श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

अण्णा चिंचणीकर ने बाबा से कहा कि हेमाडपंत को नौकरी मिल जाए और उनकी घर-गृहस्थी एवं उनकी दैनिक ज़रूरतों की पूर्ति हो सके, इसके लिए आप ही कुछ कीजिए। अण्णा की इस विनती को सुनकर श्रीसाईनाथ ने हेमाडपंत से कहा ‘अब केवल मेरी ही चाकरी करो; मेरा बस्ता रखो, तुम्हारी झोली सदैव भरी ही रहेगी, तुम्हारे योगक्षेम का वहन मैं करूँगा।’

प्रत्यक्ष साईनाथ के मुख से निकले उद्गारों को सुनकर हेमाडपंत पूर्णत: निश्‍चिन्त हो गए। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुण हमें हेमाडपंत से सीखना चाहिए। साईनाथ के स्वयं कहने पर हमें उस बात से संबंधित चिंता करना छोड़ देना चाहिए। मुझे यदि कोई तकलीफ है और उसकी चिंता मैं करता हूँ तो यह स्वाभाविक ही है। परन्तु प्रत्यक्ष साईनाथ यदि गवाही दे रहे हैं, तो उसके बाद भी उसी चिन्ता में डूबे रहना गलत है। इसकी अपेक्षा हमें बाबा के वचनों का पालन करते हुए, उन पर पूरा विश्‍वास रखकर वे जो करने को कह रहे हैं, वही हमें करना चाहिए।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईहेमाडपंत यहाँ पर बाबा से यह नहीं पूछते हैं कि बाबा आपकी नौकरी करने से हमारा घर भला कैसे चलेगा? नौकरी यदि नहीं करूँगा तो पैसे कहाँ से आयेंगे?

हेमाडपंत एक आदर्श भक्त हैं।

एक बार बाबा ने मुझे स्पष्ट शब्दों में कह दिया, वही शत प्रतिशत सत्य है। और उस बात को मेरे जीवन में किस तरह से घटित करना है, यह बाबा ही जानते हैं। बाब ने जो कहा है वह सच होगा ही।

साईसच्चरित में एक ओवी है – ‘शब्द बाबांचा खाली पडेल। हें तों न सहसा कधी घडेल॥ इसका अर्थ यह है कि साईनाथ का कहा शब्द कार्यकारी नहीं होगा ऐसा कभी भी हो ही नहीं सकता, साईबाबा का शब्द सच होता ही है।

यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अहसास हेमाडपंत को है। हमें भी यह अहसास होना ही चाहिए। बाबा ने स्वयं के मुख से जो हमसे कहा है, इस साईसच्चरित में बाबा ने अपने भक्तों को जो-जो वचन दिया है, वह प्रत्येक वचन १०८% सत्य ही है। मुझसे बाबा जो कह रहे हैं वह मुझे करते रहना है, फिर बाबा को मेरे जीवन में कब, क्या और कैसे करना है, इसका निश्‍चय वे स्वयं ही करेंगे। और एक बार यदि बाबा ने स्वयं वचन दे दिया है, तो फिर चिंता करने का सवाल ही कहाँ उठता है? हेमाडपंत यही सोचकर पूर्ण शांत हो गए और मुझे अब केवल साई की चाकरी करनी है, बाबा का ही बस्ता रखना है। इसी निश्‍चय के साथ उनका मन शान्त हो गया।

‘येथूनि पुढें भक्तिभावा। करावी यानें माझी सेवा।
करुणा येईल देवाधिदेवा। अक्षय ठेवा लाधेल॥
मग ही पूजा करावी कैसी। मी कोण कैसा जाणावा भरंवसी।
साईचा तो देह विनाशी। ब्रह्म अविनाशी सुपूज्य॥

अब इसके बाद हेमाडपंत भक्तिभावसहित मेरी सेवा करे, उसपर कृपानिधान करुणा करेंगे और उसे अक्षय खज़ाना मिल जायेगा। फिर यह पूजा कैसे करनी है? तो विश्‍वास रखकर मेरे स्वरूप को जान लेना चाहिए। साई का यह देह विनाशी है, ब्रह्म अविनाशी सुपूज्य है।

बाबा हेमाडपंत से स्वयं ही ‘मैं कौन हूँ’ यह स्पष्ट शब्दों में बता रहे हैं। बाबा स्वयं के सगुण निराकार रूप के बारे में स्वयं ही बता रहे हैं। सगुण साकर रूप, जो हमें आँखों से दिखाई देता है, वे हमारे साईनाथ ही हैं, परन्तु इसके साथ ही ये साईनाथ सगुण निराकार एवं निर्गुण निराकार स्वरूप में भी पूर्ण ही हैं। साई का यह देह उन्होंने विशेष अवतार कार्यहेतु ही धारण किया है। देह नाशवंत होगा परन्तु ये साईनाथ साक्षात् अविनाशी ब्रह्म ही हैं।

चराचर सृष्टि का निर्माण अष्टधा प्रकृति के द्वारा ही हुआ है। अव्यक्त, महान, अहंकार (सत्त्व, रज एवं तम) एवं पंच तन्मात्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध) इन आठ तत्त्वों को अष्टधा प्रकृति कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन को भगवद्गीता में जो कहा, वह बाबा स्वयं ही यहाँ बता रहे हैं।

हर एक चराचर, सजीव-निर्जीव वस्तु को नाम, रूप एवं आकृति इन तीनों से निर्दिष्ट किया जाता है। तात्पर्य यह है कि हर एक बात, फिर वह सजीव हो अथवा निर्जीव, स्थिर हो अथवा गतिमान, उसे नाम है, उसका रूप है और उसकी आकृति भी है। अब गाय का ही उदाहरण लीजिए। गाय यह उसका नाम हम लेते हैं। उसका विशिष्ट रूप, जो दूसरों से पूर्णत: भिन्न है। वह हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। तो उसका अपना रूप भी है और उसके सभी गुणधर्मों को लेकर उसकी आकृति बनी हैं। इस तरह नाम-रूप-आकृति से युक्त इस विश्‍व का विस्तार मैं ही हूँ, यही साईनाथ कह रहे हैं। इसका अर्थ यही है कि हर एक बात में इस साईनाथ का अस्तित्व है ही।

केवल ये साईनाथ उस स्थान पर सक्रिय स्वरूप में हैं अर्थात् कर्ता स्वरूप में हैं या साक्षी स्वरूप में हैं इसी पर सब कुछ निर्भय करता है। परमात्मा हर एक वस्तु में, हर किसी के हृदय में, हर किसी के जीवन में हैं ही। हमें चाहिए कि उन्हें कर्ता के रूप में अपने जीवन की बागडोर हम दे दें। ‘मैं ही कर्ता हूँ’ इस अहंकार के कारण हम उन्हें हमारे जीवन में क्रियाशील नहीं होने देते हैं और साक्षी रूप में रहने पर मजबूर कर देते हैं।

साईनाथ मेरे जीवन में सक्रिय रूप में हैं या साक्षी रूप में हैं, इस पर मेरा जीवन-प्रवास कैसा होगा, यह निर्भर करता है। साईनाथ हर किसी के जीवन में हैं ही; परन्तु वे ‘साईमाऊली’ के (माता के) रूप में हैं या केवल ‘न्यायाधीश’ के रूप में हैं, इस पर सबकुछ निर्भर करता है।

साईनाथ कहते हैं – ‘ॐ अर्थात् प्रणव यह मेरा वाचक है और एकमात्र मैं ही उसका वाच्य हूँ। विश्‍व में विद्यमान सभी वस्तुओं में मैं ही व्याप्त हूँ। ॐकार अर्थात् प्रणव यह परमात्मा की अभिव्यक्ति है। ये परमात्मा इस विश्‍व में प्रकट हुए ॐ इसी स्वरूप में और इस ॐकार की ही संपूर्ण विश्‍व में सदैव सत्ता है। इस ॐकार ने ही अनंत कोटी ब्रह्माण्डों का निर्माण किया और वह उसी में व्याप्त है। वही सर्वत्र व्याप्त रहकर भी शेष है।

संपूर्ण विश्‍व ॐकार में ही विलयित हो जाता है। ॐकार ही परमात्मा का सगुण निराकार स्वरूप है, जिसे कभी भी, कोई भी, किसी भी तरह से नहीं रोक सकता है। इस ॐकार की ही संपूर्ण विश्‍व में सत्ता है। श्रीमद्पुरुषार्थ प्रेमप्रवास में अनिरुद्धजी ने ॐकार की ही संपूर्ण विश्‍व पर सत्ता है यह बताया है। श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रन्थराज के ‘प्रेमप्रवास’ इस खण्ड में अनिरुद्धजी ने ॐकार के बारे में सुस्पष्ट विवरण किया ही है।

सभी श्रद्धावानों के लिए ॐकार यह अत्यन्त पवित्र एवं परमोच्च है। ॐकार को माननेवाले सभी प्रणवधर्मी श्रद्धावान सदैव इस ॐकार की ही उपासना करते हैं। इसी लिए हम साईभक्त साईनाथ के नाम के पहले ‘ॐ’ लगाकर फिर ‘साईनाथाय नम:’ कहते हैं, यही जप करते हैं। इसका कारण यह है कि सगुण साकार साईनाथ का सगुण निराकार स्वरूप है ॐकार। साथ ही ॐकार यह अत्यन्त पवित्र एवं सर्वश्रेष्ठ सामर्थ्यवान होने के कारण सभी प्रकार की बुरी प्रवृत्तियों का नाश ॐकार से ही होता है। ॐकार से ही सभी पवित्र मंत्रों का जन्म हुआ है। इसी लिए यहाँ पर साईनाथ हमें ॐकार स्वरूप की जानकारी स्पष्ट रूप में बता रहे हैं। व्यापक होनेवाले इस साईनाथ को हमें बारंबार लोटांगण करना चाहिए।