श्रीसाईसच्चरित : अध्याय २ (भाग- ४७)

साई-दर्शन की यही महिमा। दर्शन से ही पलट जाये वृत्ति।
पूर्वकर्मों का भी क्षय हो जाये। विषयों की पकड़ भी घटने लगे॥

पूर्वजन्म का पापसंचय। कृपावलोकन से हुआ क्षय।
आशा खिल गयी आनंद अक्षय। देंगे चरण साई के॥

साई के दर्शन एवं साई के चरण भला क्या कुछ नहीं कर सकते हैं? सब कुछ कर सकते हैं।

साई के दर्शन में ही केवल मन की वृत्ति को विरुध्द दिशा में मोड़ देने का सामर्थ्य है। साई के दर्शन से ही पूर्वकर्मों का अर्थात प्रारब्ध का नाश होता है और साई-दर्शन से ही विषय वासनाओं में फ़ॅंसा हुआ मन वासनाओं के जाल से छूटकर परमार्थ की ओर, देवयानपंथ की ओर आगे बढ़ता है। बाबा की कृपादृष्टि ही हमारे पापसंचय को पल भर में ही जलाकर राख कर देती है और हमारे जीवन को आनंदमय बनाती है। साईचरण ही भक्तों के एकमात्र तारणहार हैं।

हमारे जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ने के प्रमुख तीन कारण हैं-

१) मन की बहिर्मुखता
२) पूर्वकर्म अर्थात प्रारब्ध
३) विषयप्रियता

 

हमारा मन आत्माराम की ओर अन्तर्मुख न होकर सदैव बाहरी इन्द्रियों की ओर दौड़ते रहता है। मन अकसर इन्द्रियों की ओर ही खींचता चला जाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि हमारा मन सदैव बहिर्मुख ही रहता है। आत्माराम जो हम सभी के हृदय में रहते हैं, उनको हम इसी बहिर्मुखता के कारण भूल जाते हैं और यहीं से हमारे जीवन में दुखों के शृंखला शुरू हो जाती है। हमारे मन का मुड़ना, उसमें परिवर्तन आना यही सबसे अधिक ज़रूरी होता है। बहिर्मुखी मन को अन्तर्मुख करने का यह अर्थ है कि इन्द्रियों की ओर प्रवृत्त मन को आत्माराम की दिशा में प्रेरित करना अर्थात मन की वृत्ति का ‘पलटना’।

मन की वृत्ति को ‘पलटने’ के लिए अलग-अलग मार्गों का अवलंबन किया जाता है परन्तु अन्य मार्गों से मन को पलटाना मुश्किल होता है और इस प्रकार से पलटा हुआ मन कब पुन: ‘पलटकर’ बहिर्मुखी बन जायेगा, यह भी कहा नहीं जा सकता है। मन पर नियंत्रण रखना भी अत्यन्त दुष्कर है। मनुष्य चाहे कितनी भी कोशिशें क्यों न कर लें, परन्तु मन पर काबू कर पाना उसके लिए असंभव होता है। मन यदि अपना है, अपने देह की बराबरी में अत्यन्त छोटा, सूक्ष्म, पर फ़िर भी हम स्वयं भी अपने इस मन को काबू में नहीं रख पाते हैं। अन्य मार्गो से मन को नियंत्रित करने की लाख कोशिशें करने पर भी वह हमारे वश में नहीं रहता है। केवल एकमात्र मन:सामर्थ्यदाता श्रीसाईनाथ ही इस मन को पलट सकते हैं। इसीलिए यहाँ पर हेमाडपंत कहते हैं- दर्शन से ही वृत्ति पलट जाये।

मन का ‘नम:’ हो जाना अर्थात वृत्ति का पलट जाना। साईदर्शन के कारण ही ‘मन:’ का ‘नम:’ हो जाता है। साईदर्शन से मन को उचित दिशा अर्थात अन्तर्मुखता प्राप्त होती है। मनुष्य के जीवन में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होती है दिशा। गलत दिशा में भटक जाने के कारण ही मन की शक्ति अनुचित रूप में खर्च होती रहती है और मन अधिकाधिक दुर्बल बन जाता है। इस मन को गलत दिशा में जाने से रोककर उसे पुन: घुमाकर अन्तर्मुख करना एवं मन को समर्थ बनाना, यह कार्य केवल साईनाथ के लिए ही मुमकिन है। बाबा के पास ही वह गुरुत्वाकर्षण शक्ति है, जिससे मन को अन्तर्मुख बनाया जा सकता है।

अन्य मार्ग से मन को पलटाने का झंझट करने की अपेक्षा साईनाथ को ही अपना मन सौंप देना यही सबसे आसान है। बाबा मेरे लिए जो कुछ भी उचित होगा वही करेंगे और मन कैसे पलटाना है यह भी वह जानते हैं। मानव का पलटा हुआ मन पुन: पलटी मार कर कहीं फिसल न जाये, इसके लिए वे स्वयं ही मानव के मन को अपने चरणों से बाँधकर रखते हैं। बाबा ही अपने भक्तों के लिए अथक परिश्रम करते रहते हैं यही बात हमें यहाँ पर पता चलती है। हम ‘कर्ता’ बनकर मन पर प्रक्रिया करने के बजाय साईनाथ को ही कर्ता बना दें, यही महत्त्वपूर्ण है। इसके पश्‍चात् ‘मेरे मन का क्या करना है,’ इसका निश्‍चय बाबा ही करेंगे। हमारी बुद्धि की औकात ही क्या है? इसकी अपेक्षा अपने मन को बाबा हवाले कर देना ही सहज एवं आसान मार्ग है।

बाबा के दर्शन का दूसरा लाभ है- प्रारब्ध का विनाश। जिस तरह सूर्य के समक्ष अंधकार एक पल  के लिए भी ठहर नहीं पाता है, उसी प्रकार इस साईनाथ के समक्ष प्रारब्ध का भोग ठहर ही नहीं सकता है। अब यहाँ पर हमारे मन में प्रश्‍न उठ सकता है कि बाबा के दर्शन इतनी बार करने पर भी हमारे प्रारब्ध का नाश क्यों नहीं हुआ, हमारे पाप जलकर खाक क्यों नहीं हुए? इसका कारण यह है कि क्या हम बाबा का ‘दर्शन’ मन:पूर्वक करते हैं? दर्शन करनेवाले के पापों का नाश, प्रारब्ध का नाश होता ही है, परन्तु क्या हम सच में ‘दर्शन’ करते हैं, इस बात का विचार हमें करना चाहिए। हम एक उदाहरण के द्वारा यह जान सकते हैं कि दर्शन करने से प्रारब्ध का नाश कैसे होता है।

मान लो कि हम किसी शादी में या समारोह में गए हैं और वहाँ पर एक कोने में एक पंखा खड़ा करके रखा गया है। मुझे काफ़ी गर्मी लग रही है, पसीने से मैं तर-बतर हो गया हूँ। अब यहाँ पर मुझे क्या करना चाहिए? मुझे पंखे के सामने जाकर खड़ा होना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी हैं कि उस पंखे एवं मेरे बीच कुछ भी नहीं होना चाहिए।

यदि मैं पंखे से दूर खड़ा रहकर कहूँगा कि मुझे अब भी गर्मी लग रही है, तो क्या मुझे हवा लगेगी? ठीक उसी तरह जब मैं साई का दर्शन करता हूँ, उस वक्त मुझे ‘मैं जैसा हूँ उसी स्थिती में खड़े रहकर’ दर्शन करना चाहिए, मेरे और मेरे साई के दर्शन के बीच किसी भी प्रकार की कल्पना, पूर्वग्रह अथवा अन्य कोई भी बात आड़े नहीं आने देनी चाहिए। मुझे पूर्णत: वर्तमान स्थिति में एकाग्रचित्त होकर अपने साई को निहारना होगा। मुझे साई से जो माँगना है वह तो मैं माँगूगा ही, परन्तु उसे माँगने के लिए मुझे साई के सामने ही खड़े रहकर माँगना चाहिए, ऐसा बिलकुल भी नहीं हैं। मैं दुनिया के किसी भी कोने में रहकर माँगूगा, तब भी मुझे जो मिलना है वह मिलेगा ही। साई के समक्ष जब मैं खड़ा हूँ तब मुझे जी भर कर साई को ही निहारना है। उनके और मेरे बीच कुछ भी आने देना नहीं चाहिए, किसी भी कल्पना को आड़े न आने देकर बाबा को आँखों के रास्ते मन में उतारकर रख लेना है।

जिस तरह पंखे के सामने खड़े रहने से गर्मी दूर हो जाती है, उसी तरह बाबा के दर्शन से प्रारब्ध का नाश होता है। इसके लिए दो महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना अति-आवश्यक है।

१) मैं अपने ऊपर किसी भी प्रकार का मुखौटा न लगाते हुए ‘जैसा हूँ वैसा ही’ बाबा के समक्ष खड़ा रहूँगा।
२) बाबा के और मेरे बीच किसी भी प्रकार का दिखावा मैं निर्माण नहीं करूँगा।

बाबा का ‘दर्शन’ कैसे करना चाहिए, इस संदर्भ में यदि इन दो मूलभूत बातों का भी हम ध्यान रखते हैं, तब भी हमारे मन में बदलाव अपने आप आ जायेगा, इसके साथ ही हमारे प्रारब्ध का नाश भी अवश्य होगा।

तीसरी बात यह है कि मन में उठनेवाली विषय-वासनाओं का आकर्षण भी कम हो जायेगा। ‘पसंद-नापसंद’ यह हमारे मन का महत्त्वपूर्ण गुणधर्म है। विषय-वासनाओं का आकर्षण रखनेवाले मन का, साई-‘दर्शन’ पाते ही, बुरे आकर्षण के प्रति होने वाला रूझान अपने आप ही कम होने लगता है। साथ ही साई-चरणों में मन दृढ़ होने लगता है। अकसर हमारी समस्या यही होती है कि परमार्थ में मन नहीं लगता है, विषय-वासनाओं में अपने-आप ही खींचा चला जाता है। मन को पलटने की लाख कोशिशें करने के बावजूद भी सफ़लता हाथ नहीं आती। इसीलिए हेमाडपंत यहाँ पर हमारे लिए साईदर्शन का राजमार्ग खोल रहे हैं। सचमुच यदि हम ‘दर्शन’ करना चाहते हैं तो इन दो महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर ही बाबा का ‘दर्शन’ करना चाहिए।

१) बिना कोई भी दिखावा किए, ‘जैसे हम हैं उसी स्थिति में’ बाबा के समक्ष खड़ा रहना।
२) बाबा और मेरे बीच किसी भी दीवार का निर्माण न करना।