श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५४

श्री साईनाथ के नाम-जप में हम इस ॐकार का अवश्य ही सर्वप्रथम उच्चारण करते हैं। पिछले लेख में हमने ॐकार के महत्त्व की जानकारी संक्षिप्त रूप में हासिल की। ॐकार का महत्त्व सभी श्रद्धावान भली-भाँति जानते हैं और इसी लिए ॐकार उच्चारण सभी स्तोत्र, मंत्र, जप आदि के आरंभ में ही करते हैं। गायत्री मंत्र एवं सद्गुरु गायत्री मंत्र भी ॐकार से ही प्रकट हुए हैं। गायत्री मंत्र में भी आरंभ में मध्य में एवं अंत में ऐसे तीन बार ॐकार का उच्चारण हम करते हैं।

हमारे मन, प्राण एवं प्रज्ञा इन तीनों व्याहृतियों अर्थात् धरातलों पर उचित परिणाम साध्य करने के लिए ही हम ऐसा कर रहे हैं। हमें और कुछ चाहे भले ही समझ में ना आये कोई बात नहीं। हम केवल इतना ध्यान में रखते हैं कि ये ॐकार ही हमारा भगवान है, परमात्मा है, सद्गुरु श्रीसाईनाथ है तो भी काफ़ी है।

यहाँ पर साईनाथ कह रहे हैं कि सभी वस्तुमात्र में भी मैं ही ॐकारस्वरूप में विद्यमान हूँ। और फिर जब सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ तो अन्य किसी भी चीज़ की कामना क्यों करते हो? जब एकमात्र मैं ही इन सभी में विराजमान हूँ, तो उनमें केवल मेरी ही भक्ति करों। हर एक वस्तुमात्र में मुझे निहारों और मेरी ही कामना करो। जिस वक्त तुम्हें ऐसा प्रतीत होगा कि मेरे साईनाथ ही सर्वत्र चराचर में विश्‍वस्वरूप में व्याप्त हैं, उस समय तुम्हारे पास और कुछ भी नहीं रह जायेगा।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईसाईभक्त नेवासकर की भी कुछ ऐसी ही स्थिति हो गई थी, यह हम देखते हैं। उनके घर आनेवाले साँप को भी ये मेरे साईनाथ हैं, इसी विश्‍वास के साथ वे तुरंत ही दूध का कटोरा उसके सामने रख देते हैं और कहते हैं, ‘बाबा, क्यों इस तरह फों फों करते हो!’

हमें भी एक ना एक दिन इसी तरह नेवासकर की तरह ही भक्ति करने आनी चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कल को यदि कोई हमें ज़हर (विष) लाकर दे दे और पीने को कहे तो मैं उसे श्री साईनाथ का प्रसाद कहकर पी जाऊँ गा। ऐसे में मुझे यह देखना चाहिए कि क्या मेरी भक्ति मीराबाई के समान है? नहीं। तो फिर हमें तब तक तो विष को विष मानकर ही चलना चाहिए। हम कोई संत नहीं हैं, हम ठहरे सामान्य मनुष्य। परन्तु इस चराचर जगत् में साईनाथ ही विद्यमान है। इसी लिए हर एक वस्तु में कुछ ना कुछ सद्गुण अवश्य ह, उन्हें मुझे ढूँढ़ते आना चाहिए, ग्रहण करते आना चाहिए।

हम इस चराचर में श्रीसाईनाथ को देखने का आरंभ इस तरह से करेंगे, हर एक में से अच्छे गुणों को देखकर उसे अपनाने की कोशिश करेंगे। वृक्ष से परोपकार की भावना, श्‍वान से अनन्य ईमानदारी, चींटियों से प्रयासशीलता इस प्रकार के गुणों को ढूँढ़कर उसे ग्रहण करेंगे। मिलनेवाले हर एक श्रद्धावानों के गुण देखकर उसे अपनाकर उनकी भक्ति से, अनुभवों से सीखते रहेंगे। इसके पश्‍चात् धीरे-धीरे इस चराचर में विराजमान श्री साईनाथ का दर्शन हमें होता रहेगा। हमारे साथ होता यह है कि हमें दूसरों के दुर्गुण तुरंत ही दिखाई देते हैं, हम तुरंत ही उनकी निंदा भी करते हैं। दूसरों में होनेवाली हानिकारक प्रवृत्तियों को जानकर उनसे सावधान रहना निश्‍चित रूप से महत्त्वपूर्ण है परन्तु दूसरे में जो गुण हैं, उन्हें खोजकर, उनसे कुछ सीखकर हमें अपना विकास करना चाहिए।

मेरे साईनाथ ही इस चराचर सृष्टि को व्याप्त करके पूर्णत: विद्यमान हैं, यह भरोसा होना चाहिए। इससे होगा यह कि हमारी विषयवासनाएँ, कामनाएँ आदि अपने आप ही कम होने लगेंगी और साईभक्ति का उदय होगा। जैसे सूर्योदय होने पर सूर्य की किरणों से कोहरा छटने लगता है, उसी तरह हमारी कामनाएँ भी पिघल जायेंगी, नष्ट होने लगेंगी।

साथ ही श्रद्धावानों को भी इस बात का अहसास होगा कि ये इन्द्रियाँ, ये मन, यह बुद्धि आदि के समूह को जो मैं वास्तविक ‘मैं’ मान रहा था, वह मेरा स्वरूप न होकर ‘साईनाथ का दास’ यही मेरा वास्तविक स्वरूप है। यह संपूर्ण विश्‍व ही साईनाथ का है, मैं भी साईनाथ का ही हूँ और फिर बाबा की भक्ति के अलावा और कुछ भी बाकी न रह जायेगा। इसका अर्थ ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि मैं अपनी घर-गृहस्थी, बीबी-बच्चों आदि को छोड़कर नौकरी-धंधा आदि छोड़कर पूरे बदन पर राख पोतकर केसरिया पहन लूँगा। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। बल्कि मैं पहले की अपेक्षा और भी अधिक ज़िम्मेदार बनकर अपना जीवन जी सकता हूँ। यह सब साईनाथ की कृपा से मुझे प्राप्त हुआ है और इसी कारण गृहस्थाश्रम के कर्तव्यों को पूरा करना अत्यन्त आवश्यक है। केवल साईनाथ की भक्ति के कारण मैं इस पारिवारिक झमेले में ही फँसा नहीं रहूँगा, उलटे गृहस्थी के साथ-साथ परमार्थ भी साध्य कर लूँगा।

मैं अपने बीबी बच्चों के साथ भी प्रेमपूर्वक ही व्यवहार करूँ गा, परन्तु इसके साथ ही, यह सब कुछ साईनाथ की कृपा से ही प्राप्त हुआ है और उन पर होनेवाला मेरा प्यार यह साईनाथ के ही प्रेम का एक अंग है। इस बात का ध्यान भी मैं बनाये रखूँगा। अपने साथ-साथ मैं इन सभी को भी साईभक्ति की चाह सीखा दूँगा।

यहाँ पर हेमाडपंत आगे सोऽहम्, अहं ब्रह्मासि, तत्त्वमसि और प्रज्ञानं ब्रह्म इस बात का विवेचन भी संक्षेप में करते हैं। परन्तु यह सब अनुभूति का ही हिस्सा है और साईभक्ति के द्वारा यह अनुभूति अपने आप ही प्राप्त होती है, यह भी स्पष्ट रूप में कहते हैं। बाबा स्वयं यहाँ पर कहते हैं कि मैं ‘अनल हक’ नहीं हूँ, मैं ‘यादे हक’ हूँ। अर्थात मैं परमेश्‍वर नहीं हूँ, मैं परमेश्‍वर का निरंतर स्मरण करनेवाला, उस परमेश्‍वर का, दत्तगुरु का बंदा हूँ।

फिर हमें भी सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मैं भी अपने साईनाथ का बच्चा हूँ। मेरे अपने ‘मैं’ पन को दूर करने का आसान मार्ग है – ‘ये साईनाथ ही मेरे स्वामी हैं’, यह अपनी स्वयं की पहचान स्वयं को ही करवानी है।

‘मैं कौन हूँ’ यह कहने की अपेक्षा ‘मेरे स्वामी साईनाथ ही हैं’ यह मेरी पहचान होनी चाहिए। एक सच्चा श्रद्धावान सदैव यही कहता है – ‘हे साईनाथ, आपके ‘तुम’ में ही मैं हूँ।’ यही एक सच्चे श्रद्धावान के अंतर्मन के बोल होते हैं।

मैं साईनाथ का शिष्य हूँ अथवा साईनाथा का भक्त हूँ ऐसा कहने की अपेक्षा यह कहना अधिक श्रेयस्कर होगा कि ‘साईनाथ मेरे सद्गुरु हैं’। सच्चे श्रद्धावान की चाहत यह भी नहीं होती है कि ‘मैं साईनाथ का भक्त हूँ।’ इसमें होनेवाले ‘मैं’ की भी इच्छा नहीं होती है। उसे बस केवल साईनाथ ही चाहिए होते हैं। इसी लिए वह साईनाथ से ‘हे साईनाथ तुम ही मेरे सद्गुरु हो’ यही वह कहता है। और यह वह केवल मुख से ही नहीं कहता है बल्कि यह उसके हृदय से निकलनेवाले बोल होते हैं। ‘मैं भक्ति करता हूँ’ इसमें भी मैं ‘कर्ता’ के रूप में ही सुनाई देता है। साथ ही सच्चे श्रद्धावान को अहंकार भी अच्छा नहीं लगता है। दर असल वह उसके पास होता ही नहीं है। इसी कारण अपने-आप ही उसके हर एक उच्चारण में, हर एक आचार में, विचार में, ‘मैं कर्ता हूँ’ यह भाव न होकर ‘साईनाथ ही कर्ता हैं’ यही भाव रहता है और इसी लिए ‘हे साईनाथ, तुम्हीं मेरे सद्गुरु, मेरे मालिक हो’ यह दास्य भाव उसके हृदय में प्रस्फुटित होता रहता है। हमारे पास भी हमारी यही पहचान होनी चाहिए कि मैं और कोई भी न होकर केवल साईनाथ ही मेरा सब कुछ हैं। ये साईनाथ ही मेरे जीवन की दिशा निश्‍चित करते हैं।

‘हे साईनाथ आप हैं इसी लिए मैं हूँ’ इस विश्‍वास को, इस प्यार को सदैव अपने हृदय में बनाये रखना चाहिए।