श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३३)

साई, आप ही हैं मुझ अंधे की लाठी। आप के होते मुझे किस बात का भय।
लाठी टेंकते-टेंकते पीछे-पीछे। सीधे आसान मार्ग पर चलूँगा मैं॥

बाबा के पीछे-पीछे चलते रहना यही आसान राह है, यह बात तो हम जान चुके हैं। मैं गलत राह पर से चलूँ और बाबा को मेरे पीछे चलना चाहिए, यह अपेक्षा रखना यह तो सर्वथा अनुचित ही है। मेरे लिए आसान राह कौन सी होगी यह साई को तय करने देना चाहिए। मैं अपनी मर्ज़ी से गलत राह पर से चलता रहूँ और साई मेरे पीछे चलें, यह तो सरासर गलत ही है। यह करने वाला भक्त नहीं कहलाया जायेगा।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईबाबा जिस तरह भक्तों के आगे रहते हैं, उसी तरह वे भक्तों के पीछे भी रहते ही हैं। वे अपने भक्तों का सदैव परिपालन करते ही हैं, लेकिन बाबा के द्वारा बतलाये गए मार्ग पर चलनेवाला ही साई का भक्त होता है, यह बात भी हमें ध्यान में रखनी चाहिए।

बाबा के पीछे-पीछे चलने का भावार्थ है – बाबा के नियमों का पालन करते हुए चलना, बाबा जैसा चाहते है वैसा ही आचरण करना। बाबा का नियम एक ही है – पावित्र्य-अधिष्ठित सत्य, प्रेम, आनंद। जो सत्य, प्रेम, आनंद का अनुसरण करते हुए पवित्र आचरण करता है, वही सही मायने में बाबा के द्वारा दिखलायी गयी राह पर चलता है और बाबा भी अपने ऐसे भक्त के पीछे सदैव होते ही हैं।

श्री स्वामी समर्थ की गवाही की हमें यहाँ पर याद आती है – ‘भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे’ (डरो नहीं, मैं तुम्हारे पीठपीछे हूँ)। इसमें होनेवाला ‘मैं‘ यानी अक्कलकोटनिवासी श्री स्वामी समर्थ और ‘तुम’ यानी बाबा के पीछे पीछे चलनेवाला श्रद्धावान।

फिर इस आसान राह पर से चलते समय श्रद्धावान के सामने चाहे कितना भी कठिन प्रसंग क्यों ना आ जाये, फिर भी स्वामी समर्थ स्वयं अपने उस भक्त के साथ होते ही हैं और पिपीलिकापथ पर चलनेवाले श्रद्धावान को वे गवाही देते हैं – ‘भिऊ नकोस, मी तुझ्या पाठीशी आहेच’ (डरो नहीं, मैं तुम्हारे पीठपीछे हूँ ही)। स्वामी किसके साथ हैं? तो पिपीलिका पथ पर चलनेवाले श्रद्धावान के साथ। आसान राह यानी पिपीलिकापथ, देवयानपथ। इस राह पर चलनेवाले ऐसे भक्त के साथ ही स्वामी समर्थ सदैव होते ही हैं, इसीलिए हमें सत्य, प्रेम एवं आनंद के पवित्र पथ पर चलते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

ऐसे ये सद्गुरुनाथ जिसके पीछे खड़े रहते हैं, उसके लिए असंभव ऐसा क्या हो सकता है? कुछ भी नहीं। ऐसे प्रेमल सद्गुरुनाथ जिसके परिपालनकर्ता हैं, उसके जीवन का समग्र विकास होगा ही, फिर चाहे उसमें कोई कमी भी क्यों न हो! हेमाडपंत हमें यही कहते हैं कि हम यदि पिपिलिका पथ पर, आसान राह पर चल रहे हैं, तो फिर हम यदि मूक (गूँगे) हैं, पंगु हैं, तब भी हमें घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि जब ये सद्गुरुनाथ हमारे साथ हैं तब मूक भी बृहस्पति के समान बोलने लगते हैं और पंगु भी आसानी से मेरु पर्वत पार कर जा सकते हैं।

मूक बृहस्पति समान बोलने लगता है। पंगु मेरू पर्वत लाँघ कर जाता है।
ऐसी है जिन साईनाथ की अतर्क्य शक्ति। उनकी लीला वे ही जाने॥

कहने का तात्पर्य यह हैं कि मेरे देह के जो शक्तिकेन्द्र अक्षम हैं, उन्हें शक्ति प्रदान करके सद्गुरु साईनाथ मेरा जीवन का विकास करते हैं। जो श्रद्धावान भक्ति के आसान मार्ग का क्रमण करते हैं, उनके शरीर के अक्षम केन्द्रों को एवं अविकसित बीजों को परमेश्‍वरी ऊर्जा प्रदान कर साईनाथ उन्हें सक्षम बनाते हैं, विकसित करते हैं, मूक को भी बृहस्पतिसमान वाचाल बना देते हैं और पंगु को भी मेरु पर्वत लाँघ जाने जितना सक्षम बना देते हैं, ये दो रूपक यहाँ पर हेमाडपंत ने प्रस्तुत किए हैं। इन दोनों रूपकों का प्रयोग हेमाडपंत ने यहाँ पर काफी सुंदर तरीके से किया है।

मूक एवं पंगु इन दो रूपकों पर यदि गौर करें तो हमें पता चलता है कि मूक व्यक्ति की जिह्वा में दोष नहीं होता है, दोष होता है उसके कानों में। वह कुछ सुन नहीं सकता इसीलिए वह कुछ बोल भी नहीं पाता हैं, वहीं पंगु व्यक्ति के मामले में या तो उसके पैरों में, वहाँ की स्नायुओं में दुर्बलता होती है या फिर चेता संस्थान (नर्व्हस सिस्टिम) में आनेवाली विकृति के कारण भी पंगुपन आ सकता है। तात्पर्य यह है कि इन दो प्रकार के दोषों के कारण ही अक्षमता आती है। जो हमारे जीवन पर अपना गहरा प्रभाव डालती है। अक्षमता के कारण क्रियाशून्यता भी आ जाती है। वहाँ के अवयवों में दोष होना यह भी एक प्रकार हो सकता है। इसके साथ ही जिस स्थान में क्रियाशून्यता दिखाई देती है (मूकपन), वहाँ पर कोई दोष न होकर किसी अन्य जगह दोष हो सकता है (बहरापन)।

हमारे जीवन में भी दो प्रकार के संकटों का उद्भव होता है।

१) हम गलती करते हैं और हमारी उस गलती के कारण ही संकटों का पहाड़ हम पर टूट पड़ता है। हमें अपनी गलती का अहसास हो जाता है और इस बात का पता भी चल जाता है कि मेरी इस गलती के कारण ही संकटों का यह पहाड़ मुझ पर टूट पड़ा है। इसका उदाहरण है कि मैं सिगरेट, तमाखू, बिड़ी आदि का सेवन करता हूँ, इससे होता यह है कि एक दिन मुझे पता चलता है कि मुझे कर्करोग हो गया है। इससे यह बात तो स्पष्ट है कि यह सब मेरी गलती का ही परिणाम है। मैं चरबी बढाने वाली चीज़ें अतिप्रमाण में खाता हूँ, आलस्यवश व्यायाम भी नहीं करता हूँ, तो ऐसे में होता यह है कि एक दिन दिल का दौरा पड जाता है।

२) दूसरे प्रकार का संकट अर्थात ऐसा संकट जिसके उद्भव होने का कारण मेरी समझ में नहीं आता। लाख कोशिशें करने के बावजूद भी इस संकट के आने का कारण मुझे मेरे व्यवहार आदि से पता नहीं चल पाता हैं। मैं तो कभी भी धूम्रपान अथवा तमाखू आदि को स्पर्श नहीं करता, परन्तु एक दिन अचानक मुझे कर्करोग हो जाने का पता चल जाता है। अब यहाँ पर मुझे यह प्रश्‍न सताने लगता है कि कर्करोग हो ऐसा तो मैंने कुछ भी नहीं किया था, फिर भला मुझे यह रोग क्यों और कैसे हो गया? मैं तो नियमित रूप में व्यायाम भी करता हूँ, प्रमाणबद्ध समतोल आहार भी लेता हूँ, चरबी बढाने वालीं चीजें नहीं खाता हूँ, पर ङ्गिर भी एक दिन अचानक किसी कारण के न होने के बावजूद भी दिल का दौरा पड जाता है। यह क्यों और कैसे हुआ? इस प्रश्‍न का उत्तर मेरे पास नहीं होता। ऊपरी तौर पर देखने से कोई भी कारण दिखायी नहीं देता है, परन्तु रोग तो हो चुका होता है।

हमारे जीवन में भी कई बार ऐसा ही कुछ हो जाता है। और अचानक संकट द्वार पर आकर दस्तक देने लगता है। कभी-कभी तो होता यह है कि मैं किसी की मदद करने हेतु ही जाता हूँ और वही बात उस व्यक्ति के लिए नुकसानदेह साबित होती है या उस व्यक्ति के मन में मदद करने की मेरी क्रिया के प्रति गलतफहमी हो जाती है। इससे दुश्मनी पैदा हो जाती है। ‘करने जाता हूँ एक और हो जाता है कुछ और ही’ या ‘कर भला हो बुरा’ ऐसी परिस्थिति निर्माण हो जाती है। मूक व्यक्ति की वाचा में कोई भी दोष दिखलाई नहीं पड़ता है, पर ङ्गिर भी वह बोल नहीं सकता है। यह बात जिस तरह सच है उसी तरह हमारे जीवन में भी होता रहता है। मुझे अपने में कोई भी दोष दिखलाई नही देता, पर फिर भी कठीन परिस्थिति में तो मैं घिर ही चुका होता हूँ।

और फिर हम परमात्मा को ही पूछते हैं कि मेरा कोई भी दोष न होते हुए भी मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? परन्तु यहाँ पर हमें विशेष तौर पर मूक व्यक्ति का दृष्टान्त ध्यान में रखना चाहिए कि दोष वाचा का नहीं है, मग़र बहरेपन का दोष तो है ही। जो हमारी समझ में नहीं आता। और हमें ऐसा लगता है कि मैं बोल ही नहीं सकता हूँ। ऐसे ही मुझ पर अचानक आनेवाले संकटों के बारे में ऊपरी तौर पर देखने से कुछ भी पता नहीं चल पाता है, मग़र फिर भी उसका कारण तो होता ही है। वह कारण है ‘दुष्प्रारब्ध’। इस दुष्प्रारब्ध के कारण ही मुझ पर इस प्रकार के आकस्मिक संकटों का पहाड़ टूट पड़ा है। और यह दुष्प्रारब्ध मेरी ही गलतियों से बना होता है। इसीलिए कभी भी हमें ऐसा नहीं बोलना चाहिए कि मेरा कोई दोष ना होते हुए भी यह परिस्थिति मुझ पर आन पड़ी है। वाचा का दोष नहीं होगा, परन्तु श्रवणेन्द्रिय में तो दोष है ही और इसीलिए मैं मूक हूँ। बिलकुल वैसे ही प्रारब्धवश आनेवाले संकट भी होते हैं, जिन्हें हम जान नहीं पाते हैं। परन्तु मेरे साईनाथ यह जानते हैं और इन्हीं साईनाथ की कृपा से प्रारब्ध का नाश होता है।

मूक को बृहस्पति समान कौन बुलवा सकता है। वहीं, जो व्यक्ति अपने मूकपन के मूल कारण को जानता है और यह भी जानता है कि उसके बहरेपन को साईनाथ ही दूर कर सकते हैं और वे ही उसके दुष्प्रारब्ध का नाश भी करते हैं। ‘साईनाथ ही मेरे जीवन के भी सभी संकटों का परिहार कर सकते हैं, केवल साईनाथ ही ये कर सकते हैं।’ यही बात यहाँ पर हेमाडपंत हमें बताते हैं। वे कहते हैं कि मेरा प्रारब्ध चाहे कितना भी दुष्कर क्यों न हो, मैं मूक, पंगू आदि ही क्यों न रहूँ, मग़र फिर भी जब मैं प्रेम, सेवा, शारण्य इस पथ पर चलने लगता हूँ, तब ये साईनाथ मेरे प्रारब्ध का नाश करते ही हैं और मूक को बृहस्पति समान बुलवाने लगते हैं और पंगु को मेरू पर्वत भी लाँघ जाने की शक्ति प्रदान करते हैं। केवल एकमात्र सद्गुरुतत्त्व ही ऐसा है, अन्य कोई भी नहीं।