श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ५६)

हमने प्रथम अध्याय की कथा के द्वारा सद्गुरु दत्तात्रेय का ‘श्‍वान’ बनने के लिए मुझे क्या करना चाहिए, इसके बारे में अध्ययन किया। उन चार स्त्रियों का बाबा के पास द्वारकामाई में दौड़ते-भागते जाना अर्थात मेरे मन की उन चारों वृत्तियों का अन्तर्मन-स्थित सगुण सद्गुरुतत्त्व की दिशा में प्रवास करना यह मन का अन्तर्मुख होना है। बाबा की इच्छा एवं कृपा प्राप्त हुए बिना इस द्वारकामाई की सीढ़ी कोई भी नहीं चढ़ सकता है अर्थात बाबा की कृपा बिना अन्तर्मुखता प्राप्त हो ही नहीं सकती। इस साई की कृपा होने पर ही भक्त को इच्छा, फलाशा, तृष्णा एवं वासना इन चारों बहिर्मुख करने वाली वृत्तियों पर विजय प्राप्त करना आसान हो जाता है और इस विजय से ही शांति प्राप्त होती है। शांत रस की यह गंगा केवल इस साईनाथ के चरणकमल से ही प्रवाहित होती रहती है। मैं जब तक इच्छा, फलाशा, तृष्णा एवं वासना इन चारों वृत्तियों में बद्ध हूँ, तब तक मैं अशांत रहता हूँ। जिस पल ये साईनाथ मुझे अपना ‘दास’ बना लेते हैं, उसी वक्त संसृति के चक्कर से, आवागमन से मुझे मुक्ति मिल जाती है और शाश्‍वत सौख्य की अर्थात शांति की प्राप्ति होती है।

Saibaba_Dalan- अध्यायबाबा इन चारों स्त्रियों के माध्यम से ही गाँव की सीमा पर आटा डलवा देते हैं अर्थात अन्तर्मुख करने वाली निश्‍चय, ईश्‍वर समर्पण, तृप्ति, एवं सद्गुरु के प्रति उत्कटता इन चार वृत्तियों के द्वारा मुझे सुगंधितता एवं पुष्टि प्रदान करते हैं। सुगंधितता एवं पुष्टिवर्धन करने वाले ‘मृत्युंजय’ साईनाथ ही सभी प्रकार की महामारी का अर्थात अशांति का नाश करके मुझे शांतरस प्रदान कर सकते हैं। ‘गाँव में शांतत्व छा गया’ इस पंक्ति के माध्यम से हेमाडपंत हमारे गाँव में अर्थात हमारे देहरूपी गाँव में, जीवनरूपी गाँव में साईनाथ शांतरस कैसे प्रवाहित करते हैं, यही बतलाते हैं।

यहाँ पर ‘गाँव’ है भक्त का देहरूपी गाँव और उसकी ‘सीमा’ है उसकी ‘इन्द्रियाँ’। ‘सीमा’ का अर्थ है गाँव की सीमा। इन इन्द्रियों के माध्यम से ही हमारा मन बहिर्मुख होता रहता है। उसी तरह मन स्वयं उभयेंद्रिय, प्रेरक इन्द्रिय होकर भी वह स्वयं की ‘वास्तविकता को छोड़कर होने वाली कल्पानाओं’ के कारण बहिर्मुख बना रहता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच कर्मेन्द्रियाँ और ग्यारहवां मन भी हमारे देह की ‘सीमा’ अर्थात किनारा है। इसी किनारे से ही अशांतिरूपी महामारी हमारे देहरूपी गाँव में प्रवेश करती है। बाबा शिरडी के किनारे वाले जलप्रवाह के पास इन चारों से ये आटा डलवाते हैं अर्थात बहिर्मुखता के पास होने वाले जलप्रवाह के पास वह आटा डालते हैं। इसी कारण इन्द्रियों का जो ‘जलप्रवाह’ (आकर्षण) बाह्य विषयों के प्रति था, वह अब आत्माराम की ओर मुड़ जाता है। बाबा इन चार अन्तर्मुख-प्रवण इन्द्रियों से ही यह आटा गाँव की सीमा पर डलवाते हैं, मानो वे लक्ष्मणरेखा ही खींच रहे हो।

इस आटे का निर्माण बाबा स्वयं करते हैं और वह भी अपने जाँते से । इस महाविष्णु साईनाथ के सुदर्शन चक्र से ही शहद स्रवित होते रहता है और यह शहद ही शांति, तृप्ति, पुष्टि प्रदान करता है। यहाँ पर बाबा का जाता ही सुदर्शन चक्र का रूपक है। यह सुदर्शन चक्र ही अशांतिरूपी महामारी और भयरूपी वैरियों का नाश करता है। जाँते से निर्माण होने वाला आटा ही साईनाथ के सुदर्शन से स्रवित होने वाला शहद है। इसी शहद को देह की सभी सीमाओं तक हमारे सद्गुरु प्रवाहित करते रहते हैं। इसी कारण भक्त को शांति की प्राप्ति होती है। हमारे देह में प्रवेश करना चाहने वाली महामारी को बाबा कैसे भगा देते हैं, इसी बात का यह रूपक है। यहाँ पर ‘जलप्रवाह के किनारे पर आटा डालना’ यह महत्त्वपूर्ण कृति बाबा अंतर्मुख-प्रवण उन चार वृत्तियों से करवाते हैं। जो इन्द्रियाँ एवं मन पहले बाह्य विषयों की ओर दौड़ने वाले थे, उनका ‘प्रवाह’ बाबा से उलटी दिशा में था। उसके स्थान पर अब मन में सद्गुरुचरणों की चाह उत्पन्न होती है। बाबा के गेहूँ पीसने से तैयार होने वाले आटे से ही यह लीला हुई है। सद्गुरुचरणरूपी सागर की ओर बहने वाला ऐसा यह इन्द्रियों का मेला-रूपी जलप्रवाह अब प्रवाहित होने लगा है। और इससे महामारी का नामोनिशान मिट जाता है।

मैं अपने जीवन में यदि शांतिरस प्रवाहित हो ऐसा चाहता हूँ, तब मुझे इस अध्याय में होने वाली चारों स्त्रियाँ एवं ग्रंथरचयिता हेमाडपंत के समान श्रद्धा एवं सबूरी के महामंत्र का जाप करना चाहिए। साथ ही सद्गुरु की आज्ञा का पालन करने के प्रति दक्ष रहना चाहिए। ‘श्रद्धा-सबूरी से ही मुझे ‘प्रचिति’ मिलती है’, यह तत्त्व हम इस कथा के द्वारा ही सीखते हैं। पहले मुझे ‘प्रचीति’ मिलेगी, तभी जाकर मैं इस साईनाथ पर ‘श्रद्धा’ रखूँगा, ऐसा कहकर हम स्वयं ही अपने जीवन में बाधाएँ  उत्पन्न करते रहते हैं। यदि हमारे पास श्रद्धा एवं सबूरी है, तब प्रचिति अपने आप मिलेगी ही, इस बात को हम भूल जाते हैं। इस कथा की चारों स्त्रियों के अथवा हेमाडपंत के आचरण का अध्ययन यदि हम करते हैं, तब हमें पता चलता है कि बाबा के इन भक्तों ने कहीं पर भी ऐसा नहीं कहा है कि बाबा पहले आप ही इस महामारी का नाश करके दिखलाइए, तब ही जाकर हम आपको सद्गुरु मानेंगे और श्रद्धा-सबूरी धारण करेंगे। उलटे बाबा के गेहूँ पीसने बैठते ही ये चारों दौड़कर बाबा की इस क्रिया में शामिल हो जाती हैं।

मेरे ये साईनाथ साक्षात् ईश्‍वर ही हैं, ये सर्वसमर्थ भगवान ही हैं, यह उनकी दृढ़ श्रद्धा थी। साथ ही बाबा गेहूँ क्यों पीस रहे हैं, इस बात की जानकारी उन्हें नहीं थी, फिर भी उन्होंने बिना कोई प्रश्‍न किए सबूरी रखकर स्वयं की भूमिका पूरी निष्ठा के साथ निभायी।

सबूरी रखने का अर्थ यह विलकुल नहीं है कि हाथ पर हाथ रख निष्क्रिय बनकर बैठे रहना, बल्कि और भी अधिक दिल लगाकर अपना ध्येय साध्य होने तक सद्गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अपना काम पूरे विश्‍वास के साथ करते रहना। इन चारों स्त्रियों को बाबा के गेहूँ पीसने के कारण का पता नहीं था, मगर फिर भी बाबा पर होने वाला पूरा विश्‍वास- श्रद्धा-सबूरी धारण करके उन्होंने अपनी भूमिका भली भाँती निभायी। हमें भी इस गुणधर्म को यहाँ सीखना चाहिए। हम अपने ध्येय को पूरा करने के लिए जब कोई उचित कार्य आरंभ करते हैं, तब कभी-कभी अपेक्षित कालावधि में ध्येय दृष्टिपथ में नहीं आता। ऐसे में हमारा धैर्य छूट जाता है, हमारे पास सबूरी नहीं रह जाती है और अंत में श्रद्धा भी डमडमगा उठती है।

‘मेरे साईनाथ के होते हुए भी अब तक मुझे यश क्यों नहीं मिल रहा है? और कितना प्रयास करूँ?’ इस प्रकार के अनेक प्रश्‍न श्रद्धा-सबूरी को छेदते रहते हैं। परन्तु हमें इस पड़ाव पर ध्यान रखना चाहिए कि मैं अपना प्रयास उचित प्रकार से कर रहा हूँ, अपना काम भी ठीक से कर रहा हूँ, फिर मेरे बाबा उचित समय आने पर उचित फल मुझे प्रदान करेंगे ही। मेरे बाबा अपना काम सदैव भली-भाँति करते ही रहते हैं। मुझे अपना काम अचूक रूप में करते रहना चाहिए।

हमें कम से कम अपना ध्येय एवं उसका कारण तो पहले से ही ज्ञात होता है, परन्तु यहाँ पर गेहूँ पीसनेवाली कथा में उन चारों को तो कुछ भी पता नहीं था, फिर भी वे चारों पूर्ण श्रद्ध-सबूरी के साथ अपना काम करती हैं। हमें भी यह बात अपने आचरण में उतारनी चाहिए। ‘जहाँ पर श्रद्धा-सबूरी होगी वहाँ पर प्रचिति अवश्य ही आयेगी’, इस बात को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

मुझे पहले प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट ), गुणपत्र (मार्क शीट) मिलना चाहिए, तभी मैं परीक्षा के लिए पढ़ाई आरंभ करूँगा, क्या ऐसा हम कभी कहते हैं? फिर ‘पहले मुझे प्रचिति मिलेगी तो ही मैं तुम्हारी भक्ति करूँगा’ ऐसा बाबा से कहना क्या योग्य है? हमें इस बात का विचार करना चाहिए। हमें कोई चीज़ चाहिए इसी लिए बाबा को पुकारते हैं, मन्नतें मानते हैं।

‘बाबा, मेरा यह काम हो गया तो मैं तुम्हें भगवान मानूँगा’ ऐसा हम कहते हैं। परन्तु मुझे यहाँ पर यह सोचना चाहिए कि मेरा कोई काम हो या न हो इस बात पर क्या साईनाथ का ‘देवत्व’ निर्भर करता है? इस साईबाबा को इतना ‘छोटा’ बना देना, यही सबसे बड़ा प्रज्ञापराध है। हमें इसके बजाय यह कहने आना चाहिए कि बाबा मेरी ऐसी-ऐसी ‘समस्याएँ’ हैं और उनका समाधान हो इसके लिए मैं प्रार्थना कर रहा हूँ। परंतु बाबा! मेरी  ‘प्राब्लेम’ दूर हो या न हो, इससे मेरी श्रद्धा-सबूरी में कोई भी फर्क नहीं पड़ेगा, इसके लिए मैं सावधान रहूँगा, मुझे इसके लिए तुम शक्ति दो। तुम जो भी दोगे वह मेरे लिए उचित ही होगा, इस बात पर मेरा पूरा विश्‍वास है। बाबा, मेरी इस समस्या का समाधान यदि नहीं भी हुआ, तब भी मुझे इस बात से संतोष मिलेगा कि कम से कम इस समस्या के कारण मैं आपके चरणों तक आ पहुँचा हूँ, मैं आपके बारे में जान सका हूँ और यह सब हुआ है आप की ही कृपा से।

श्रद्धावान का भाव रहता है- ‘अब यदि मेरी इस समस्या का समाधान नहीं भी होता है, तब भी मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है, क्योंकि अब तुम्हारे पास आने पर सभी ‘प्रॉब्लम्स’ जिस मूल ‘बिग प्रॉब्लम’ के कारण आते हैं, उस ‘महामारी’ का नाश मेरे साई, केवल तुम ही कर सकते हो और उस सबसे बड़ी समस्या का समाधान करने वाले इस साईबाबा से मिलने पर बाकी की बेकार की समस्याओं की चिंता मैं भला क्यों करूँ?’