श्रीसाईसच्चरित : अध्याय २ (भाग- ४६)

हेमाडपंत की साईचरणधूलि-भेट यह अत्यन्त अद्भुत घटना है, जिस घटना के कारण हेमाडपंत के जीवन में आमूलाग्र परिवर्तन आ गया। इस घटना का वर्णन पढ़ते समय हर एक श्रद्धावान के मन में यही भाव उत्पन्न होता है कि मेरे जीवन में ऐसा कब घटित होगा? मुझे बाबा की चरणधूल की भेंट कब नसीब होगी? सच में, ऐसी मुलाकात होना ही जीवन का परमोत्कर्ष है, जहाँ से जीवनविकास तेज़ी से होने लगता है। हमने अनेकों बार बाबा का दर्शन लिया होगा, परन्तु क्या हेमाडपंत के समान लोटांगण हमने कभी किया है? ये साईनाथ हर एक के जीवन को परमोत्कर्ष तक पहुँचाने के लिए तत्पर रहते हैं। परन्तु इसके लिए भक्त की तैयारी होनी चाहिए।

 साईचरणधूलि-भेट

हेमाडपंत की साईचरणधूलि-भेट यह अत्यन्त अद्भुत घटना है, जिस घटना के कारण हेमाडपंत के जीवन में आमूलाग्र परिवर्तन आ गया। इस घटना का वर्णन पढ़ते समय हर एक श्रद्धावान के मन में यही भाव उत्पन्न होता है कि मेरे जीवन में ऐसा कब घटित होगा? मुझे बाबा की चरणधूल की भेंट कब नसीब होगी? सच में, ऐसी मुलाकात होना ही जीवन का परमोत्कर्ष है, जहाँ से जीवनविकास तेज़ी से होने लगता है। हमने अनेकों बार बाबा का दर्शन लिया होगा, परन्तु क्या हेमाडपंत के समान लोटांगण हमने कभी किया है? ये साईनाथ हर एक के जीवन को परमोत्कर्ष तक पहुँचाने के लिए तत्पर रहते हैं। परन्तु इसके लिए भक्त की तैयारी होनी चाहिए।  हेमाडपंत के कहेनुसार सचमुच ‘नूतन जीवन वहीं से’ ऐसी उनकी स्थिति हो गई थी। उनके लिए नवीन सृजन हुआ था। जिस प्रकार पराग-कण (पॉलन ग्रेन्स) नवसृजन करते हैं, उसी प्रकार यहाँ पर साई के चरणकमलास्थित धूलि-परागकणों के कारण अण्णासाहब दाभोलकर को नया जन्म प्राप्त हो गया, वे ‘हेमाडपंत’ बन गए। आगे चलकर इसी अध्याय में बाबा ने उनका ‘हेमाडपंत’ नामकरण कैसे किया, यह कथा आती है, परन्तु उन्हें नया जन्म मिल गया, वह चरणधूलि-भेंट से ही। साईचरणरज यही एकमात्र परागकण हैं, जो भक्तों के जीवन में नवसृजन लाती हैं।

जीवनविकास का बीज हर किसी के अन्त:करण में होता ही है, केवल हमारे प्रारब्ध के कारण ही हम उसके अंकुरित होने में विरोध उत्पन्न करते रहते हैं। साईचरण का स्पर्श होते ही, साईनाथ का दर्शन होते ही हमारे विकास का बीज अंकुरित होने लगता है। हेमाडपंत हमें स्वयं के उदाहरण द्वारा यही बता रहे हैं।

साई-दर्शन का लाभ मिल गया। मेरे मन का विकल्प समाप्त हो गया।
साथ ही साई का सान्निध्य मिल गया। परमानंद की हो गयी प्राप्ति॥

साईसच्चरित पंचशील परीक्षा में, पंचमी परीक्षा के प्रात्यक्षिक पुस्तक में हम इससे संबंधित अध्ययन तो करते ही हैं। श्रीअनिरुद्ध ने वहाँ पर अत्यन्त सुंदर ढ़ंग से एक बात बतायी है। बीज को अंकुरित होने की क्षमता तो ईश्‍वर ने दे ही रखी होती है, केवल उस बीज को बाह्य आवरण को भेदकर बाहर आना होता है। हमारे जीवन-विकास के बीज के अंकुरित होने के आड़े विकल्परूपी आवरण आता रहता है। इस आवरण को भेदकर बीज में अंकुर फ़ूटने की क्रिया केवल साईनाथ के कृपा से ही हो सकती है।

विकल्प के खत्म होने की क्रिया ही महत्त्वपूर्ण होती है। हेमाडपंत को जब अपने मित्र के बेटे के जीवन में घटित हुई घटना का पता चलता है, तब उनके मन में भी इसी प्रकार का विकल्प निर्माण हो जाता है। परन्तु साई के प्रत्यक्ष दर्शन से ही वह विकल्प पूर्णत: झड़कर गिर पड़ता है। हमारे मन में भी इसी प्रकार के अनेक विकल्प आते रहते हैं। और इन्हीं विकल्पों के कारण ही हम विकास की दिशा में अग्रसर होने से वंचित रह जाते हैं। हम अपने विकास के लिए तरह तरह के उपाय करते रहते हैं। परन्तु इन विकल्पों का आवरण, इन विकल्पों के दल लाख कोशिशें करने के बावजूद भी नष्ट नहीं होते हैं। हम तो यह भी नहीं जानते हैं कि इन विकल्पों को किस तरह नष्ट करना है। परन्तु केवल साईनाथ की कृपा से ही ये विकल्प नष्ट हो जाते हैं। विकल्पों के नष्ट हुए बगैर विकास के बीज अंकुरित हो ही नहीं सकते हैं और विकास के बगैर आनंद की प्राप्ति भी नहीं हो सकती है।

आनंद यह कहीं बाहर से अंदर आने वाली चीज़ नहीं है, बल्कि वह अन्तर में ही प्रकट होती है। इसीलिए हेमाडपंत यहाँ पर कहते हैं- ‘परमानंद की प्राप्ति हुई’। आनंद की प्राप्ति तो हुई ही, वह भी कौन से आनन्द की, तो परमानंद की! ये सच्चिदानंद ही हर मनुष्य के हृदय में परमानंद के रूप में प्रकट होते रहते हैं वे इसी प्रकार स्वयं को प्रकट करते हैं। इसी बात की जानकारी हमें यहाँ पर प्राप्त होती है। आनंद, परम-आनंद केवल ये सच्चिदानंद ही प्रकट कर सकते हैं। यही रहस्य हेमाडपंत हमें यहाँ पर बता रहे हैं।

विकल्प का अवरोध दूर हो जाना यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात है और इस अवरोध को दूर कर भक्त को अनिरुद्धत्व प्रदान करनेवाले ये एकमात्र साईनाथ ही हैं। सूर्योदय होते ही जिस प्रकार से अंधकार का अवरोध अपने आप दूर हो जाता है, उसी प्रकार साईनाथ के दर्शन होते ही विकल्प का अवरोध तत्क्षण दूर हो जाता है तथा विकास की दिशा प्रकाशित होने लगती है। जिस तरह अग्नि के संपर्क में आते ही बर्फ़ का आवरण पिघल जाता है, उसी प्रकार साईनाथ का दर्शन होते ही, विकल्प का विलयन हो जाता है। कई दिनों से एक ही कमरे में बंद रहनेवाले मनुष्य को दरवाज़ा खोलकर बाहर आते समय जो आनंद होगा, उतनी ही खुशी विकल्प का आवरण झड़ जाने पर भक्त को होगी। सच पूछा जाये तो यहाँ पर हमने ही अपने प्रज्ञापराध के कारण इस दरवाज़े को बंद कर दिया होता है। परमेश्‍वरी कृपा के हमारे विकास के मार्ग में प्रवेश करने में हम ही अवरोध उत्पन्न कर देते हैं। यह दरवाज़ा हमारे प्रज्ञापराध के कारण इतना अधिक मजबूती से बंद हो जाता है कि हमारे प्रयत्न से इस का खुलना संभव ही नहीं होता है। हमारे तो क्या, अन्य किसी के भी प्रयत्न से भी वह नहीं खुलता है।

विकल्पों की अड़चनें केवल साईदर्शन से ही दूर हो सकती है। हमें चाहे कोई कितना भी बोध क्यों न करें, कितनी भी बातें क्यों न बतायें अथवा हमारे लिए कितनी भी कोशिशें क्यों न करें, मग़र फ़िर भी यह विकल्पों का अवरोध दूर नहीं होता। इस विकल्प को दूर करने के लिए मुझे केवल साईकृपा की ही ज़रूरत है। विकल्पों का, जिसे कोई भी खोल न सकें ऐसा दरवाजा पलक झपकते ही खोल देने का काम केवल साईनाथ ही कर सकते हैं। इसी लिए हमारे मन के विकल्प तब तक दूर नहीं हो सकते हैं, जब तक हमारे मन में साईदर्शन की आस नहीं जगती है। साई से मुलाकात करने की तड़प मन में उठना यही इन विकल्पों को दूर करने के लिए भक्त के द्वारा की गई पुकार है और ऐसे भक्त को स्वयं ही खींचकर अपने पास ले आकर दर्शन का योग निश्‍चित करना यह स्वयं श्रीसाईनाथ का प्रतिसाद ही है।

हेमाडपंत की साईदर्शन की उत्कंठा को हम इस अध्याय में तो देखते ही हैं। उनकी उत्कंठा अपनी चरमसीमा पर पहुँच चुकी थी। इसीलिए उस प्रथम मुलाकात में ही, बाबा का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त होते ही उनके मन में होनेवाला विकल्प अपने आप ही झड़कर गिर गया तथा उनके जीवनविकास का बीज अंकुरित हो उठा। हम ठहरे सामान्य मानव, हमारे अंदर हेमाडपंत के समान उत्कट भाव नहीं है, हमारे मन में तो कई बार न चाहते हुए भी विकल्प सिर उठाते रहते हैं। हम अंदर से यह भली भाँति जानते हैं कि ये विकल्प गलत हैं, हमारे विकास के विरुद्ध हैं, मग़र फ़िर भी ये विकल्प हमारा पीछा नहीं छोड़ते हैं।

इसके लिए हमें एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस पल इस साईनाथ के प्रति मन में कोई भी विकल्प आता है, उसी क्षण मेरे अपने घर में होनेवाले साईनाथ के सामने जाकर उनसे क्षमा माँगकर आँखें भर कर उन्हें निहारना चाहिए और बाबा से प्रार्थना करनी चाहिए कि बाबा मुझे और भी अधिक एकनिष्ठ बनाइए और इस विकल्प का समूल नाश कर दीजिए। हेमाडपंत कहते हैं कि बाबा के दर्शन से विकल्प खत्म हो जाते हैं और यह बिलकुल सत्य ही है। इसीलिए हमें बाबा का दर्शन करना चाहिए। बाबा को अपनी आँखों में समा लेना चाहिए और विकल्पों के आते ही साई-साई नामस्मरण करते हुए बाबा के चरणों में अपनी श्रद्धा को और भी अधिक दृढ़ करना चाहिए।

साईदर्शन करना यानी बाबा को निहारते रहना, बाबा के सगुण साकार रूप को, आँखें खुली रहें अथवा बंद, देखते रहना, उनका ही ध्यान करते रहना, इसके साथ ही बाबा को लोटांगण करना और बाबा के संवाद करना। ‘दर्शन’ का अर्थ केवल बाबा को देखकर वहाँ से चले जाना यह नहीं है। अब यही उदाहरण देखिए- हम सड़क से जा रहे हैं और सामने यदि कोई मनुष्य दिखाई देता है और वह यदि हमारे जान-पहचान का है, तो हम उसके साथ दो-चार बातें तो करते ही हैं ना! तो फ़िर यहाँ पर तो प्रत्यक्ष हमारे साईबाबा ही हैं तो क्या हमें रुकना नहीं चाहिए? क्या उनसे बात नहीं करनी चाहिए? हमारे मन में जो कुछ भी है, वह हमें बाबा को सच-सच बता देना चाहिए। ऐसे दर्शन से बाबा एक पल में ही हमारे मन में होनेवाले विकल्प को नष्ट कर देंगे। ऐसे भक्त को साईसान्निध्य का लाभ मिलेगा ही और साथ ही जीवन में परम आनंद भी प्रकट होगा। हेमाडपंत यहाँ पर हमें इसी बात का यक़ीन दिला रहे हैं।