श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-४०)

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन। प्रेमपूर्वक उनका श्रवण।
होगा इससे भक्त-कश्मल-दहन। सरल साधन परमार्थ का॥

हेमाडपंत की यह अप्रतिम पंक्ति हमें परमार्थ के आसान साधन का, सहज सुंदर मार्ग का उपदेश करती है। हर एक भक्त को जो कुछ भी चाहिए होता है, वही ये साईनाथ हमें यहाँ पर दे रहे रहे हैं। हमारे पापों की राशि जला देने के लिए हमें सहजसुंदर मार्ग प्राप्त हो, यही तो हमारी अपेक्षा होती हैं। साईनाथ के समीप जाने के लिए सहज आसान मार्ग की हमें ज़रूरत होती है। परमार्थ में अनेक मार्ग होते हैं, भक्तिमार्ग में भी अनेक मार्ग होते हैं; परन्तु इनमें से हम जिस मार्ग पर से चलकर सहज प्रवास कर सकें, ऐसा मार्ग कौन सा है? इस प्रश्‍न का उत्तर ऊपर उल्लेखित ओवी में हमें प्राप्त होता है।

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन एवं उसका प्रेमपूर्वक श्रवण करना यही है वह सहज आसान मार्ग, जिससे हमारे पापों की संपूर्ण राशि जलकर खाक हो जाती है।

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन करना और उनका प्रेमपूर्वक श्रवण करना यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। तात्पर्य यह है कि बाबा के चरित्र की रूक्ष चिकित्सा न करते हुए प्रेमपूर्वक उनका श्रवण करना यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि यहाँ पर चिकित्सा, वाद-विवाद इन जैसी बातों के लिए कोई भी स्थान नहीं है। ‘श्रवण’ इस शब्द में श्रवण से संबंधित होनेवाले मनन, चिंतन, निदिध्यास एवं आचरण इन सभी बातों का भी समावेश होता ही है, बाबा के शुद्ध यश का वर्णन करना यानी श्री साईनाथ का गुणसंकीर्तन यही परमार्थ का सर्वोत्तम आसान मार्ग हैं।

साईनाथ के गुणसंकीर्तन के ही कारण हमारे पापों का ढेर जलकर राख हो जाता है, इसी सत्य से यह ओवी हमें परिचित करवाती है। बाबा के यश का वर्णन एवं श्रवण इसी मार्ग का स्वीकार हमें करना चाहिए। बाबा के पवाड़े गाने से (यश का गान करने से) ही श्रीसाईनाथ हमारे जीवन में कर्ता बनकर सक्रिय रहते हैं।

‘जो-जो जैसा-जैसा करेगा। वह-वह वैसा-वैसा ही भरेगा।’ कर्म के अटल सिद्धांत के अनुसार ही जीवन में हर एक कर्म का फल मुझे मिलता है। जब मैं भगवान का गुणसंकीर्तन करता हूँ, तब मेरी भक्ति के कारण मेरे जीवन के कर्ता भगवान बन जाते हैं और इससे मेरा जीवन सफल संपूर्ण बन जाता है। वहीं, मैं यदि अपने अहंकार का, ‘मैं’ पन का पवाड़ा गाता रहूँगा, अपना ही यशगान करता रहूँगा तो मेरे जीवन में तामसी अहंकार अर्थात रावण सक्रिय बन जाता है।

श्रीराम के सक्रिय होने से सभी निशाचरचमुओं का, सभी की सभी पापरशियों का नाश हो जाता है। परन्तु जब रावण हमारे जीवन में सक्रिय होता है, उस वक्त गलतियाँ, अपराध, पाप इन जैसी सभी प्रकार की अनुचित एवं अहितकारक बातें बढती रहती हैं। श्रीराम के शुद्ध यश का गान करने से हमारा देह ही अयोध्या बन जाता है और जीवन में रामराज्य का आगमन होता है। मग़र जब तामसी अहंकाररूपी रावण को हम अपने जीवन में सक्रिय करते हैं, तब हमारी स्थिति रावण-शासित लंका के समान हो जाती है और जीवन ही शोकाकुल हो जाता है।

इसीलिए हमें स्वयं ही इस बात का निश्‍चय करना चाहिए कि जीवन में किसे अपनाना है और किसका त्याग करना चाहिए। यदि हम राम से मुँह फेर लेते हैं तो स्वाभाविक है कि हम रावण को अपना रहे हैं। इसीलिए हमें सदैव सावधान रहकर श्रीराम के ही पवाड़े गाते रहना चाहिए। श्रीराम के पवाड़े गाना कभी भी बंद नहीं करना चाहिए। जो श्रीराम के पवाड़े निरंतर गाता रहेगा, उसके जीवन के इर्द-गिर्द लक्ष्मण रेखा का कवच अपने-आप ही श्रीराम प्रदान करते हैं और यह लक्ष्मण रेखा पार करने की ताकत रावण में तो क्या और किसी में भी नहीं है। इस तरह के हजारों रावण भी यदि एक हो जायें तब भी वे सब के सब मिलकर भी लक्ष्मणरेखा को पार नहीं कर सकते हैं, यही सच यह ओवी हमें बता रही है।

श्रीराम के शुद्ध यश का वर्णन एवं श्रवण करनेवाले श्रद्धावान के जीवन में पाप, रावण अथवा किसी भी प्रकार की आसुरी वृत्ति प्रवेश ही नहीं कर सकती है। यदि हम चाहते हैं कि रावण हमारे जीवन में कभी भी प्रवेश न करने पाए और मेरे प्रिय राजाराम ही मेरे हृदय-सिंहासन पर विराजमान रहें तो इसके लिए हमें ‘बाबा के शुद्ध, पवित्र यश का वर्णन एवं प्रेमपूर्वक उसका श्रवण’ करना चाहिए। बस्, यही सबसे आसान एवं सहज सुंदर मार्ग है।

श्रीसाईसच्चरित यह संपूर्ण ग्रंथ ही ‘बाबा’ के शुद्ध यश का गुणसंकीर्तन है’, यही बात हेमाडपंत हमें यहाँ पर बता रहे हैं। यहाँ पर मायातीत ब्रह्म क्या है, भक्ति-मुक्ति-विरक्ति क्या है, वर्णाश्रमधर्म, द्वैताद्वैत आदि बातों का वर्णन करने की ना तो कोई ज़रूरत है और ना ही इनके लिए यहाँ कोई स्थान है। जिन्हें इन सब के बारे में जानकारी हासिल करनी है, उन्हें इस विवादरूपी झमेले में न पड़ते हुए अथवा बेकार के शब्दपांडित्य का दिखावा करनेवाले ग्रंथ न पढ़कर संत ज्ञानेश्‍वरजी, संत एकनाथजी इन जैसे संतों द्वारा लिखे गये श्री ज्ञानेश्‍वरी एवं श्री एकनाथी भागवत इन जैसे ग्रंथों का आश्रय करना चाहिए। इन ग्रंथों के परिशीलन से मन को सन्तोष अवश्य प्राप्त होगा, इस में कोई शक नहीं है और साथ ही श्रीराम के गुणसंकीर्तन से ही श्रीराम को मैं प्राप्त कर सकता हूँ, इस बात का भी अहसास हो जाता है, क्योंकि ‘भक्त्याऽहमेकया ग्राह्य:’ (मैं केवल भक्तिमार्ग से ही प्राप्त हो सकता हूँ यह स्वयं भगवान का वचन है) इस सत्य का पता इन जैसे ग्रंथों के द्वारा जिज्ञासुओं को चल जायेगा और वे अन्य सभी बातों को छोड़कर ‘बाबा के शुद्ध यश के वर्णन के मार्ग का अवलंबन करेंगे।

इस गुणसंकीर्तन का मार्ग ही, कथासंकीर्तन का मार्ग ही कलियुग में सर्वाधिक श्रेयस्कर है। कलियुग के प्रभाव से मनुष्य में होनेवाले सत्त्वगुण का प्रभाव कम हो चुका होता है और इसी कारण मानव में परमार्थ के साधनों का आचरण करने की क्षमता भी कम हो चुकी होती है। अत एव हम सामान्य मानवों के लिए भगवान अकारण कारुण्य का वर्षाव करते हुए परमार्थ को अधिक से अधिक आसान बनाते रहते हैं और यह सब भगवान केवल निरपेक्ष प्रेम से करते रहते हैं।

सत्ययुग अर्थात कृतयुग में जो कुछ भी ‘शम-दम’ से प्राप्त होता था, त्रेतायुग में जो ‘यज्ञ-यजन’ से प्राप्त होता था, द्वापरयुग में जो ‘पूजन-अर्चन’ से प्राप्त होता था, वह सब कुछ कलियुग में नामगुणकथासंकीर्तन से प्राप्त होता है, हमारे जीवन में भी कभी किसी चीज़ की कमी नहीं पड़ने पाती है और हमारा परमार्थ भी इसी के साथ साथ सहज ही साध्य होता रहता है।

‘कृतयुग में ‘शम-दम’। त्रेता में ‘यजन’, द्वापार में ‘पूजन’।
कलियुगम में ‘नामकथासंकीर्तन’। ये स्वल्प साधन हैं परमार्थ के॥

अब हम समझ सकते हैं कि बाबा के शुद्ध यश का सहज आसान मार्ग यही हमारे लिए सर्वोत्तम होने के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ भी है। गृहस्थाश्रम एवं परमार्थ इन दोनों को भी एक ही समय में श्रेयस्कर एवं आनंदमय बनाता है, यह श्री साईनाथ के गुणसंकीर्तन का आसान, सहज, सरल एवं सुंदर मार्ग!