श्रीसाईसच्चरित : अध्याय २ (भाग- २१)

अपने ‘मैं’ को अर्पित करते ही साई-चरणों में।
सौख्य पाओगे तुम अपरंपार।
संपूर्णत: सुखमय हो जायेगा तुम्हारा संसार।
अहंकार दूर हो जायेगा॥

अपने ‘मैं’ को साईं के चरणों में अर्पित करने पर साई की प्रेरणा जीवन में प्रवाहित होती है और इसी कारण हमारा हर एक निर्णय अचूक साबित होता है। क्योंकि उस हर एक निर्णय को अब ‘मैं’ नहीं बल्कि मेरे साई ही निश्‍चित करते रहते हैं। जिस तरह एक माँ अपने बच्चे के लिए सर्वोचित एवं सर्वोत्तम (APT) का ही चुनाव करती है, उसी तरह यह साईरूपी माता भी अपने बच्चे के लिए यानी मेरे लिए उचित का चुनाव करती रहती है। इसीलिए हमें अपने इस ‘मैं’ को बाबा के चरणों में ही अर्पित कर देना चाहिए। इसी में हमारा हित है, इससे हमें अपरंपार सौख्य प्राप्त होकर हमारा सारा जीवन ही सुखमय हो जाता है। सारा जीवन अर्थात ऐहिक जीवन के अन्तर्गत मन एवं बुद्धि के साथ-साथ पारलौकिक जीवन भी।

हेमाडपंत ने अपने इस ‘मैं’ को कब का श्रीसाई चरणों में अर्पित कर दिया था और इसी कारण साईप्रेरणा उनके जीवन में प्रवाहित हुई। साईप्रेरणा से ही साईसच्चरित विरचना की इच्छा उनके मन में उद्भवित हुई। यदि यह सच है, मग़र फ़िर भी उन्होंने ‘इस कार्य के लिए बाबा की अनुमति ज़रूरी है’ यह दृढ़ भावना अपने मन में रखी थी। स्वयं साईनाथ ही अपना चरित्र लिख सकते हैं, बगैर उनकी इच्छा के यह कार्य हो ही नहीं सकता है, यह वे जानते हैं। साई की इच्छा से ही मुझे यह प्रेरणा मिली है फ़िर भी ‘प्रत्यक्ष’ उनकी अनुमती की ज़रूरत है, यह भी वे मानते हैं। बाबा के देहधारी होते समय मेरे मन में साईसच्चरित लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई है और इसीलिए यह प्रत्यक्ष रूप में बाबा से ही पूछना अनिवार्य है, यही भाव हेमाडपंत के मन में उमड़ पड़ा। यही एक श्रेष्ठ भक्त का भाव है । मैं यदि कोई कार्य सद्गुरु की प्रेरणा से करता हूँ ऐसा लगता है, फ़िर भी यदि मेरे सद्गुरु मुझे प्रत्यक्ष मिल सकते हैं तब बगैर उनके प्रत्यक्ष अनुमोदन के मुझे वह कार्य नहीं करना चाहिए और विशेषत: वह कार्य सद्गुरु के साथ ही प्रत्यक्ष संबंधित है तब तो उनसे पूछना ही चाहिए। जब सद्गुरु से संबंधित ऐसा कोई कार्य करने की इच्छा मेरे मन में प्रकट होती है, तब इसके लिए प्रत्यक्ष रूप में उनकी अनुमती प्राप्त करना बहुत जरूरी है। यह साईनाथ का चरित्र है इसीलिए उनका अनुमोदन लेना बहुत ज़रूरी है यह बात हेमाडपंत भली-भाँति जानते हैं और वे हमें यही महत्त्वपूर्ण गुण सिखाते हैं कि कार्य चाहे कितना भी अच्छा और पवित्र क्यों न हो पर मुझे बाबा की प्रत्यक्षरुप में अनुमती लेकर ही उसे आरंभ करना है। बाबा के देहधारी होने पर उनसे प्रत्यक्षरुप में मिलकर उनके मुखसे अनुमति प्राप्त कर यह कार्य को आरंभ करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

मेरे मन में है इसलिए वह पूरा होगा ही, ऐसा न होकर हमारा विश्‍वास यह होना चाहिए कि बाबा के मुख से निकलेगा तो ही वह कार्य पूरा होगा, सुसंपूर्ण होगा यही इसके पिछे छिपा हुआ मर्म है। साईसच्चरित लिखना है यह मेरा संकल्प न होकर बाबा का ही संकल्प है यह बाबा के प्रत्यक्षरुप में कहने से ही स्पष्ट होगा। और बाबा का ही संकल्प पूर्ण सत्य है, यह बात हेमाडपंत अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिए हेमाडपंत निश्‍चय करते हैं कि इस कार्य के लिए बाबा की अनुमती प्राप्त करना बहुत ज़रूरी है। इसके बगैर मैं आगे कदम बढ़ाऊँगा ही नहीं, बाबा यदि मुझसे कहते हैं कि तुम यह काम न करके तुम यह यह काम करो तो वह भी मेरे लिए सिर आँखों पर ही है। मुझे कुछ भी स्वेच्छा से न करते हुए बाबा की इच्छा से ही करना है। हेमाडपंत का यह विशेष गुण हमारे लिए बहुत महत्त्व रखता है। बाबा जो भूमिका मुझे देंगे उसे मैं पूरी ईमानदारी के साथ निभाऊँगा, किसी अन्य की भूमिका कितनी भी अच्छी क्यों न हो परन्तु मैं उसे करने की कोशिश नहीं करूँगा कारण मेरे साईनाथ ही जानते हैं कि मेरे लिए उचित भूमिका कौन सी है?

हेमाडपंत के मन में साईसच्चरित लिखने की इच्छा का उद्भव होते ही बाबा की अनुमति बगैर उसे न करने का निश्‍चय उन्होंने कर लिया। अपने मन में उठने वाले इस विचार को साई को बताना हैं और उनका अनुमोदन लेना है इस बात को उन्होंने अपने मन में अच्छी तरह बाँध लिया था। परन्तु यह मुश्किल कार्य मुझ जैसे सामान्य मनुष्य के लिए और वह भी इस उतरती हुई अवस्था में मुझसे यह साध्य होगा या नहीं यह विचार भी उठा, इसलिए उन्होंने माधवराव से यह बात बताकर बाबा से इस बात की अनुमती लेने की बिनती की। माधवराव देशपांडे अर्थात बाबा का लाड़ला शामा। दिनभर बाबा की सेवा तो करते ही थे पर इसके साथ ही वे आने-जाने वाले भक्तों की सेवा भी बड़े अपनेपन के साथ करते थे। बाबा से प्रत्यक्षरुप में कुछ भी पुछने आदि का साहस बहुधा कोई भी नहीं करता था। माधवराव के कान पर अपनी बात डालकर भक्त अपनी तकलीफ़े आदि बाबा तक पहुँचाते थे। माधवराव भी यह काम बड़ी ही आत्मीयता के साथ करते थे, बिना किसी स्वार्थ के। माधवराव बिलकुल पारदर्शक भक्त थे इसीलिए अंदर से कुछ और बाहर से कुछ और ऐसा उनका स्वभाव बिलकुल नहीं था। बाबा पर उनकी अनन्य निष्ठा थी, अपरंपार प्रेम एवं निरंतर सेवा इन्हीं गुणों से परिपूर्ण ये भक्त अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ अन्त:करण के थे। इसी कारण वे ‘माध्यम’ बने, बाबा एवं भक्तों के बीच होने वाले संवाद के।

हमारे परमात्मा के साथ संवाद होने के लिए इसी प्रकार की पारदर्शकता ज़रूरी है यह बात हमें माधवराव से सीखनी चाहिए। उस समय शिरडी में जैसे यह बात निश्‍चित होती थी कि शामराव के माध्यम से बाबा के साथ संवाद साध्य करना है। वापस लौटने की आज्ञा लेनी हो आदि। शामा इस भोली भाविकता का आदर्श था और इसीलिए बाबा को उनकी चाहत थी। यही भोलीभावना भगवान को अधिक अच्छी लगती है। और यही भोलापन भगवान के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद साध्य करने का माध्यम होता है। इसी भोली भावना के कारण ही माधवराव बाबा के साथ सरलता से पेश आते थे कारण उनके अंदर कोई भी परदा नहीं था। द्वारकामाई की सीढ़ी केवल भोला भाविक ही चढ़ सकता है। अन्य कोई भी नहीं। हम देखते हैं कि कुछ लोगों को बाबा द्वारकामाई की सीढ़ी भी नहीं चढ़ने देते। जिनके पास जरा सा भी बिलकुल अत्यल्प भी भोलाभाव नहीं होगा ऐसा घमंडी इन्सान भला कैसे द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ेगा? मन में शंका, विकल्प आदि कुछ भी हो, साईं की परीक्षा लेने कोई भी आये परन्तु उसके मन में भोलाभाव है इसलिए बाबा उसे द्वारकामाई में प्रवेश करने देते हैं। ‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाईची की सीढ़ी है। हेमाडपंत बाबासे अनुमती माँगनेवाली कथा में सर्वप्रथम हमें इसी सत्य को उजागर करके दिखाते हैं। हेमाडपंत कहते हैं कि बाबा से प्रत्यक्षरूप में पूछने का साहस मुझमें नहीं था कारण यह मुझसे होगा या नहीं, मैं कहीं ‘छोटा मुँह बड़ी बात तो नहीं कर रहा हूँ ना? इस तरह के विचार उनके मन में उठ रहे थे। इसके अलावा अपनी योग्यता के प्रतिकूल बाबा से यह पुछना उचित होगा क्या? ऐसा भी उन्होंने सोचा होगा। वे अपना स्थान अच्छी तरह से जानते थे और यही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है।

ढूँढ रहा था योग्य अवसर । बाबा से पूछने का न था साहस।
आ गए माधवराव ‘सीढ़ी’ पर। उन्हें बता दिया मन का भाव॥

हेमाडपंत कहते हैं कि इस साईसच्चरित लिखने का जोश प्रखर रूप में उमड़ पड़ा पर मैं द्वारकामाई में बाबा के सामने होते हुए भी और वहाँ आस-पास किसी के न होने पर भी मुझमें इतना साहस नहीं हो रहा था कि मैं बाबा से पूछ लूँ। इतने में वहाँ पर माधवराव आ पहुँचे, द्वारकामाई की सीढ़ी पर चढ़े और उसी क्षण मैंने माधवराव को मेरे मन की बात बता दी।

यहाँ पर हेमाडपंत बड़े ही सुंदर तरीके से ‘माधवराव आ पहुँचे सीढ़ी पर’ यह पंक्ति लिखते हैं। यहाँ पार स्थूल रूप में वे द्वारकामाई के सीढ़ी तक आ पहुँचे यह तो एक अर्थ है ही, परन्तु इसके साथ ही ‘माध्यम’ बने यह अर्थ भी निकलता है। भक्त और भगवान के बीच किसी एजंट व्यक्ति की ज़रूरत नहीं होती। यहाँ पर माधवराव यह रूपक है भक्त के मन में रहने वाले भोले भाव का। सीढ़ी जिस तरह से दो मंजिलों को जोड़ने का माध्यम होती है, उसी तरह भक्त एवं भगवान को जोड़ने का काम करने वाला ‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाई की सीढ़ी है। हम सभी को द्वारकामाई में जाकर दर्शन लेने की, बाबा के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद करने की बहुत इच्छा होती है। यह सब हो यही तो साईनाथ की भी इच्छा होती है, पर द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ने के लिए हमारे अन्त:करण में भोले भाव का होना अत्यन्त महत्त्चपूर्ण है। साईनाथ का भोला-भाविक ही द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ सकता है और साईनाथ के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद कर सकता है। यही तत्त्व हेमाडपंत यहाँ पर हमें बता रहे हैं।