श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-५३)

हेमाडपंत अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं-

‘वाडे में क्या चल रहा था।
किस बात पर बहस चल रही थी।
क्या कहा इन ‘हेमाडपंत’ ने।
मेरी ओर देखते हुए कहा॥

हमने यह देखा की बाबा ने ‘वाडे में किस बात पर बहस चल रही थी’ यह पूछते समय दाभोलकरजी की तरफ इशारा करते हुए काकासाहब दीक्षित से पूछा, ‘‘क्या कहा इन हेमाडपंत ने?’’ यहाँ पर साई ने दाभोलकर का ‘हेमाडपंत’ यह नामकरण किया और इसी माध्यम से यह सीख भी दी कि अहंकार के कारण वाद-विवाद कर अपनी चतुराई दिखाना अनुचित है, यह वाद-विवाद सर्वथा अनुचित ही है। साईराम के इस वाग्बाण ने यानी शब्दरूपी बाण ने अपना काम अचूकता से किया।

हेमाडपंत ने उसी क्षण निश्‍चय कर लिया कि इसके बाद अब इस वादविवाद को मैं अपने जीवन में रत्ती भर भी स्थान नहीं दूँगा। वाद-विवाद करने की बुद्धि को मैं विद्वान होने की निशानी मान रहा था, मग़र यह बिलकुल गलत है। उलटे अहंकार के ही कारण यह वादविवाद उत्पन्न होता है और अहंकार को ही बढाता है। इसीलिए इससे मनुष्य अधिक से अधिक सकुंचित होता चला जाता है। इस वादविवाद करने का अर्थ यह है कि हम वाणी का हीन-योग अर्थात वाणी का अनुचित उपयोग कर रहे हैं।

परमेश्‍वर ने यदि मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में कुछ अधिक दिया है तो वह है ‘वाणी’। वाणी इस शब्द का अर्थ केवल ‘वाचा’ यह नहीं है, अपितु बुद्धिसहित ‘वाचा’ यह इसका अर्थ है। मनुष्य को बुद्धि मिली है और उसी बुद्धि के अनुसार मनुष्य की भाषा समृद्ध हुई है। इस बुद्धि का, इस वाचा का उपयोग करके जिह्वा के द्वारा जिस तरह परमात्मा का नाम गुण, लीला-संकीर्तन आदि करना यह उचित है, उसी तरह मन:पूर्वक भी करना चाहिए। क्योंकि केवल शरीर की जीभ और उससे होनेवाली अभिव्यक्ति इतना ही वाचा इस शब्द का अर्थ नहीं है, बल्कि मन की अभिव्यक्ति भी वाचा इस शब्द में अन्तर्भूत है।

परमेश्‍वर ने हमें मनुष्य जन्म दिया है, यह उनका हमारे ऊपर किया गया अनंत उपकार ही है, क्योंकि यह नरजन्म दुर्लभ है। इस मानवयोनि में ही केवल ‘वाणी’ प्राप्त हुई है और इसीलिए इस वाणी का उचित उपयोग करना हमारे लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। परन्तु जब हम वाद-विवाद करते हैं, तब हम अपनी इस वाणी का अनुचित उपयोग करते हैं। जब हम इस वाणी से किसी की निंदा करते हैं, तब हम इस वाणी का अनुचित उपयोग करते हैं। जब हम अपने स्वार्थ हेतु किसी अन्य व्यक्ति की बेवजह बढ़ाचढ़ाकर तारीफ करते हैं, वह भी वाणी का अनुचित उपयोग ही कहलाता है।

श्रीमद्पुरुषार्थ के अनुसार ‘स्तुति केवल भगवान की ही करनी चाहिए। किसी मनुष्य के प्रसंशनीय कार्य के प्रति उसका उचित गौरव अवश्य करना चाहिए। परन्तु स्तुति केवल भगवान की ही करनी चाहिए। इसके लिए हमें वाणी का उपयोग काफ़ी सोच-समझकर विवेकपूर्ण रूप से ही करना चाहिए। खास कर बहस, झगड़े-झमेले, शेखी बघारना, बेकार की बकबक करना, निंदा करना इन सब के लिए हमारे वाणी का उपयोग करना सर्वथा अनुचित है। वाणी का उचित उपयोग है- परमात्मा का नामस्मरण, नामसंकीर्तन, परमात्मा के गुणों एवं लीलाओं का संकीर्तन आदि करना।

जब हम वाद-विवाद करते हैं, उस वक्त हम स्वयं की शेखी बधारकर दूसरों को तुच्छ समझते हैं। स्वयं जो कह रहे हैं वह सच साबित कर दूसरों को झूठा साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। अहम बात यह है कि उतना समय परमात्मा के नाम-गुण-संकीर्तन में व्यतीत न करते हुए अपनी वाणी का गलत उपयोग करते हैं। मनुष्य को सर्वप्रथम इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वाणी के उचित उपयोग के लिये ही यहाँ पर साईनाथ हमसे कह रहे हैं कि वादविवाद से सदैव दूर रहना ही सर्वथा उचित होगा।

शिरडी में आकर, इस साईनाथ को मिलने के बाद भी यदि हम अपने इस मुख से, अपनी इस वाणी से साईनाथ का गुणसंकीर्तन नहीं करते हैं तो फ़िर मेरा साईनाथ के पास जाने का क्या मतलब? यहाँ पर शिरडी में रहकर भी बाबा के सान्निध्य में भी यदि हम अपनी वाणी का उचित उपयोग करना नहीं सीखते हैं तो हमारे साई स होनेवाली मुलाकात का क्या उपयोग? बाबा आगे साईसच्चरित में कहते हैं कि किसी को भी हड़हड़ नहीं करना चाहिए। निंदानालस्ती नहीं करनी चाहिए। बाबा हमें यही सीख देना चाहते हैं कि वाणी का सदुपयोग करके इस नरजन्म को सार्थक करना चाहिए।

‘हेमाडपंत’ नामकरण कथा यह हेमाडपंत के लिए जितनी महत्त्वपूर्ण है, उतनी ही हमारे लिए भी महत्त्वपूर्ण है। हेमाडपंत तो यहाँ पर स्पष्ट रूप में अपनी गलती कबूल कर रहे हैं। परन्तु हम बारंबार वाणी का अनुचित उपयोग करके भी उसे साईनाथ के समक्ष क्या अपनी गलती कबूल करते हैं? लेकिन हेमाडपंत अपनी गलती दिल से मान लेते हैं।

हेमाडपंत के इस गुण को सर्वप्रथम हमें सीखना चाहिए कि हमें अपनी गलती का अहसास होना चाहिए, पश्‍चाताप होना चाहिए। साथ ही उस गलती को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। मुख्य रूप में उस गलती के लिए स्वयं को बारंबार कोसते रहने के बजाय वह गलती पुन: न होने पाये इसके लिए सावधानी बरतनी चाहिए।

हेमाडपंत ने इससे संबंधित मार्गदर्शन अपनी स्वयं की कृति के द्वारा ही हमें किया है। साईबाबा ने जो नामकरण किया है, हेमाडपंत ने उस नामकरण को आभूषण की तरह अपने जीवन में धारण कर लिया और उस नाम का आदरपूर्वक हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया, क्योंकि इस हेमाडपंत नाम के कारण ही उन्हें सदैव स्मृति बनी रही उस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात की और वह बात है, अर्थात सदैव वाद-विवाद जैसे झमेले से दूर रहकर वाणी का गलत उपयोग न करते हुए, सदैव वाणी का उचित उपयोग करना चाहिए। इस से साईसच्चरित के बीज को अंकुरित होने में मदद मिली। क्योंकि वाणी का उचित उपयोग करने का निश्‍चय ‘हेमाडपंत’ नाम का स्वीकार करने के पश्‍चात् ही दाभोलकर ने किया था और वाणी का उचित उपयोग ही साईनाथ के नाम का गुणसंकीर्तन है, यह जानकर ही साईनाथ का गुणसंकीर्तन, लीलासंकीर्तन, करनेवाले साईसच्चरित लिखने का बीज उनके मन में अंकुरित हुआ।

गेहूँ पीसने वाली कथा से ही साईसच्चरित का उद्भव हुआ, इस सच्चाई में कोई शक नहीं है। परन्तु उस निर्झर को भूमि से मिलाकर बाहर निकालने की शक्ति उन्हें जो प्राप्त हुई, वह इसी साईनाथ के द्वारा दिए गए ‘हेमाडपंत’ नामकरण लीला के ही कारण, यह भी उतना ही सत्य है। इसीलिए प्रथम अध्याय गेहूँ पीसनेवाली कथा के बाद तुरन्त ही द्वितीय अध्याय में ‘हेमाडपंत’ नामकरण कथा का वर्णन उन्होंने किया है। हेमाडपंत कहते हैं-

हो सकता है यह पूर्वोक्त लक्षण। साईमुखोदितविलक्षण।
प्रसंगोचित सार्थ नामकरण। उसे मैंने भूषण मान लिया।
कि इससे ही मुझे मिलेगी सीख। वाद-विवाद यह कुलक्षण।
स्पर्श न हो इसका मुझे एक भी क्षण। परम अकल्याणकारी है वह॥
चूर चूर हो जाये विवादमति का घमंड। एदतर्थ यह नाम-अभिधान।
जिससे आमरण रहे स्मरण। नित्य निराभिमान बना रहे॥

सच्चा भक्त कैसा होना चाहिए, सच्चा श्रद्धावान कैसा होना चाहिए यह ऊपर लिखित पंक्तियों से विदित होता है। दाभोलकर कहते हैं कि हेमाडपंत इस नाम को ही मैंने भूषण मानकर धारण कर लिया है। क्योंकि इससे ही मुझे सदैव इस बात का ध्यान रहेगा कि वाद-विवाद जैसी बातों से बुरा और कुछ हो ही नहीं सकता। मुझे सदैव इन बातों से दूर रहना चाहिए। मेरा वाद-विवाद का घमंड नष्ट हो जाये इसीलिए बाबा ने मुझे अहंकाररहित बनाने के लिए यह नाम प्रदान किया है। इस बात का स्मरण मुझ में आमरण बना रहे इसीलिए हेमाडपंत नाम को मैंने हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया।

वाणी का सदुपयोग करने का स्मरण सदैव बनाये रखना यह हमारे लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जिसे इस बात का, इस मर्यादा का ध्यान नहीं रहता, वह मार्गभ्रष्ट हो जाता है, वह अपने आप ही देवयानपथ से दूर चला जायेगा। हमें यहाँ पर यही बोध लेकर उसी प्रकार निर्णय भी लेना चाहिए और साथ ही उसे अपनी कृति में भी उतारना चाहिए। साईनाथ का नाम, साई के गुण, साई की लीलाएँ इनका संकीर्तन यानी सद्गुरुगुणसंकीर्तन करते रहने में ही हमारा हित हैं।