श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१८)

कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति करने के लिए सामान्य मनुष्य को सब से आसान मार्ग दिया गया है और वह है, ‘सद्गुरु का नामसंकीर्तन एवं भजन करना’। यह बात २७वी ओवी में स्पष्ट करके इसके पश्‍चात् हेमाडपंत श्रीसाईसच्चरितरूपी नामसंकीर्तन के संदर्भ में अपना अनुभव स्पष्ट करते हैं।

श्री साईसच्चरित यह और कुछ नहीं बल्कि साईनाथ का नाम-गुण-संकीर्तन ही है,साईनाथ का भजन ही है। इसी तरह श्री साईसच्चरित में श्री साईनाथजी का नामसंकीर्तन, भजन एवं गुणसंकीर्तन ये तीनों ही एक स्थान पर एकसाथ ही एकत्रित रूप में एकजूट हो गए हैं। अर्थात साईनाथ ने हेमाडपंत के द्वारा हर एक सामान्य मनुष्य के लिए इस चरित्र को शब्दबद्ध करवा लिया है।

साईनाथ के भक्तों के कथाओं से हर एक भक्त को बोध ग्रहण करना चाहिए और अपने जीवन को समृद्ध बनाते हुए ईश्‍वरप्राप्ति की दिशा में अधिक से अधिक प्रयास करते रहना चाहिए। यह तो हुआ इस चरित्र का एक उद्देश्य परन्तु दूसरा महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ऊपर कहेनुसार सद्गुरु साईनाथ का नामसंकीर्तन, भजन एवं गुणसंकीर्तन यह भी है, जो हर कोई आसानी से कर सकता है। पूर्ण साईसच्चरित का पाठ करना हो अथवा साईसच्चरित के एक पृष्ठ या एक अध्याय को पढ़ना हो। इस प्रक्रिया में भी श्रीसाईनाथ के नाम के साथ-साथ उनका भजन भी होने ही वाला है, लेकिन उसमें निरंतरता का होना ज़रूरी है।

किसी के मन में यह प्रश्‍न उठ सकता है कि भक्ति में इस निरंतरता की क्या आवश्यकता है? जब मेरा मन चाहेगा तब मैं भक्ति करूँगा। इस प्रश्‍न का उत्तर आसान है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईएक साधारण सी बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि हम सप्ताह में केवल एक अथवा दो बार ही भोजन नहीं करते हैं बल्कि प्रतिदिन बगैर भूले दो बार तो भोजन करते ही हैं ना? तो फिर परमात्मा का नाम क्या केवल मुझ पर कोई संकट आता है, कोई समस्या निर्माण हो जाती है, मेरी विकास की गाड़ी फँस जाती है, उसी समय लेना चाहिए? मान लो कि यदि मेरे संकट के समय, समस्या के निर्माण होने पर मैं उस परमात्मा को पुकारता हूँ अथवा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू करता हूँ उनका नाम लेकर और उस वक्त मान लो उन्होंने कोई प्रतिसाद (रिस्पाँज़) नहीं दिया तो? खैर, ऐसा न तो कभी न हुआ है और ना ही कभी हो सकता है। जो कोई भी इस श्रीराम के, श्रीकृष्ण के, श्रीसाईनाथ के, इस परमात्मा के मार्ग पर चलता है, उस हर एक के साद को ये परमात्मा ‘प्रतिसाद’ देते ही रहते हैं। केवल उनके द्वारा दिया गया ‘प्रतिसाद’ मुझे सुनने आना चाहिए। इसके लिए मुझे मेरे कान, मेरी आँखें सदैव सावधानी के साथ खुली रखना सीखना चाहिए।

जिन परमात्मा ने हम मनुष्यों को ये सुंदर जीवन प्रदान किया है, उन परमात्मा को यदि हम हमारे जीवन में रोज़ कम से कम चौबीस मिनट भी नहीं दे सकते हैं तो हमारी साद (पुकार) को उनके द्वारा दिये गये प्रतिसाद को भला हम कैसे सुन सकते हैं, कैसे देख सकते हैं और उसका अनुभव भी कैसे कर सकते हैं।

अध्यात्म एवं भौतिक जीवन ये देखा जायें तो भिन्न नहीं हैं बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक ही हैं और इसीलिए for every action there is an equal and opposite reaction (फॉर एव्हरी अ‍ॅक्शन देअर इज़ अ‍ॅन इक्वल अ‍ॅन्ड ऑपोझिट रिअ‍ॅक्शन) यह विज्ञान का नियम और साद-प्रतिसाद का यह सिद्धान्त एक-दूसरे को स्पष्ट करने में मदद करते हैं।

परमात्मा को किसी भी क्षण, किसी भी समय, किसी भी स्थिति में साद लगाने की पूरी स्वतंत्रता परमात्मा ने हर एक मनुष्य को दे रखी है। इसीलिए मुझे परमात्मा को साद देने आना चाहिए। परमात्मा को केवल मेरे दुखों के समय, संकटों के समय, कोई समस्या निर्माण हो जाने पर ही साद न देते हुए मेरी खुशी के, सुख के समय, सफलता मनाते समय भी सादे देते आना चाहिए। जो प्यार से साद देता है, उसकी परमात्मा संकट की घड़ी में, कोई भी समस्या आने पर स्वयं आकर सहायता करते हैं और इस बात का अनुभव तो हर किसी की अपने आप ही होते रहता है। लेकिन इस साद में निरंतरता होनी चाहिए, सातत्य होना चाहिए।

इस निरंतरता एवं सातत्यता से ही यह साद संवाद बन जाती है और अपने आप हेए परमात्मा के नाम-गुणसंकीर्तन एवं भजन का रूप धारण कर लेती है। यह कब कैसे हो जाता है, इस बात का पता तक हमें नहीं चल पाता है, इतनी यह सहज प्रक्रिया है।

साईनाथ का नाम-गुण-अनुभव-संकीर्तन एवं भजन करने के लिए मनुष्य के पास केवल वाणी होनी चाहिए, जो साई के द्वारा मनुष्य को विचार-अभिव्यक्ति-हेतु दिया गया एक उपहार है। बाकी के अन्य सजीवों को मनुष्यों के समान शब्दोच्चारण करने की अर्थात बोलने की कला प्राप्त नहीं हुई है। यह देन केवल मानव को ही प्राप्त हुई है। अत एव मनुष्य इसका उचित उपयोग करें, यही परमेश्‍वर की सदैव इच्छा होती है और इस वाणी का उचित उपयोग करना यानी भगवान का नाम मुख से लेना और गाना।

यह सब कुछ समझ लेने के बाद हम समझ सकते हैं कि उस अकारण करुणामयी परमात्मा ने कलियुग के मनुष्य को नाम लेने एवं गाने के लिए आसान साधन एवं सहज सुलभ मार्ग भी दर्शाया है और इसके लिए वाणी भी प्रदान की है।

यहाँ पर एक प्रश्‍न उठता है कि जो बोल ही नहीं सकते हैं उन्हें क्या करना चाहिए? इसका उत्तर भी बिलकुल आसान है कि ऐसे लोगों को मन ही मन प्रभु नाम लेना है। बोल सकने वाला मनुष्य भी मन ही मन भगवान का नामस्मरण कर सकता है। भगवान को चींटी के पैर में बँधे हुए घुंघरु की आवाज़ भी सुनाई देती हैं, तो फिर उन्हें किसी के भी द्वारा मन ही मन स्मरण किया जानेवाला नामस्मरण भी सुनाई देता ही है, यह तो स्वाभाविक है। लेकिन जिसके लिए संभव है उसे मुख से ही नाम लेते रहना चाहिए। इसमें भी उस मनुष्य का ही फायदा रहता है। क्योंकि मन ही मन नाम लेते रहने से मन की चंचलता के कारण कई बार मनुष्य नाम लेना भूल भी सकता है, लेकिन मुख से नाम लेते समय मन यदि कहीं पर भटक भी जाता है, तब भी मुख का काम चलता ही रहता है, जिससे कि कम से कम श्रवण होता रहता है।

किसी भी मनुष्य को उसे प्राप्त होनेवाले वर्तमान में अर्थात इसी मनुष्य जन्म में यह संभव है और इस बात को हर मनुष्य को समझना ही चाहिए। हेमाडपंत आगे कहते हैं –

जब तक है इस शरीर में श्‍वास (साँस)।
निज-कार्य करवा लीजिए॥

यह ओवी हर एक मनुष्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हेमाडपंत साईनाथजी से प्रार्थना करते हैं कि हे साईनाथजी, जब तक इस शरीर में प्राण हैं यानी जब तक देह में जान है, जीवन है, तब तक आप मुझ से जो कार्य करवाना चाहते हो वह करवा लीजिए।

हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि हर मानव को आनन्दमय बनाना यानी हर मानव को ‘उस’ परमात्मा की प्राप्ति करवाना यही साईनाथजी का अपना निजकार्य है।