मन के भटकने का सवाल ही कहाँ उठता है! इसीलिए तो साईनाथ सुस्पष्ट शब्दों में गवाही देते हैं –

जब भी कोई मानव मेरे चरित्र का, मेरे यश का, मेरे गुणों का प्रेमभाव से गान करता है, फिर उसके उस गान में भाषा की, शब्दों की कोई गलती भी क्यों न हो जाये, मग़र तब भी मैं मेरे उस भक्त के आगे-पीछे,चारों ओर खड़ा रहता ही हूँ।

साक्षात् साईनाथ ने ही जब ऐसी गवाही दी है तो फिर मनुष्य को निर्भय होकर, नि:संदेह रूप से सद्गुरु-नाम-गुण-संकीर्तन करना चाहिए। इस कलियुग में सद्गुरुचरण प्राप्त करने के लिए मुझे बस मेरे साईनाथ के नाम का, गुणों का संकीर्तन करते रहना चाहिए। फिर साईनाथ का सदैव सान्निध्य मुझे अवश्य ही मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं है।