श्री साईसच्चरित – ०१

आतून सकळ खेळ खेळिसी।
अलिप्ततेचा झेंडा मिरविसी।
करोनि अकर्ता स्वये म्हणविसी।
न कळे कवणासी चरित्र तुझे ॥

साईनाथजी, आप ही सकल (सारे) खेल खेलते हो।
और साथ ही अलिप्तता का ध्वज भी फहराते रहते हो।
कर्ता होकर भी स्वयं को अकर्ता कहलवाते हो।
न जान सके कोई चरित्र आपका ॥

अर्थ: साईनाथजी, आप ही सारी लीलाएं करते हो, मगर ‘मैं कहां कुच करता हूं’ यह कहकर अलिप्तता का ध्वज भी फहराते रहते हो, कर्ता होकर भी स्वयं को अकर्ता कहलवाते हो, यह सच है साई कि आपका चरित्र किसी की भी समझ में नहीं आ सकता।

अथ श्रीसाईसच्चरित प्रारंभः।

इस बात का अहसास मन में सदैव दृढ रखने वाले हरिभक्तिपरायण, श्री. गोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर  ने यानी श्रीहेमाडपंत ने श्रीसाईनाथ के चरणों में चरित्र-लेखन-सेवा अर्पण की और हम सबके लिए इस भवसागर को, दुर्गम भवसिंधु को सूखे चरणों से तर जाने के लिए ‘श्रीसाईसच्चरित’ इस ग्रन्थ के माध्यम से सरल राह बना दी। ‘कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथा कर्तुम’ ऐसे ये साईनाथ ही स्वयं मेरा हाथ पकड़कर श्रीसाईसच्चरित का एक एक अक्षर लिखवाकर ले रहे हैं, मैं तो उनका हाथ थामे चलने वाला दास हूँ और कर्ता साईराम ही हैं ’’ यह हेमाडपंतजी का स्पष्टीकरण ही इस ‘साईसच्चरित-कवि’ का पूर्ण शारण्यभाव दर्शाता है।

बाबा का चरित्र समझ पाना किसी के भी बस की बात नहीं है, क्योंकि बाबा की लीलाओं को समझ पाना यह मनुष्य की बुद्धि के बस की बात नहीं है। फिर बाबा को पूरी तरह जान पाना तो दूर की बात रही। ‘मेरी कथा मैं ही कहूँगा। भक्त की इच्छा मैं ही पूरी करुँगा।’ (माझी कथा मीच करावी। भक्तेच्छा मीच पुरवावी) ये बाबा के मुख के उद्गार ही हमें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि साई ने ही ‘मैं (साईनाथजी) कौन हूँ’ ये भक्तों को सुस्पष्ट रुप से समझ में आ सके, सही भक्तिेमार्ग की दिशा मिल सके एवं सद्गुरुतत्त्व और भक्ति इन सब मुद्दों के बारे में सुसष्ट मार्गदर्शन प्राप्त हो सके इसलिए स्वयं ही हेमाडपंत को अपनी क़लम बनाकर श्रीसाईसच्चरित का निर्माण किया है। श्रीसाईनाथ ही इस रचना के नायक हैं, लेखक हैं, कर्ता हैं और अकारण कारुण्य के साथ ये साईनाथ ही वक्ता बनकर कथा कह रहे हैं,। ये साईनाथ ही इसमें की हर एक कथा का माधुर्य है। ये साई ही सर्वेश सर्वेसर्वा हैं। साईनाथ ही भक्तों के उद्धारक (उद्धारकर्ता) हैं। यही हेमाडपंत का भाव अंतर्मन में धारण करके श्रीसाईसच्चरित का अत्यन्त प्रेमपूर्वक हम अध्ययन करेंगे।

श्रीसाईसच्चरित का अध्ययन करने से पहले हमें स्मरण करना चाहिए श्री अनिरुद्ध बापूजी का, क्योंकि श्रीसाईसच्चरित के अध्ययन की दिशा हमें उन्होंने ही दिखाई है। श्री अनिरुद्ध बापूजी ने श्रीसाईसच्चरित पर आधारित ‘पंचशील परीक्षा’ का मार्ग बनाकर सही मायने में साईसच्चरित के अध्ययन का सीधा-सरल रास्ता हम जैसे भक्तों को प्रदान किया है। और यहीं से श्रीसाईसच्चरित के अध्ययन का आरंभ हुआ। प्रथमा से पंचमी तक पॉंच स्तरों पर से प्रवास करते हुए साईलीला-अध्ययन के इस ‘प्रेमप्रवास’ का निर्माण कर श्रीसाईसच्चरित की सही पहचान श्रीअनिरुद्ध बापू ने ही करवायी। स्वयं के अत्यन्त व्यस्त दैनिक जीवन में भी अपना अमूल्य समय हमारे लिए देकर, दिन-रात एक कर, परिश्रम करते हुए अत्यन्त प्रेमपूर्वक मार्गदर्शन करके परीक्षा की प्रश्‍नपत्रिका बनाने से लेकर उसे जॉंच कर हर किसी को उचित ज्ञान प्रदान करने तक, साथ ही पंचमी के सभी प्रात्यक्षिक (प्रॅक्टिकल) स्वयं सिखाकर तथा उसके अनुसार हमारी लिखी गयी प्रात्यक्षिक पुस्तिका (जर्नल्स) जॉंचकर स्वयं ही पंचमी की थिअरी, प्रॅक्टिकल्स के साथ मौखिक परीक्षा (वाइवा) लेने तक का अथक परिश्रम उन्होंने किया।

श्रीसाईसच्चरित का सिर्फ रट्टा न मारते हुए, उसे जीवन में प्रवाहित करके स्वयं का समग्र जीवनविकास कैसे करना चाहिए, इसका राजमार्ग श्री अनिरुद्ध बापू ने इस पंचशील परीक्षा के माध्यम से प्रकाशित किया है। श्रीसाईसच्चरित की कथा का आधुनिक विज्ञान के सिद्धांत एवं प्रात्यक्षिक के अनुसार स्पष्टीकरण करके अध्यात्म और विज्ञान अद्भुत संगम करते हुए, अध्यात्म और विज्ञान एक-दूसरे के परस्पर-विरोधी न होकर वे दोनों एक-दूसरे के परस्पर-पूरक किस तरह हैं, यह सब हम जब पंचमी की परीक्षा देते हैं, तब पता चलता है और उस वक्त सचमुच श्री अनिरुद्धजी के इस अद्भुत कौशल्य के सामने श्रद्धा से हमारा सिर झुक जाता है। सद्गुरुतत्त्व, भक्ति, भक्तिमार्ग, भक्त, भगवत्-लीला, प्रेम, श्रद्धा, सबूरी, जीवनविकास, प्रेमप्रवास, फलाशा का पूर्ण विराम, सेवा, शारण्य, लोटांगण, उदी, दर्शन, नवरस, पंचयज्ञ, दान, तप, दिशा अध्ययन, पुरुषार्थ, माधुर्य, तृप्ति, प्रेमप्रवास, ‘त्येन त्यक्तेन भुज्यीया;’ आज्ञापालन इस प्रकार के अनेक तत्त्वों का स्पष्टीकरण, आकलन पंचशील परीक्षा के संदर्भ में श्रीअनिरुद्ध बापू के द्वारा किये गये मार्गदर्शन से सहज ही होता है। ‘वाचले ते नाही संपले। कृतीत उतरले पाहिजे।’ (पढ़ना ही का़फी  नहीं है, उसे आचरण में उतारना ही चाहिए ) इस सिद्धान्त को बापुजी ने ही हमें समझाकर बताया। ‘साईनाथजी मेरे दिग्दर्शक गुरु हैं’, यह सुस्पष्ट प्रतिपादित करके उन्होंने हम सभी को उचित दिशा दिखलाई, जिसके लिए हम सदैव उनके ॠणी रहेंगे।

विशेषतः आज के युग में सच्चाई क्या है और पाखंड क्या, सच क्या है और झूठ क्या इस बात का नीरक्षीरविवेक करके भक्तिमार्ग पर से मार्गक्रमण करना अत्यन्त अनिवार्य है। सच्चा सद्गुरु कैसा होता है, सच्चा भक्तिमार्ग कैसा होता है और सच्चे भक्त को कैसा होना चाहिए इस बात का अचूक मार्गदर्शन श्री अनिरुद्ध बापू ने पंचशील परीक्षा के माध्यम से हमें किया है। श्रीसाईसच्चरित ग्रन्थ के अध्ययन के द्वारा ही मर्यादाशील भक्ति का पिपीलिका मार्ग उन्होंने हम सबके लिए खोल दिया। इसलिए श्रीसाईसच्चरित के इस अध्ययन से पहले सर्वप्रथम उनके ॠण का स्मरण करना यहॉं पर अपरिहार्य ही है। हम सब को श्रीसाईसच्चरित की पंचशील परीक्षा देनी ही चाहिए, क्योंकि अनेक प्रकार की मुसीबतों से उलझकर नये-नये रास्ते ढूँढ़ने की बजाय इस राजमार्ग से प्रेमप्रवास करना ही उचित होगा।

श्रीसाईसच्चरित के इस अध्ययन का आरंभ करते समय श्रीअनिरुद्ध बापू को वंदन करके ही हम अपना यह प्रवास शुरू करेंगे। श्रीसाईसच्चरित की एकमेव अद्वितीयता का वर्णन करते समय हेमाडपंत बारंबार कीर्तन-भक्ति की महिमा के बारे में हमें बताते हैं, वह इस प्रकार – ‘श्रोता-वक्ता का उद्धार एक ही समय करने का सामर्थ्य इस साईसच्चरित में, इस सद्गुरु-सच्चरित में है।’

तात्पर्य यह है कि केवल इन कथाओं का संकीर्तन करने वाले का ही नहीं, अपि तु प्रेमपूर्वक इस कथा प्रचार प्रसार करने वालों का, सुननेवालों का भी उद्धार करनेवाली यह पावन कथा है। साईसच्चरित में ‘समुद्धार-बीज’ है। सद्गुरु ही समुद्धारक हैं, वे ही सर्वसमर्थ हैं। ‘सद्गुरुकथा के दो अक्षर भी यदि कोई सुन लेता है, तब भी उसके बुरे दिन तुरंत घटने लगते हैं’ ऐसा सामर्थ्य जिस कथा के हर एक अक्षर-अक्षर में है, वह कथा यदि संपूर्णतः हमें मिल जाये, तब उससे क्या हमारा उद्धार नहीं होगा? बिलकुल होगा। सिर्फ इसके लिए सद्गुरु के इस वचन पर पूर्णतः विश्‍वास रखकर हम यह कथा एक-दूसरे को बतायें, एक-दूसरे से सुनें और फिर हमेशा के लिए पिपीलिकापथिक बन जायें। इन कथाओं का अध्ययन करते समय बाकी सब कुछ भूलकर सिर्फ साईनाथ से अनन्य प्रेम करनेवाला भोला भाविक बनकर इनकी कथाओं का आनंद लें। मेरा ध्यान रखने के लिए ये अनन्य-प्रेम-स्वरूप साईनाथ समर्थ हैं ही, और सच यह है कि सिर्फ ये ही तो मेरे हैं।

श्रोत्रा वक्ता का निज-हित करनेवाला।
ऐसा है यह श्रीसाईसच्चरित सब से निराला।

हम ने श्रीसाईसच्चरित के अन्तर्गत बताये गए उद्धार-बीज के बारे में जानकारी हासिल की। ये साईनाथ महापापनिवारक हैं यानी महत्पाप की दलदल से बाहर निकालकर पूर्ण स्वच्छ, शुद्ध एवं समर्थ बनाने वाले हैं। दलदल में एक बार जो फँस जाता हैं वह उससे बाहर निकलने की जितनी ज्यादा कोशिश करता है उतना ही अधिक वह उसमें फँसता ही चला जाता है और यदि प्रयत्न करने की बजाय वह वैसा ही रह जाये तब भी धीरे-धीरे वह दलदल उसे निगल ही जाती है। उद्धारशक्ति ही इस प्रकार के पापरूपी दलदल से बाहर निकालकर पूर्ण स्वच्छ, शुद्ध एवं समर्थ बनाने की शक्ति तथा फिर कभी भी उस दलदल में फँसने के भय से मुक्त करने वाली अर्थात ‘पतनभय’ दूर करने वाली शक्ति। यह समुद्धार-शक्ति केवल ‘महापापविमोचक’ होने वाले (रहनेवाले) इस साईराम में ही हैं। इसीलिए इनका सच्चरित श्रोता-वक्ताओं का समुद्धार करने वाला हैं।

श्री साईसच्चरित का श्रोता बन जाना इसका अर्थ ‘महज कथा सुनना’ इतना ही नहीं है। कथा सुनकर बाद में भूल न जाते हुए, कथा-श्रवण करके उसे अपने आचरण में उतारने वाला ही सच्चा श्रोता कहलाया जाता है। ‘सुनना’ यह क्रियापद सिर्फ कानों से सुनने तक ही मर्यादित न होकर साईनाथ की बात सुननेवाला ही सच्चा श्रोता होता है, वही सच्चा भाव भी रखता है। इस कथा के द्वारा साईनाथ मुझ से क्या कहना चाहते हैं, वे मुझ से किस प्रकार के आचरण की अपेक्षा रखते हैं इन सब बातों का विचार कर साईनाथ को सुनकर उसके अनुसार कृति करता है यही सच्चा श्रोता बनना है। वक्ता का अर्थ रट्टा मारने वाला यह नहीं है, बल्कि स्वयं मर्यादाशील भक्ति का आचरण करके, भगवान के चरित्र के भाव-मर्म को जानकर उसी प्रकार कृति करके उन कथाओं का संकीर्तन करने वाला ही सच्चा वक्ता होता है। जिस तरह साईसच्चरित में काकासाहब दीक्षित ये सच्चे श्रोता एवं वक्ता हैं। वे स्वयं कदम-कदम पर मर्यादाशील भक्तियुक्त आचरण करते रहकर साई की आज्ञा के अनुसार भागवत आदि ग्रन्थों का प्रेम से वाचन एवं विवेचन करते हैं।

दीक्षितजी के समान बनना यह मेरी इच्छा जरूर होनी चाहिए, परन्तु इसके लिए मुझे सबसे पहले साईसच्चरित का ‘श्रोता’ बनना होगा। दीक्षितजी की भक्ति हमारी सोच से बहुत आगे हो सकती है, पर कम से कम चोलकरजी के समान भोला भाविक श्रोता तो मैं निश्‍चित ही बन सकता हूँ।

स्वयं मुझे भी चोलकर बहुत अच्छे लगते हैं। हमारे जैसे ही सामान्य गृहस्थाश्रमी व्यक्ति हैं, मगर तब भी यदि वे इस साईलीला के सच्चे ‘श्रोता’ बन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं बन सकता? जरूर बन सकता हूँ। चोलकर जी की भक्ति श्रेष्ठ है ही और साई ने आगे चलकर उसे किस तरह बढ़ाया, यह भी हम देखते ही हैं। मैं गलती करता हूँ, भटक जाता हूँ, मगर फिर भी यदि मैं अपने साईनाथ के चरणों पर पूरी श्रद्धा, पूरा विश्वास रखकर बाबा के कथाओं का श्रोता बनकर उसके अनुसार अपने आप को सुधारने की कोशिश करता हूँ, तब निश्चित ही साईनाथ मेरा उद्धार करेंगेही, इस बात का विश्वास रखना चाहिए। हेमाडपंतजी पहले अध्याय की अंतिम पंक्ति में इसी बात का उल्लेख विशेष जोर देकर करते हैं।

श्रोत्रा वक्ता का निज-हित करनेवाला।
ऐसा है यह श्रीसाईसच्चरित सब से निराला।

हम यदि इस प्रथम अध्याय की महत्त्वपूर्ण पंक्ति को मन में उतारकर साईभक्ति में क्रियाशील रहते हैं, तब भी समुद्धार-कर्ता साईनाथ अपना भक्तोद्धारक ब्रीद सार्थक करेंगे ही इसमें कोई शक नहीं है। वे अपना ब्रीद सच कर दिखाते ही हैं। अपना काम वे अचूकता से करते ही हैं, मुझे अपना काम करना चाहिए यानी साईसच्चरित का श्रोता बनना चाहिए सुखपूर्वक गृहस्थ-जीवन जीते हुए मुझे परमार्थ भी साध्य करने के लिए यह साईसच्चरितरूपी कामधेनु इस सद्गुरुतत्त्व ने मुझे दी ही है। फिर देर किस बात की? हम इस साईसच्चरित का अध्ययन करके अपना निजहित साध्य कर ही सकते हैं, अपना उद्धार कर ही सकते हैं। प्रथम अध्याय का अध्ययन शुरू करने से पहले इस पंक्ति का भावार्थ समझ लेने से हमारा इस साईसच्चरित की एकमेव अद्वितीयता से परिचय हो जाता है। अध्ययन करते समय श्रोता एवं वक्ता दोनों के चरित्र की विशेषता एक ही समय पर उजागर हो जाती है। इसीलिए ‘अध्ययन’ सर्वत: महत्त्वपूर्ण है। श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रंथराज – तृतीय खंड – आनंदसाधना के पुरुषार्थगंगा का सर्वप्रथम आचमन यह मन-बुद्धि से ‘आचमन’ करने के लिए ही है।

श्रीसाईसच्चरित का आरंभ ‘अथ श्रीसाईसच्चरितप्रारंभ:’ इस प्रकार हेमाडपंतजी करते हैं। ‘अथ’ यह शब्द मंगलवाचक है, इसी लिए ग्रंथ का आरंभ करते समय मंगलाचरण के लिए ‘अथ’ शब्द का प्रयोग शास्त्रों में किया जाता है। हेमाडपंतजी ने भी इस शास्त्र मर्यादा का सम्मान करते हुए, ध्यान रखते हुए साईसच्चरित का आरंभ ‘अथ’ इस मंगलवचन से किया है।

ॐकारश्‍च अथशब्दश्‍च द्वौ एतौ ब्रह्मण: पुरा।
 कण्ठं भित्वा विनिर्यातौ तेन मांगलिकौ उभौ॥

ॐकार एवं ‘अथ’ ये दो शब्द चतुरानन द्वारा उच्चारण किये गए शब्द हैं, ये शब्द सहज ही उनके कंठ से निकल पड़े थे और इसीलिए ये दोनों शब्द मंगलवाचक हैं। इसीलिए ‘ॐ’ एवं ‘अथ’ शब्द का किसी भी मंगलप्रसंग में, मंगलकार्य के आरंभ में उच्चारण करने की शास्त्राज्ञा है। हेमाडपंतने भी इस शास्त्र-मर्यादा के अनुसार ‘अथ श्रीसाईसच्चरित-प्रारंभ:’ कहकर ग्रंथलेखन कार्य का ‘श्रीगणेश’ किया है।
पहले अध्याय के आरंभ में,

‘श्री गणेशाय नम:। श्रीसरस्वत्यै नम:। श्रीगुरुभ्यो नम:। श्रीकुलदेवतायै नम:। श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:। श्रीसद्गुरुसाईनाथाय नम:।’

इस प्रकार से नमन किया है। इस ‘नम:’ की नींव पर ही यह ग्रंथरूपी इमारत खड़ी हैं। ‘नम:’ स्थिति में ही यानी पूर्ण निरहंकारी शारण्यभाव से ही हेमाडपंत हर एक अध्याय का आरंभ करते हैं। हेमाडपंत का ‘मन’ यह साईनाथजी के चित्त में पूरी तरह घुल मिल चुका मन है और इसीलिए साईनाथ हेमाडपंत की क्रियाओं के ‘कर्ता’ बन गए हैं | हेमाडपंत के इस ‘नमन’ से ही सारे अवरोधों को नष्ट कर अनिरुद्ध-गति से ये साईनातहजी  हेमाडपंत के संपूर्ण जीवन में प्रवाहित हो गये।

हेमाडपंत का ‘ग्रन्थ-पंचायतन’ है- श्रीमहागणपति, श्रीसरस्वती, श्रीकुलदेवता, श्रीसीतारामचन्द्र और सद्गुरुरूप में साक्षात् साईनाथ। हेमाडपंत अपने इस पंचायतन को नमन कर रहे हैं| माता, आई, माई, मॉं, मैया, मदर आदि नामों से विभिन्न भाषाओं में मॉं को संबोधित किया ज़ाता है, मगर फिर भी ‘मातृतत्त्व’ और मातृत्व एक ही है; उसी तरह इस पंचायतन के पॉंचों नाम यदि भिन्न दिखाई देते हैं, फिर भी इन पॉंचों रूपों में मेरा साईनाथ ही प्रकट हुआ है, यही हेमाडपंतजी का भाव हमें दिखाई देता है और प्रथम अध्याय के आरंभ में ही इस श्रेष्ठ भक्त की भक्ति की पराकाष्ठा का एहसास हमें होता है, पर्वत की चोटी को छूते हुए दिखाई देता है। अगले लेख में हम इससे संबंधित अध्ययन करेंगे।