श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१६)

तृतीय अध्याय को हेमाडपंत ने ‘ग्रंथप्रयोजन-अनुज्ञापन’ यह नाम दिया है। ग्रंथप्रयोजन का अर्थ है – ग्रंथ किस कारण से लिखा गया है यानी ग्रंथ लिखने का उद्देश्य। अनुज्ञापन का अर्थ है आज्ञा। ग्रंथ का प्रयोजन स्वाभाविक रूप में यही है कि परमात्मा श्री साई की लीलाओं की, उनकी महिमा की जानकारी हर एक मनुष्य को मिल सके और मुख्य तौर पर उन लीलाओं का श्रवण, पठन, चिंतन, मनन हर एक मनुष्य कर सके अर्थात परमात्मा के नाम का, गुणों का और अनुभवों का संकीर्तन वह कर सके, यही इस श्रीसाईसच्चरित का प्रयोजन है।

अनुज्ञापन अर्थात ग्रंथ लेखन के लिए साईबाबा के द्वारा दी गई आज्ञा। इसके संबंध में द्वितीय अध्याय में विस्तृत वर्णन किया गया है। हेमाडपंत को साई ने आज्ञा दी, उन्होंने इसी के अनुसार अपने लेखन-कार्य का आरंभ किया और साई ने ही इस ग्रंथ को उनसे पूर्ण करवाया। हेमाडपंत बारंबार यही बात श्रोताओं के दिलों-दिमाग में दृढ़ करते रहते हैं कि इस ग्रंथ की रचना मैंने नहीं की है, बल्कि साईबाबा ने मुझसे करवायी है। कहने का तात्पर्य यह है कि बाबा ने हेमाडपंत से सद्गुरुतत्त्व का गुणसंकीर्तन, नामसंकीर्तन और भजन ये तीनों कार्य एक साथ ही इस चरित्र लेखन के साथ-साथ करवा लिये हैं।

यहाँ पर हेमाडपंत की एक पंक्ति गौर करने जैसी है। वे कहते हैं कि साक्षात् परमात्मा का – सद्गुरु का चरित्र लिखना यह कोई सीधा-सादा काम नहीं हैं, यह कार्य तो वे ही करवा सकते हैं। हर किसी को साईनाथ ने कुछ न कुछ काम दे ही रखा है, ङ्गिर उन्होंने मुझे जो लेखन का काम दिया है, जो आज्ञा मुझे दी है, उसे मैंने शिरोधायर्र् कर लिया, क्योंकि जहाँ साईनाथ के रूप में साक्षात् परमात्मा ही मेरे साथ हैं, वहाँ मैं भला क्यों अपना काम करने में हिचकिचाऊँ।

यदि कार्य यह नहीं है सामान्य।
आज्ञा मान ली सिर आँखों पर।
बाबा समान वक्ता के होने पर।
कैसा हिचकिचाना॥

किसी के हाथों बंधवाया मंदिर।
किसी को कीर्तन में बिठा दिया।
किसी को तीर्थयात्रा के लिए भेज दिया।
मुझे बिठा दिया लिखने के लिए॥

सद्गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य करना इस गुण को हम हेमाडपंत में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। मैं कौन हूँ, कैसा हूँ, क्या हूँ, मैं क्या कर सकता हूँ ये सभी बातें इतना अधिक महत्त्व नहीं रखती हैं, बल्कि मुझे मेरे साईनाथ ने क्या आज्ञा की है, यह बात ज़्यादा अहमियत रखती हौ और उस आज्ञा का पालन मुझे ज़रूर करना ही है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईऔर दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सद्गुरु के प्रति मेरी निष्ठा अनन्य रखनेवाले, रखवानेवाले भी परमात्मा ही हैं। ऐसे में मुझे अपनी ओर से पूरा प्रयास करना ही है। हेमाडपंत का दृढ़ निश्‍चय भी यहाँ पर काफ़ी महत्त्व रखता है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हेमाडपंत के पास किसी भी प्रकार का कुतर्क करने की वृत्ति नहीं थी। ‘मुझे लिखने के लिए ही क्यों बिठा दिया, दूसरों को कीर्तन करने को कहा, ऐसा क्यों?’ इस प्रकार का कोई भी प्रश्‍न उनके मन को कहीं पर भी कभी नहीं उठता है। इसीलिए वे स्पष्ट रूप में कहते हैं कि ‘मुझे बिठा दिया लिखने के लिए’। मुझे क्या काम दिया और दूसरों को क्या काम दिया। इस प्रकार की चर्चा जब हमारे मन में शुरू हो जाती है, उस वक्त उसी तुलना में से मत्सर का जन्म होता है। और अन्य किसी भी कार्य की अपेक्षा मत्सर ही मनुष्य का सर्वाधिक नुकसान करता है। इसलिए तुलना और तुलना के साथ ही आनेवाली मत्सर की भावना यह सर्वाधिक घातक सिद्ध होती है। और हेमाडपंत ने यहाँ पर इस तुलना और मत्सर को सहज ही उठाकर दूर फेंक दिया है।

हेमाडपंत यहाँ पर इन पंक्तियों के माध्यम से हमें यही सीख दे रहे हैं कि मेरे सद्गुरु ने मुझे जो कुछ भी आज्ञा दी होगी, फिर चाहे वह मुझ अकेले के लिए (इन्डिव्हिजुअली) हो अथवा संपूर्ण समूह के लिए हो, उस आज्ञा का पालन मुझे करना ही है। और यही मेरा कर्तव्य भी है। दर असल यही मेरी प्राथमिकता (प्रायॉरिटी) है।

श्रीसाईसच्चरित का लेखन अर्थात् दूसरा-तीसरा और कुछ भी न होकर श्रीसाईनाथ का गुणसंकीर्तन एवं अनुभवसंकीर्तन ही है और यही बात हेमाडपंत स्पष्ट रूप में समझा रहे हैं।

कोई करता सत्कारपूर्वक पूजा-अर्चन।
कोई करता पादसंवाहन।
उत्कंठित हो उठा मेरा मन।
गुणसंकीर्तन करने हेतु॥

जिस पल सद्गुरु-मुख से कोई आज्ञा निकलती है, केवल आज्ञा ही नहीं बल्कि कोई शब्द भी निकलता है, तब वह शब्द भी काफ़ी महत्त्व रखता है। क्योंकि जब साक्षात् परमात्मा के मुख से कोई आज्ञा दी जाती है, उस समय उसी के अनुसार वह सच में उतरती भी है। इसीलिए हेमाडपंत यहाँ पर उदाहरण देकर यह समझाते हैं कि जहाँ पर की ज़मीन में थोड़ी सी भी नमीं नहीं होती है, उस रेतीली जमीन में कोई घास का एक पत्ता भी उगनेवाला नहीं होता है, ऐसी मुश्किल स्थिति में भी, परमात्मा की इच्छा यदि हो जाती है तो वहाँ पर घास का एक पत्ता तो क्या, बल्कि अच्छा-खासा घना वृक्ष भी वहाँ पर खिल उठता है। बिलकुल ऐसा ही कुछ मनुष्य के साथ भी होता है। मनुष्य के पास ज्ञान, अनुभव आदि कुछ भी न हो, मग़र जिस क्षण उसे सद्गुरु की आज्ञा होती है, उसी क्षण सारे चित्र भी बदल जाते हैं।

यही होती है वह गुरुकृपा, जो सद्गुरु की इच्छानुसार किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में भी सुंदर कार्य की निर्मिति कर देती है।

यही होती है गुरुकृपा की अचिन्त्यकर्तृत्वता।
कि जहाँ पर बिलकुल भी नमीं नहीं होती।
वहाँ पर भी वे घना पेड़ खड़ा कर देते हैं।
बगैर किसी प्रयास के ही॥

साथ ही हेमाडपंत यह भी कहते हैं,
मुझ गरीब की बिसात ही क्या।
मैंने कुछ भी नहीं किया फिर भी।
यह दयाघन बरसा मुझ पर।
मैं तो कुछ भी नहीं जानता॥

यही है वह सद्गुरु-कृपा, जिसका अनुभव हेमाडपंत ने किया। सद्गुरुकृपा यह अकसर अकारण ही होती है। सद्गुरु की कृपा और उनका प्रेम ये दोनों बातें अकारण होती हैं। यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात हर एक मनुष्य को ध्यान में रखनी चाहिए।

सद्गुरु का प्रेम एवं कृपा हर एक मनुष्य को उसकी योग्यता, उम्र, ज्ञान इन सबके बगैर भी प्राप्त होती ही रहती है। केवल उस कृपा एवं उनके प्रेम का स्वीकार करने के लिए मुझे हर पल तैयार रहना चाहिए। सद्गुरु की यह अकारण प्राप्त होनेवाली कृपा एवं प्रेम का स्वीकार करने हेतु तत्पर रहने के लिए अधिक से अधिक सद्गुरु-नाम-गुण-अनुभव-संकीर्तन करते रहना यह मेरे लिए अति-आवश्यक है।