श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-५५)

वाडे में क्या चल रहा था।
किस बात पर बहस चल रही थी।
क्या कहा इन ‘हेमाडपंत’ ने।
मेरी ओर देखते हुए कहा॥

ऊपर लिखित पंक्तियों के माध्यम से श्री. गोविन्द रघुनाथ दाभोलकरजी हमें उनके ‘हेमाडपंत नामकरण के प्रसंग’ को पूरी तरह स्पष्ट कर रहे हैं।

शिरडी में आते ही श्रीसाईसच्चरितकार ने बाबा के चरणों में धूलभेंट की और उसी क्षण उनके नवीन जीवन का आरंभ हो गया। इतना हो जाने के पश्‍चात् बालासाहेब भाटे के साथ उनकी बहस छिड़ गयी। ‘गुरु की आवश्यकता है या नहीं’ इस विषय को लेकर साईसच्चरितकार का जो वाद-विवाद आरंभ हो गया, इसमें साईसच्चरितकार के स्मरण में उनके मित्र का जो अनुभव था, उसी अनुभव के मुताबिक ही उन्होंने अपने मन में यह दृढ धारणा बना रखी थी कि अपना जो कुछ भी है हमें ही करना होता है, हमारे जीवन में जो होनी लिखी है उसे कोई भी टाल नहीं सकता है और इसी अनुभव के आधार पर वे बालासाहेब भाटे के साथ वाद-विवाद कर रहे थे। इस विवाद का ना तो कोई अंत था और ना ही इससे कुछ निष्पन्न होने वाला था। यह बात समझ में आने तक का़ङ्गी समय बरबाद हो चुका था और फिर उस बहस को वहीं पर रोक दिया गया।

इतना सब हो जाने के कुछ देर पश्‍चात् जब सभी लोग साथ मिलकर द्वारकामाई में पहुँचे, उस समय बाबा के उद्गार सुनकर साईसच्चरितकार विस्मित हो उठे। सबसे पहले उनके मन में यह प्रश्‍न उठा कि हमने यहाँ से काफी दूर पर बैठकर जो वाद-विवाद किया, उसका पता आखिर बाबा को पता कैसे चल गया? और उसी क्षण इससे पहले भी प्राप्त अनुभव उनके मन में अपनी छाप छोड़ ही चुका था। अब उनका इस परमात्मा के साथ होनेवाला रिश्ता और भी अधिक अटूट हो गया और बाबा के मुख से निकलने वाला नाम जो उनके लिए ही थी ‘हेमाडपंत’ इस नाम को श्रीगोविन्द रघुनाथ दाभोलकर ने धारण कर लिया।

हेमाडपंत नामकरण

जिस प्रकार श्रीविद्यामकरंद गोपीनाथशास्त्री पाध्ये ने बाबा के मुख से निकलने वाले वाक्य ‘अब तो विश्‍वास हो गया ना’ इस नाम को शिरोधार्थ कर लिया, गुरुमंत्र मानकर धारन कर लिया और उसी का जप करने लगे, उसी प्रकार बाबा के मुख से अपने लिए बाहर निकलने वाले ‘हेमाडपंत’ इस नाम को साईसच्चरितकार ने धारण कर लिया और एक अमानत के तौर पर उसका जतन भी किया।

हेमाडपंत यहाँ पर जिस विवाद के बारे में बात कर रहे हैं, सामान्य मनुष्य के जीवन में इस प्रकार के वाद-विवाद अकसर नियमित रूप में चलते ही रहते हैं। मानव के मन में यह द्वन्द्व बहुत बार चलता रहता है कि ‘क्या इस दुनिया में भगवान हैं? यदि हैं तो भी वे मुझे दिखायी नहीं देते? यदि दिखायी भी दें तो क्या ज़रूरी है कि वे भगवान ही होंगे? और यदि वे भगवान हैं तो फिर वे मेरे लिए कुछ करते क्यों नहीं हैं? दूसरों का जीवन कितना सरल और सुंदर है और मेरे जीवन में कितनी सारी समस्यायें आन पड़ी हैं?’ इस प्रकार की अनगिनत बातों को लेकर मनुष्य अपने आप से और दूसरों से बहस करता हैया कराते रहता है।

परन्तु यहाँ पर एक बात पर गौर करना चाहिए कि जहाँ पर विश्‍वास ही न हो वहाँ पर तो वाद-विवाद चलता ही रहेगा। ‘इस दुनिया में ईश्‍वर हैं, वे नहीं है ऐसी स्थिति हो ही नहीं सकती’ यह विश्‍वास सर्वप्रथम जिस पल दृढ़ होता है, उसी क्षण से आगे होने वाले वाद-विवादों की समस्याओं का समाधान होना आरंभ हो जाता है। जिस क्षण ‘वे’ हैं ही यह विश्‍वास दृढ़ होगा, उसके पश्‍चात् तुरंत ही ‘वे राम, वे कृष्ण, वे ही साइव् बनकर आते हैं और वे केवल हमारे लिए ही आते हैं’, इस बात का पता भी चल जायेगा।

जिस क्षण से वाद-विवाद का अंत होता है वही से संवाद शुरू हो जाता है।

वाद-विवाद यह हर समय केवल दो व्यक्तियों के बीच होनेवाला विवाद नहीं रहता है। हर एक मनुष्य के अपने ही मन में अकसर यही वाद-विवाद चलता रहता है। सच में देखा जाए तो हर एक मनुष्य को भगवान ने केवल एक ही मन दिया है। परन्तु जब वाद-विवाद का आरंभ होता है उस समय वह एक मन पक्ष एवं प्रतिपक्ष इन दोहरी भूमिकाओं को आसानी से निभाता रहता है।

मनुष्य-मनुष्य के बीच चलने वाला वाद-विवाद तो शायद खत्म भी हो जाता है। परन्तु मन ही मन चलने वाला यह वाद-विवाद का झमेला अर्थात स्वयं का ही स्वयं के साथ चलने वाला यह विवाद लम्बे समय तक चलत ही रहता है और ऊपर कहेनुसार इस विवाद का मुख्य कारण होता है, दृढ़ विश्‍वास का अभाव और जिस क्षण यह अभाव भाव में परिवर्तित हो जाता है, उसी क्षण से इस विवाद पर रोक लग जाता है।

इस दुनिया में ईश्‍वर है अथवा नहीं, इससे आरंभ होनेवाला वाद-विवाद, यदि ईश्‍वर पर दृढ़ विश्‍वास निर्माण हो जाता है तो ‘वे’ होते ही हैं और ‘वे’ मेरे लिए ही और मेरे ही होते हैं, इस संवाद में परिवर्तित हो जाता है।

इस वाद-विवाद के विषय में यदि हम चर्चा कर ही रहे हैं तो यह विवाद कहीं पर भी, किसी भी प्रकार से और कभी भी आरंभ हो सकता है। परन्तु इसे खत्म करने का सहज एवं आसान रास्ता होता है,‘संवाद’।

संवाद का निश्‍चित रूप में क्या अर्थ है? वह कैसा होता है? वह कैसे और किसके साथ करना चाहिए? इस प्रकार अनेकों प्रश्‍न हमारे छोटी सी बुद्धि को घेर लेते हैं।

संवाद करना है परमात्मा के ही साथ, उस साईनाथ के साथ, उस श्रीराम के साथ, उस श्रीकृष्ण के साथ, फिर हमारे सामने चाहे वह परमात्मा की मूर्ति हो, तसवीर हो। उसके साथ अपने मन में उठनेवाले सभी प्रश्‍न‘ जैसे हैं उसी प्रकार’ प्रस्तुत कर देना चाहिए अथवा उनसे मन की बात साफ साफ कह देनी चाहिए। इसी को कहते है ‘उनके’ साथ संवाद करना। लेकिन यहाँ पर भी दृढ़ विश्‍वास होना चाहिए कि यह मूर्ति अथवा यह तसवीर केवल मिट्टी अथवा कागज़ की न होकर वे साक्षात् मेरे परमात्मा ही हैं; फिर इस संवाद को करने के लिए किसी भी समय आदि का बंधन नहीं होता है।

जो मेरे अपने हैं उन्हीं के समक्ष मुझे अपने मन को पूरी तरह खोल देना है और वह भी मन में किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट रखे बिना, जैसा है ठीक उसी तरह मुझे कहना चाहिए।

एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की मदद करता है। उसे आधार देता है। उसकी बातें वह एक हद तक तो सुनेगा, लेकिन उसके बाद? आखिर उस दूसरे मनुष्य की कुछ मर्यादा तो होती ही है और वहीं तक वह दूसरे मनुष्य की सहायता कर सकता है। केवल अकेले ये परमात्मा ही ऐसे हैं जो मेरे लिए सब कुछ, किसी भी समय करने के लिए तैयार एवं तत्पर रहते हैं, परन्तु हमें वे दिखाई नहीं देते अथवा दिखायी देने पर भी हम उन्हें अनदेखा करते रहते हैं।

मेरे द्वारा की जाने वाली हर एक कृति को देखने वाले, मेरे हर एक आँसू को पोंछने वाले और मेरी छोटी से छोटी खुशी में भी आनंदित होनेवाले, इतना ही नहीं बल्कि मेरी हर एक उचित एवं मर्यादाशील कृति की प्रशंसा करनेवाले केवल ‘वे’ ही एक हैं, होते हैं और आगे भी होंगे ही।

इस तरह चौबीस घंटे मनुष्य के लिए तत्पर रहनेवाला सच्चा साथी केवल एकमात्र ‘परमात्मा’ ही होता है।

और जिस क्षण हमें इस बात का अहसास होता है। उसी क्षण से हमारा ‘उनके’ साथ संवाद शुरु हो जाता है। फिर हमारी हर बात, छोटी से छोटी बात हो अथवा बड़ी से बड़ी बात, बगैर किसी परदे के अथवा आनाकानी किए हम अपने उस साथी को बताते रहते हैं और जैसे जैसे यह संवाद शुरु होता है, फलने फूलने लगता है, उसी क्षण से इन वाद-विवादों के लिए कोई स्थान ही नहीं रहता है। अब मनुष्य का एक ही रहनेवाला मन, पक्ष-विपक्ष का विभाजन किए बिना ही ‘उस’ एक के साथ ही बात करते रहता है।

कहने का तात्पर्य यही है कि इस संवाद को स्थान, समय, फुरसत आदि का कोई भी बंधन नहीं रहता है। इसीलिए हर एक मनुष्य इस प्रकार का संवाद उस परमात्मा के साथ करने के लिए हर समय स्वतंत्र रहता है।

अत एव वाद-विवाद को खत्म करने के पीछे पड़ने की अपेक्षा ‘उन’ परमात्मा के साथ संवाद करते रहना ही सर्वथा उचित होगा। हमारे वाद-विवाद को खत्म करने के लिए हमारा यह साथी तत्पर रहता ही है।