श्रीसाईसच्चरित : अध्याय- २ (भाग-२५)

उसी समय माधवराव ने। अन्य न था कोई दूजा वहाँ।
उचित अवसर देखकर। बाबा से पूछ ही लिया।

माधवराव की कार्यकुशलता के बारे में अध्ययन करते समय यह बात हमारी समझ में आती हैं कि भक्त को किस तरह से सावधानी बरतनी चाहिए। किसी भी काम को करते समय सावधानीपूर्वक ही कार्य करना चाहिए। आस-पास में दूसरा-तीसरा और कोई नहीं हैं, इस बात का पूरा विश्‍वास करके ही माधवराव ने बाबा के समक्ष हेमाडपंत के मन की बात कह दी। हेमाडपंत को साईचरित्रलेखन करने के लिए अब तक बाबा ने अनुमोदन नहीं दिया था, इसी लिए इस बात को दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करना उचित नहीं है, इस बात का ध्यान रखते हुए ही माधवराव ने यह सावधानी बरती। अन्यथा हेमाडपंत के मन की बात में किसी भी तरह की गोपनीयता थी ऐसा बिलकुल भी नहीं था, उलटे उनके मन की बात जितने अधिक से अधिक भक्तों तक पहुँचती, उतनी अधिक कथाओं का संग्रह किया जा सकता। परन्तु यह सब कब होगा? जब इस कार्य के लिए बाबा का अनुमोदन प्राप्त होगा तभी। इसी लिए यहाँ पर गुप्तता रखने का कोई अन्य उद्देश्य नहीं था, बल्कि उसके लिए बाबा की अनुमति मिलने पर उनकी आज्ञा से ही उचित समय पर ही उसे सबके समक्ष प्रस्तुत करना ही अनिवार्य है, यही माधवराव का उद्देश्य था। हमें भी किसी काम को करते समय योग्य समय पर ही उसे प्रकट करने के प्रति सावधानता रखनी चाहिए। व्यवहार में भी हमें हर एक बात उचित अवसर देखकर उचित पद्धति से ही प्रकट करनी चाहिए।

आज्ञालाडली बेटी के शादी की बात जब चल रही होती है, उस समय लगता है कि दोनों ओर से लगभग ‘हाँ’ ही है, परन्तु अभी तक बात पूरी तरह से निश्‍चित नहीं हुई है। साथ ही लड़के एवं लड़की को भी आपस में परस्पर मिलकर और भी अधिक जानकारी हासिल करनी होती है। उनकी प्राथमिक रूप में हाँ तो होती है, मगर फिर भी परस्पर-परिचय एवं मुलाक़ात के पश्‍चात् उन्हें अंतिम निर्णय लेना होता है। ऐसे में यदि कोई पहले ही इस बात को आम चर्चा का विषय बना देता है तो क्या उसका यह उतावलापन उचित कहलायेगा? मान लो उन दोनों के अधिक परिचय के पश्‍चात् अथवा चर्चा पश्‍चात् यह रिश्ता मंज़ूर नहीं होगा तो? ऐसे में जल्दबाजी न करते हुए दोनों ओर के लोगों को उचित समय आने तक, उचित निर्णय करने तक सबूरी रखना अति-आवश्यक होता है। किसी भी बात को प्रकट नहीं करना चाहिए। परमार्थ में भी भक्त को कुछ अनुभव आते हैं, इसका अर्थ यह नहीं हैं कि वह सभी अनुभव लोगों के समक्ष प्रकट कर दे। कुछ अनुभवों को वक्त की कसौटी पर परखकर ही आगे बढ़ना होता है। तब तक उस अनुभव को प्रकट न करने में ही समझदारी होती है। मैं जो कुछ देख रहा हूँ वह हक़ीक़त है अथवा वह महज़ मेरे मन की कल्पना है, इसके बीच का फर्क तो हमें ठीक से करने आना ही चाहिए। इसीलिए परमार्थ में भी इस प्रकार की सावधानी रखना अति आवश्यक है।

माधवराव ने पूरी सावधानी बरतते हुए हेमाडपंत का मन्तव्य बाबा के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। हेमाडपंत को सभी लोग ‘अण्णासाहब’ कहते थे। माधवराव भी उन्हें उसी नाम से संबोधित करते थे। इसीलिए माधवराव ने बाबा से पूछा, ‘‘बाबा, ये अण्णासाहब (हेमाडपंत) कहते हैं कि आपका चरित्र यथामति लिखूँ, यह भावना उनके चित्त में प्रबल हो उठी है; फिर भी यदि आपकी इच्छा होगी तब ही वे आपकी अनुमति के अनुसार उस कार्य का आरंभ करेंगे, ऐसी उनकी इच्छा है।’’

यहाँ पर ‘यथामति’ इस सुंदर शब्द की योजना की गई है। योग्यता एवं सुमति शब्द के बारे में तो हम जानते ही हैं। यथामति का अर्थ है बुद्धि की योग्यता के अनुसार। परन्तु यहाँ पर हेमाडपंत को बाबा का चरित्र ‘यथामति’ लिखना है अर्थात बाबा जैसी ‘मति’ देंगे उसी प्रकार लिखना है। स्वयं की बुद्धि के अनुसार नहीं लिखना है। ‘यथामति’ अर्थात जैसी मति बाबा प्रदान करेंगे उसी मति के अनुसार। साईनाथ का चरित्र केवल यथामति से ही लिखा जा सकता है, यह बात हेमाडपंत भली-भाँति जानते हैं। क्योंकि बाबा के चरित्र को लिखने के लिए जिस मति की आवश्यकता है, उसे प्राप्त करना एक सामान्य मानव के बस की बात नहीं है। बाबा ही जो मति प्रदान करेंगे, उसी से यह कार्य हो सकेगा।

दूसरा महत्त्वपूर्ण शब्द है- ‘चित्त में’। यहाँ पर हेमाडपंत के मन में विचार न आकर उनके चित्त में प्रकट हुआ है। मन में उठने वाले विचार ऊपरी तौर पर ही रहते हैं, उन में गहराई नहीं होती है। उसी प्रकार मन में उठने वाले विचार काफी समय तक स्थिर नहीं रहते, तात्कालिक होते हैं। यहाँ पर ‘मैं साईसच्चरित लिखूँ’ यह भाव हेमाडपंत के चित्त में स्थिर हो चुका है। बाबा के प्रेम से मन जब परिपूर्ण होकर भरभरा उठता है, उसी वक्त उसका रूपांतरण चित्त में हो जाता है। ऐसे चित्त में उठने वाला विचार प्रेमभाव से उत्कट एवं प्रबल होकर उछलने लगता है। वह निरंतर प्रवाहित होता रहता है, एक पल के लिए भी विस्मृत न होते हुए वह गहराई तक फैलता रहता है।

तीसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘आपकी अनुमति बिना’ ऐसा हेमाडपंत कह रहे हैं। साईबाबा की अनुमति, बाबा की संमती यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात है। बाबा की अनुमति में यथामतित्व प्रदान करने का सामर्थ्य है, यह बात हेमाडपंत भली भाँति जानते हैं। बाबा की अनुमति ही उनका चरित्र लिखने के लिए आवश्यक लगने वाली ‘यथामति’ अर्थात् उचित एवं समर्पक गति प्रदान करने वाली है। बाबा की अनुमति जिसे मिल गई उस कार्य को पूर्णत्व प्राप्त होता ही है। बाबा किसी से भी कितना भी बड़ा कार्य करवा सकते हैं, इस बात का एहसास हेमाडपंत को पूरी तरह है। इसीलिए इस बात का घमंड उन में जरा सा भी नहीं है कि यह कार्य मैं स्वयं अपने स्वसामर्थ्य से कर सकता हूँ; बल्कि उन्हें पूरा विश्‍वास है कि बाबा की अनुमति ही यह सब कुछ करवा लेगी। हमें भी इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि साईनाथ के भक्ति सेवा में जो कार्य मैं कर रहा हूँ वह उत्तम तरीके से कर रहा हूँ। परन्तु यहाँ पर मुझे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह सेवा जो मैं कर रहा हूँ वह मैं अपने कर्तृत्व से नहीं कर रहा हूँ; बल्कि साईनाथ की इसके लिए अनुमति है इसीलिए उन्हीं की कृपा से यह सेवा करने का बल वे मुझ में प्रवाहित कर रहे हैं, इसीलिए यह मैं कर पा रहा हूँ।

साईनाथ के इस भक्ति सेवा में मुझे यह विशेष कार्य करना ही यह इच्छा ही मुझ में उनकी प्रेरणा से ही उत्पन्न हुई है। और इसी के फलस्वरुप मुझ में ‘यथामति’ अर्थात वह सेवा करने की जिस मति की आवश्यकता थी वह मति मुझमें निर्माण हुई है। और यही यथामति मुझे प्रदान करके ही बाबा ने मुझ में जैसी चाहिए वैसी मति की है और वैसा कौशल्य मुझ में प्रवाहित किया है। बाबा की कृपा से ही इस कौशल्य का उचित ढंग से उपयोग करने का बल मुझे प्राप्त हुआ है। इसीलिए इस कार्य को मैं भली-भाँति कर पा रहा हूँ। हमें भी बाबा की सेवा में इस बात का ध्यान रखना चाहिए। केवल परमार्थ में ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी मैं जिस पद पर कार्यरत हूँ, वहाँ पर भी मेरा कार्य उचित प्रकार से होने के लिए भी बाबा की कृपा ही कारणीभूत है। मेरे गृहस्थ-जीवन में भी पति/पत्नी, माता/पिता, पुत्र/कन्या आदि की भूमिका को अच्छी तरह से निभाने के लिए आवश्यक लगने वाला बल बाबा की कृपा से ही मुझे प्राप्त हुआ है। यही कारण है कि मैं अपने गृहस्थ जीवन में सुख से जी रहा हूँ। मेरी तकलीफों से मुझे बाहर निकालने वाली बाबा की ही कृपा है।

यहाँ पर माधवराव एवं हेमाडपंत दोनों को ही इस साईकृपा का पूरा ध्यान है। हेमाडपंत ने अपना मन्तव्य माधवराव के समक्ष स्पष्ट करते समय प्रत्येक शब्द में इस बात का ध्यान रखा है। माधवराव भी मध्यस्थ की भूमिका निभाते समय सदैव इस बात ध्यान रखते हैं कि मेरी भक्ति-सेवा श्रेष्ठ ही इसीलिए बाबा के समक्ष मध्यस्थी करने की योग्यता मुझ में है, ऐसा वे नहीं सोचते; बल्कि मुझ में योग्यता न होने के बावजूद भी बाबा की कृपा का ही फल है कि वे मुझ से यह मौलिक कार्य करवा रहे हैं। बाबा की कृपा एवं बाबा की अनुमति प्राप्त होना इसका अर्थ यह है कि बाबा की कृपा का जीवन में प्रवाहित होना। माधवराव को उनकी भक्ति-सेवा के कारण साई के पास मध्यस्थी करने की योग्यता बाबा की कृपा से प्राप्त हुई थी। हेमाडपंत को भी साई से साई का चरित्र लिखने की अनुमति मिलने से ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहने वाली साई कृपा प्राप्त हुई और साई की अनुमति से ही वे बाबा का यथामति चरित्र लिख सके। आज हमें भी किसी भी कार्य को करने से पूर्व बाबा को वंदन करके, बाबा की उदी स्वयं लगाकर ही, बाबा की प्रार्थनापूर्वक अनुमति ग्रहण करके ही उस कार्य को आरंभ करना चाहिए। हमारे लिए बाबा की उदी ही बाबा की अनुमति है। हमें हर रोज़ घर से बाहर निकलते समय बगैर भूले उदी लगाकर, बाबा को वन्दन करके और इसे ही बाबा की अनुमति मानकर ही घर से बाहर निकलना चाहिए।