श्रीसाईसच्चरित : अध्याय २ (भाग- २२)

श्री दाभोलकर उर्फ़ अण्णासाहेब अर्थात हेमाडपंत, माधवराव देशपांडे से कहलवाकर बाबा से उनका साईसच्चरित लिखने के बारे में अपना मनोगत व्यक्त करने की विनती करते हैं। बाबा की अनुज्ञा प्राप्त हुए बिना उनका चरित्र लिखना आरंभ करना ही नहीं है कारण यह चरित्र लिखने का सामर्थ्य केवल साईनाथ में ही है और उनकी कृपा बगैर, अनुमती प्राप्त किए बिना यह कार्य कोई भी नहीं कर सकता है। बाबा के देहधारी रहने पर एवं उनके प्रत्यक्ष सामने रहते भर में उनकी अनुमती प्रत्यक्ष रूप में लेना अपरिहार्य ही है यह जानकर हेमाडपंत शामराव से यह बात बाबा के कानों पर डालने की विनती करते हैं।

स्थल है द्वारकामाई। बाबा अकेले ही द्वारकामाई में बैठे हैं और हेमाडपंत नीचे सभामंडप में खड़े हैं और बाबा से कैसे पुँछू इस बारे में उनके मन में उहापोह मचा हुआ है। मैं कहीं छोटा मुँह बड़ी बात तो नहीं कर रहा हूँ? यह प्रश्‍न भी उन्हें सता रहा है, परन्तु जो कुछ भी मन में चल रहा है उसे बाबा को बतलाना भी बहुत ज़रूरी है यह भी निश्‍चित है। ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ यह सिद्धान्त यहाँ पर लागू होता है (फ़लित होता है) परमेश्‍वरी नियमों का अनुसरन करते हुए भक्त के मन में जो इच्छा पैदा होती है उसकी पूर्ति के लिए ये साईनाथ तुरंत ही मार्ग निकालते हैं इसके लिए हमारे सेवा की तथा भक्ति की इच्छा प्रबल होनी चाहिए यदि हमारी भक्तिसेवा की इच्छा प्रबल है तब साईनाथ जरा सा भी विलंब न करते हुए तत्काल ही भक्तेच्छा पूर्ण करने के लिए मार्ग आसान करते ही रहते हैं।

हमारी इच्छा यदि ऐसी है कि मुझे द्वारकामाई में जाकर बाबा का दर्शन लेना ही है और यदि हम नहीं जानते हैं कि शिरड़ी में कैसे जाना है तब बाबा तत्काल ही कुछ ऐसी योजना बनाते हैं कि हमें तुरंत ही शिरड़ी का मार्ग मिल जाता है, अचानक ही ऐसा कोई मिल जाता है जो हमसे पुछता है कि मैं शिरडी जा रहा हूँ क्या तुम भी चलोगे मेरे साथ, हमारे पास यदि पैसा नहीं है तो ऐसा ही कोई ऐन वक्त पर आ जायेगा जो पिछले कई वर्षों से रूका हुआ पैसा लाकर लौटा देगा। यूँ तो कोर्ट-कचहरी से छुट्टी लेने के लिए कितनी कोशिशें करनी पड़ती है पर शिरड़ी जाना हो तो उतने दिनों की छुट्टी तुरंत ही मंजूर हो जाती है। कही जाने का नाम लो तो पता नहीं कितनी सारी मुश्किलें आकर खड़ी हो जाती हैं पर शिरड़ी जाना हो तो सामने कितनी भी मुसीबतें मुँह उठाये खड़ी क्यों न हो पर बाबा के दर्शन की इच्छा यदि प्रबल है तो सारे संकट चुटकी बजाते ही गायब। कौन करता है यह सब? भक्तों की इच्छा पूरी करने हेतु कौन करता है ये काम? ये साईनाथ ही!

हर किसी के लिए दिन-रात प्रयत्न रहनेवाले ये साईनाथ ही भक्तों के राह में आनेवाली सारी रुकावटें दूर करते रहते हैं और वह भी तत्काल। केवल हमारी इच्छा प्रबल होनी चाहिए, हमारी श्रद्धा बलकट होनी चाहिए। ‘जाकी रही भावना जैसी। तीत तैती रुचि होय।’? जिसके मन में जैसा भाव होता है उसे वैसा ही अनुभव होता है। यही सत्य यहाँ पर हमें दिखाई देता है। यहाँ पर हेमाडपंत के बारे में भी ऐसा कुछ होता है। बाबा की अनुमती लेने की प्रबल इच्छा का उनके मन में उदय होते ही साईनाथ उस इच्छा को पूर्ण करने का मार्ग तुरंत ही उन्हें दिखाते हैं वैसे तो अकसर पूर्णत: भरी रहनेवाली द्वारकामाई में उस समय कोई भी नहीं रहता, यह भी बाबा की ही लीला का प्रभाव है, इसके साथ हेमाडपंत को बाबा से अनुमती प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो इसके लिए तुरंत ही वहाँ पर माधवराव का आ पहुँचना यह भी साई बाबा की लीला का प्रभाव है। बाबा के पास जाने के लिए माधवराव द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ ही रहे थे तभी हेमाडपंत अपनी इस इच्छा को बाबा के कानों पर डालने की विनती करते हैं।

यहाँ पर दूसरी महत्त्वपूर्ण बात हमें यह सीखनी चाहिए कि हमारे भक्ति सेवा की इच्छा पूरी करने का अवसर ये साईनाथ ही हमें प्रदान करते रहते हैं, परन्तु हमें बड़ी ही सावधानी से इस अवसर को पहचान कर उसका उचित उपयोग करते हुए अपना विकास करना चाहिए। यहाँ पर माधवराव आते और ऊपर चढ़कर चले जाते, हेमाडपंत बिना कुछ पुछे ही खड़े रह जाते तो वह अकसर खो चुका होता। माधवराव के द्वारकामाई के सीढ़ी पर पैर रखते ही, हेमाडपंत उन्हें याद दिला देते हैं, यही उचित कृति है। इच्छा प्रबल हो तब अवसर अपने आप ही प्राप्त होता है और उससे फ़ायदा उठाते हुए श्रद्धावान अपना स्वयं का विकास साध्य करता ही है। ये परमात्मा एक बार दो बार नहीं बल्कि बारंबार इस प्रकार का अवसर हमारे जीवन में निर्माण करता ही रहता है ज़रूरत होती है उस अवसर को पहचान कर कृति करने की। मुझे इस साईनाथ के भक्ति-सेवा में सक्रिय होना ही है यह इच्छा यदि प्रबल है तो इस अवसर का लाभ मिलने में कोई बाधा आ ही नहीं सकती।

हम वैसे तो जब देखो तब अपना ही रोना रोते रहते हैं कि मुझे यह करने की इच्छा थी वह करने की इच्छा थी? पर क्या करूँ ? मुझे तो अवसर ही नहीं मिला, मुझे कोई रास्ता ही नजर नहीं आता पर ऐसा मानना बिलकुल गलत है। यदि मेरी भक्ति सेवा की इच्छा प्रबल होगी तब मुझे रास्ता दिखाने के लिए एवं सुअवसर प्रदान करने के लिए साईनाथ सदैव तत्पर रहते हैं। इसके लिए मूलत: हमारी इच्छा क्या सचमुच उतनी उत्कट है, इस बात का विचार अन्तर्मुख होकर करना ज़रूरी है। हम तय करते हैं कि साईसच्चरित के एक अध्याय का पठन रोज करना ही है, पर धीरे-धीरे केवल एक पन्ने पर ही हमारा संकल्प आकर रूक जाता है, फ़िर कम से कम पाँच पंक्तियाँ ही रोज पढूँगा यह निश्‍चय किया जाता है और कुछ दिनों बाद एक पंक्ति भी हमसे नहीं पढ़ी जाती ऐसी स्थिति आ जाती है। तब हम कोई न कोई बहाना बनाने लगते हैं कि आजकल काम बहुत है, समय नहीं मिलता, ये सब जब होने लगता है तब हमें जानना चाहिए कि हमारी इच्छा मूलरूप में प्रबल है ही नहीं। अपनी क्षमतानुसार काम न करते हुए मैं नये-नये बहाने यदि ढूँढ़ता हूँ तब हमें जानना चाहिए कि मेरी इच्छा प्रबल नहीं है।

मैं निश्‍चित करता हूँ कि मुझे पंचशील परीक्षा देनी है, इसके लिए पढ़ना होगा। परन्तु पहले दिन से ही यदि मैं मन लगाकर पढ़ाई नहीं करता हूँ तो मेरी यह इच्छा प्रबल नहीं है। जब परिक्षा सिर पर आ जाती है तब मैं हड़बड़ा जाता हूँ और तैयार नोट्स पाने के लिए भाग-दौड़ करने लगता हूँ। परन्तु श्रीअनिरुद्ध बापू के कहेनुसार यह ज्ञान की परीक्षा न होकर भक्ति की परीक्षा है और इसे मुझे प्रेमपूर्वक ही देना है, इसलिए किसी की नकल करने का कोई मतलब ही नहीं किसी के नोट्स को पढ़कर उसी तरह से यदि मैं लिख देता हूँ तो इसमें मैंने अपना विकास भला क्या साध्य किया?(क्या सीखा?) इससे कही अच्छा होगा कि पहले दिन से ही मैं साईसच्च्चरित प्रेमपूर्वक पढूँगा और प्रेम से जो भी बोध मुझे होता है उसे अपने आचरण में उतारकर और क्या सीखना चाहिए इस बात का विचार करना चाहिए। मैं स्वयं अपने नोट्स बनाऊँगा, स्वयं अध्ययन करूँगा। दूसरों का मार्गदर्शन ज़रूर लूँगा, उनके अनुभवों का लाभ ज़रूर लूँगा, परन्तु मैं दूसरों के नोट्स का झेरॉक्स निकाल उसे पढ़कर परीक्षा में लिखकर मैं क्या साध्य कर पाऊँगा? इससे न तो मेरी कुछ पढ़ाई होती है, ना तो चिंतन होता है और ना ही कुछ मेरे आचरण में उतरता है। फ़िर ये साईनाथ जीवन की परीक्षा में मुझे उस समय बराबर उतने ही अंक देते हैं, जितनी मेरी तैयारी होती है, कारण बाबा से कुछ भी नहीं छिपता। जब हम दूसरों की हूबहू नकल करते हैं बगैर कुछ परिश्रम किए सब कुछ आयता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तब हम अपनी लाइन छोड़कर दूसरों की लाइन में घुसने की कोशिश करते हैं, यही हमारी गलती है। मैं भले ही अपनी लाइन में धीरे-धीरे चलता रहूँ, कोई बात नहीं। परन्तु जब मैं दूसरों की लाइन में घुसता हूँ पिछे-पिछे ही जाता रहता हूँ। इस साईनाथ के पास हर किसी की लाइन अलग होती है। कोई भी किसी के ना तो आगे है और ना ही पिछे। हर कोई अपने-अपने कर्म के अनुसार ही अपनी लाइन में आगे-पिछे होता रहता है।

इसीलिए किसी भी परीक्षा में उसे इतना अंक मिला, उसने तो इतना ही लिखा था और मैंने इतना सारा लिखा था फ़िर भी मुझे कम अंक मिले इस प्रकार तुलना करना सर्वथा गलतही होता है। हम इस प्रकार तुलना तो करते ही हैं, ऊपर से बाबा से पुछते भी हैं कि, ‘बाबा, वह तो अभी-अभी तुम्हारी भक्ति करने लगा और उसकी सारी समस्याएँ खत्म हो गई और मैं इतने सालों से तुम्हारी भक्ति कर रहा हूँ पर अब तक मेरी समस्या का समाधान नहीं हुआ? सच में देखा जाये तो यह प्रश्‍न मुझे अपने-आप से पुछना चाहिए। पर हम तो यही देखते हैं किसे क्या मिला। इससे कहीं अच्छा होगा कि मुझे अपनी ही लाइन में आगे बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए। यह मुझे सोचना है। मुझे अपनी लाइन में अधिक उत्साह के साथ आगे बढ़ते हुए इस साईनाथ के चरणों में स्थान प्राप्त करना हैं, यही इच्छा प्रबल रखते हुए आगे बढ़ना है। इससे मेरी सारी समस्यायें अपने-आप ही खत्म हो जायेंगी, सारी अड़चने, संकट दूर होकर अगला मार्ग आसान हो जायेगा। आनेवाले सारे अवसर सुअवसर ही होकर जीवन सुखमय बन जाता है, इस साईनाथ की यही तो इच्छा होती है कि हर एक भक्त का जीवन इसी तरह फ़लता-फ़ूलता रहे।