श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५५

बाबा के मधुरवाणी को सुनकर हेमाडपंत ने निश्‍चय किया कि अब इसके आगे नरसेवा त्यागकर गुरुसेवा में ही जीवन व्यतीत करना है। बाबा की आज्ञा सिर आँखों पर (प्रमाण) यही हेमाडपंत का ब्रीदवाक्य था। बाबा ने एक बार कह दिया कि अब नौकरी की, उदरनिर्वाह की चिंता मत करो। अब तुम केवल मेरी ही चाकरी करो, मेरा बस्ता रखो। तो फिर अब और कुछ करने के बारे में विचार करने की ज़रूरत ही नहीं। बाबा ने जो कुछ भी कहा है उसका शब्दानुशब्द पालन करने का निश्‍चय हेमाडपंत ने किया।

ऐकूनि बाबांची मधुर वाणी। निर्धार केला मी निजमनीं।
एथूनि पुढें नरसेवा त्यागुनि। गुरुसेवनींचि असावें॥
सुनकर बाबा की मधुरवाणी। निश्‍चय कर लिया मैंने मन ही मन।
इसके आगे अब नरसेवा त्यागकर। गुरुसेवा ही करनी है॥

इससे हमारे मन में एक बात स्पष्ट होती है कि जहाँ पर श्रद्धावान कुछ कर दिखाने का निश्‍चय करता है, वहाँ पर चिंता, दु:ख, क्लेश आदि के लिए कोई स्थान नहीं। हेमाडपंतने बाबा की वाणी सुनते ही उसी क्षण मन में दृढ़ निश्‍चय कर लिया और उसीक्षण उनके मन की चिंता दूर हो गई और वे पूर्णत: निश्‍चिंत हो गए। ग्रंथराज श्रीमद्पुरुषार्थ द्वितीय खंड प्रेमप्रवास के नवविधा निर्धारों का पालन करनेवाले वानरसैनिकों के जीवन में इसीलिए चिंता, दु:ख, क्लेश, दारिद्रय, अतृप्ति आदि अनुचित बातों के लिए जरासा भी स्थान नहीं होता है। जहाँ पर ग्रंथराज के नवविधा निर्धार होते हैं, वहाँ पर परमात्मा की कृपा पूर्णरूपेण उस श्रद्धावान के जीवन में प्रवाहित होती है तथा इससे उसके प्रारब्ध भोग का नाश होता है।

श्रीहरि कृपा द्वारा प्रारब्ध का नाश कैसे होता है यही यहाँ पर हेमाडपंत स्वयं का उदाहरण देकर बता रहे हैं। यह प्रक्रिया कैसे होती है उसका पता हमें यहाँ पर चलता है।

१) साईनाथ कर्ता के रूप में जीवन में सक्रिय हो गए।
२) बाबा की वाणी जिससे वे गवाही देते है।
३) बाबा की मधुरवाणी सुनते ही हेमाडपंत निश्‍चय करते हैं।
४) हेमाडपंत चिंतामुक्त, भयमुक्त हो जाते हैं।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईसाईनाथ की वाणी ही हरिकृपा है। साईनाथ की वाणी सुनकर उसका शब्दानुशब्द पालन करना अर्थात हरिकृपा का पूर्णरूप से स्वीकार कर लेना। यह साईनाथ की वाणी अर्थात साईकृपा जब हमारे जीवन में प्रवाहित होती है, तब उस कृपा के ही कारण हमारा मन बुद्धी का आज्ञांकित हो जाता है, विवेक, वैराग्य-श्रद्धा-सबुरी को बल प्राप्त होता है। साथ ही साईकृपा के कारण श्रद्धावान की ओर से नवविधा निर्धार किया जाता है। इन निर्धारों के कारण ही हम भयमुक्त, चिंतामुक्त होते हैं और यह नवविधा निर्धार साक्षात साईराम के यह नौ बाण होने के कारण हममें होनेवाले नवचक्रों के आसपास होनेवाले अनुचित तत्त्वों को नष्ट कर देते हैं। अनुचित बीजों को खत्म कर देते हैं तथा उचित बीजों को विकसित करते हैं। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह हैं कि साईनाथ की वाणी ही हरिकृपा है। कहने का ताप्तर्य यह है कि यही वाणी साईकृपा के रूप में हमारे जीवन में प्रवेश करती है और वही हमसे नवविधा निर्धार करवाकर हमारे प्रारब्ध का नाश करती है, भोगों को खत्म करती है।

हम श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ का पठन करते हैं, यह साक्षात बाबा की वाणी है। अर्थात यह ग्रंथ केवल ग्रंथ ही नहीं बल्कि बाबा की वाणी है। साक्षात् साईकृपा है, जिससे प्रारब्ध का नाश होता है। (‘भक्तकणवा बाबांची वाणी।’) ‘भक्त कणवा बाबा की वाणी।’

इस तरह से इस साईसच्चरित का वर्णन स्वयं हेमाडपंत करते हैं। भक्त कणवा ऐसी बाबा की वाणी अर्थात साक्षात साईकृपा। भक्त पर होनेवाली दया के ही कारण, वात्सल्य के कारण बाबाने जो कुछ भी बगैर लाभ प्रेमपूर्वक बात किया। वही बाबा की वाणी अर्थात यह श्रीसाईसच्चरित। अब यहाँ पर इस बात का पता चलता है कि यह साईसच्चरित अर्थात साक्षात हरिकृपा। साईसच्चरित हमारे जीवन में प्रारब्ध का नाश करने के लिए पूर्ण समर्थ है क्योंकि साईकृपा अर्थात यह साईसच्चरित। जो कोई भी साईसच्चरित, श्रीमद्पुरुषार्थ, सुंदरकाण्ड, रामरसायन जैसे ग्रंथ प्रेमपूर्वक पढ़ेगा, पढ़ता रहेगा उसका अनुकरण करता रहेगा, उसके जीवन में हरिकृपा प्रवाहित होकर उसके प्रारब्ध का नाश होगा ही इसमें कोई शंका नहीं।

बाबा की वाणी अमोघ है इसीलिए बाबा की वाणी से प्रारब्ध का नाश न हुआ हो, ऐसा कभी हुआ ही नहीं है। बाबा के मुख से बाहर निकला। वचन सत्य होगा ही यह ‘पत्थर पर खींची गई लकिर है। इसीलिए बाबाने जब कहा कि ‘मिल जायेगी उसे कोई भी नौकरी’ तब उसका भी अनुभव आयेगा ही, कोई न कोई नौकरी सामने से मिल जायेगी, परन्तु वह अधिक समय तक टिकेगी नहीं और मैं भी अधिक समय तक वह नहीं करूँ गा क्योंकि अब मुझे बाबा का बस्ता रखना है।

हेमाडपंत ने यह दृढ़ निर्धार कर लिया था कि इसके आगे किसी भी मनुष्य की नौकरी न करते हुए अपने इस सद्गुरुराया की चाकरी ही मैं करनेवाला हूँ बाबाद्वारा कहा गया ‘अक्षय भंडार’ मुझे अपने साईनाथ की चाकरी से ही प्राप्त होनेवाला है। दूसरों की नौकरी करके जो कुछ भी धनराशी प्राप्त होती है, उसका क्षय होनेवाला रहता है। साईनाथ के सामीप्य समान अक्षय भंडार और कुछ हो ही नहीं सकता है।

यह ‘अक्षयभंडार’ अर्थात साईनाथ का सामीप्य हेमाडपंत कहेनुसार साईनाथ के गुणसंकीर्तन से प्राप्त हो सकता है। हमें भी यह अक्षयभंडार प्राप्त करने के लिए बाबा के गुणसंकीर्तन के मार्ग को ही अपनाना चाहिए। हेमाडपंतने जिस तरह बाबा की ही, केवल साईनाथ की चाकरी करने का निर्धार किया था, वैसे ही हमें भी करना चाहिए। हेमाडपंत कहते हैं, ‘माना यह सत्य है कि मैंने बाबा की ही चाकरी करने का निश्‍चय किया फिर भी बाबा के अनुसार ‘मिल जायेगी उन्हें कोई नौकरी’ उनका यह बोल भी सत्य होगा ही।’

हेमाडपंत यहीं पर हमें एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत बताते हैं, जिसका हमें सदैव ध्यान रखना है।

शब्द बाबांचा खालीं पडेल। हें तों सहसा कधींही न घडेल॥
‘बाबा का शब्द खाली जाए। ऐसा तो कभी नहीं होगा।’

बाबा का शब्द खाली जायेगा ऐसा कभी नहीं होगा। बाबा के मुख से निकलनेवाला हर एक शब्द खाली जायेगा ऐसा कभी नहीं होगा। बाबा के मुख से निकलने वाला हर एक शब्द १०८% सत्य ही है। यही आगे चलकर सिद्ध होता है। साईसच्चरित की अनेक कथाएँ हमें यही सिद्धांत स्पष्ट करके दिखाती है। हमें अपने जीवन में सुंदरता लानी है, जीवन का समग्र विकास करना है तो हमें बाबा के प्रत्येक शब्दों को अपनी जान से भी अधिक संभालना है। बाबा ही हमारे लिए सब कुछ कर रहे हैं और उनका हर एक शब्द भक्त कणवा वाणी की अभिव्यक्ति होने के कारण केवल वही हमारे लिए सर्वथा उचित है।

हम हमारा शब्द खाली न जाने पाये इसके लिए अहंकार में आकर जो भी करना पड़े वो करने को तैयार रहते हैं। परन्तु हमें यह जानना चाहिए कि हमारे शब्दों के बड़बड़ का सामर्थ्य ही क्या है? इसकी अपेक्षा बाबा का शब्द कभी भी खाली नहीं जाता इस बात का ध्यान रखकर बाबा के प्रत्येक वचन का शब्दानुशब्द पालन करते हुए हमें अपने जान की बाजी लगा देनी चाहिए। फिर यह देह भले ही नष्ट हो जाए कोई बात नहीं। वह इस साईनाथ के चरणों में ही रहेगा। और इसी में नरजन्म की इतिकर्तव्यता है।