श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५०

हम अपनी क्षमतानुसार, अपने सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी व्यवसाय अथवा नौकरी करते हैं, वह तो हमें करना ही है, परन्तु हमें यह याद रखना चाहिए कि हमें किसी की ‘गुलामी’ नहीं करनी चाहिए। यह बात काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। लौकिक तौर पर हम न्याय, नीति, मर्यादा आदि के अनुसार कोई भी पवित्र व्यवसाय, नौकरी आदि जरूर करेंगे, परन्तु एक बात का ध्यान रहे कि वह गुलामी नहीं होगी। हम किसी के दास नहीं बनेंगे, यदि दास्यभक्ति करनी ही है तो केवल इस साईनाथ की ही, अपने इस भगवान की ही करेंगे।

चिंचणीकर की बात के जवाब में बाबा ने कहा।

मिल जायेगी उसे नौकरी।
अब करनी है उसे मेरी चाकरी।
सांसारिक सुख प्राप्त होगा॥
खाने पिने की कोई कमी न होगी।
मन अशांत नहीं रहेगा।
सदैव मुझ पर विश्‍वास रखने से।
दूर हो जायेगी आपदाएँ उसकी॥

पिछले लेख में हमने ‘हेमाडपंत के योगक्षेम की चिंता मैं करूँगा, इसके आगे अब हेमाडपंत को मेरी ही नौकरी करनी है, अन्य सभी सांसारिक चिंता छोड़ देनी है, केवल मेरा ही बस्ता रखने का कार्य करना है’ इस प्रकार से श्रीसाईनाथ द्वारा उच्चारित किए गए आश्‍वासक उद्गार के बारे में देखा। हम चाहते हैं कि भगवान हमारे योगक्षेम का ध्यान रखे। भगवान तो हर किसी की चिंता करने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं, परन्तु इसके लिए मुझे इस भगवंत का दास बनना चाहिए। जो भगवान द्वारा दी गई जिम्मेदारी को पूरे विश्‍वास के साथ पूरा करने की तैयारी रखता है, उसके योगक्षेम की चिंता भगवान को होती ही है। भगवान अपने निजदास की कभी भी उपेक्षा नहीं करते। भगवान अपने ‘निजदास’ के योगक्षेम का वहन करने का कार्य सदैव करते ही रहते हैं। मुझे केवल अपना कार्य करना चाहिए।

हमें अकसर इस बात की चिंता होती है कि हमारी थाली सदैव भरी रहे। भगवान के द्वारा सौंपे गए कार्य को हमें भावपूर्वक, पूरी क्षमता के साथ करना चाहिए, इस बात की चिंता हम नहीं करते हैं। हमारा ध्यान केवल हमारी अपनी थाली की ओर लगा रहता है, भगवान की ओर नहीं होता। भगवान तो मेरी ओर देखते ही रहते हैं, क्या मैं अनन्य भाव से उनकी ओर देखता हूँ? इस बारे में विचार करना महत्त्वपूर्ण है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईमैं भगवान की ओर देखने की बजाय अपनी ही थाली की ओर देखता रहता हूँ। ‘यदि भगवान मेरे हैं, तो वे मुझे बैठे-बिठाये सब कुछ देंगे’ ऐसी गलत धारणा रखकर हम भगवान से सब कुछ पाने की इच्छा रखते हैं। परन्तु इस कहावत में सर्वप्रथम हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम कहते हैं उसके अनुसार क्या भगवान को मैं ‘मेरा अपना’ मानता हूँ? क्या भगवान सच में ‘मेरे’ होते हैं? नहीं। मेरी क्या होती है, तो वह ‘थाली’ मेरी होती है, मेरा होता है मेरा अपना पूरा परिवार, मेरा होता है घरबार, नौकरी-धंधा आदि बातें मेरी होती हैं। भगवान को छोड़कर, हरि को छोड़कर अन्य सब कुछ ‘मेरा’ होता है, लेकिन श्रीहरि को मैं अपना नहीं मानता हूँ। ‘हरि यदि मेरे हैं तो मुझे अपने योगक्षेम अर्थात भले-बुरे की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, मेरे भगवान मुझे सहज ही सब कुछ देते ही रहते हैं’, यह है इस कहावत का सही अर्थ।

जिनका ध्यान केवल अपनी थाली पर लगा रहता है, भगवान की ओर नहीं रहता, उसकी थाली सदैव खाली ही होती रहती है, वह कभी भी भरती नहीं है। इसके विपरित जिसका ध्यान भगवान की ओर लगा रहता है, उन्हें इस बात की चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती कि उनकी थाली कैसे भरेगी? क्योंकि ये भगवान निजदास की थाली सदैव भरी हुई ही रखते हैं। जिनकी थाली भरी रहती है, उनका पेट भी भरा ही रहता है, उन्हें कभी भी भूखा नहीं रहना पड़ता है। पेट भरा रहना अर्थात सदैव तृप्त रहना, संतुष्ट रहना, समाधानी होना। हमारे जीवन में होता यह है कि सदैव थाली भी खाली ही रहती है और पेट भी। थाली भरती है, पुरुषार्थ करने से। भगवान की ओर ध्यान बनाये रखने से तात्पर्य यह है कि भगवान ने जो काम मुझे सौंपा है, उसे पूर्ण विश्‍वास के साथ करनाचाहिए। जो लोग हाथ पर हाथ धरे, बगैर कुछ किए ही बैठे रहते हैं अथवा भगवान के द्वारा दिए गए हाथों का अर्थात् क्रियाशक्ति का उपयोग गलत कामों के लिए करते रहते हैं, उनकी ना तो थाली कभी भरती है और ना ही पेट।

हमारी थाली सदैव भरी रहे इसके लिए व्यवहारात्मक दृष्टि से अपने हाथों से काम करके, परिश्रम करके कमाना जरूरी है। धरतीमाता फसल तो देगी ही, मग़र उसके लिए हमें अनाज बोना, उसे खाद-पानी देना, कीटकनाशक औषधियाँ आदि छिड़कना, कटाई-छटाई करना, भोजन पकाना आदि काम अपने हाथों से ही करने पड़ते हैं। मेहनत करने से ही अनाज की प्राप्ति होती है। अपने हाथों से मेहनत करने पर ही अनाज एवं अन्य खाद्यपदार्थ नसीब होता है। जिन चीजों से थाली भरती है, उस थाली को भी हाथों से ही पकड़ना पड़ता है। अन्नपदार्थों को परोसना होता है वह भी हाथों से ही, और तो और, मुँह में निवाला (कौर) भी हाथों से ही ड़ालना पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी थाली सदैव भरी रहे, साथ ही पेट भी भरा ही रहे, इसके लिए हमें सदैव अपनी क्रियाशीलता का उचित रूप में उपयोग करना चाहिए। मानव के द्वारा क्रियाशक्ती का उचित उपयोग करना यानी अपनी गृहस्थी के साथ साथ भक्ति एवं सेवा भी उचित रूप में करना। जब हमारे हाथों का उपयोग हम भगवान की भक्ति-सेवा कार्य आदि करने की बजाय गलत चीजों के लिए, गलत कार्यों के लिए करते हैं, उसी वक्त हम स्वयं ही अपनी थाली खाली करते रहते हैं और पेट भी।

भक्ति-सेवा करने के लिए क्या गृहस्थी का त्याग करना पडता है? हम जो अपनी उपजिवीका चलाने के लिए जो नौकरी करते हैं, व्यवसाय करते हैं, उसे क्या नहीं करना चाहिए? इस प्रकार से विपरीत अर्थ लगाना भी ठीक नहीं। हम अपनी क्षमता के अनुसार, सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी नौकरी, व्यवसाय आदि करते हैं उसे तो करना ही है, परन्तु इन सब बातों में किसी की गुलामी नहीं करनी चाहिए, ‘जी हुजूरी’ नहीं करनी चाहिए। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। हमें लौकिक रूप में न्याय-नीति-मर्यादानुसार कोई भी पवित्र व्यवसाय, नौकरी-धंधा तो करना ही है, परन्तु उसमें गुलामी के लिए कोई स्थान नहीं होगा। हम यदि चाकरी करेंगे, दास्यता करेंगे तो केवल इस साईनाथ की ही, अपने भगवान की ही।

नौकरी एवं चाकरी इनमें होनेवाला अंतर स्वयं साईनाथ ही हमें इन पंक्तियों के माध्यम से बतला रहे हैं और हमें किस तरह से व्यवहार करना चाहिए, इस बात का मार्गदर्शन भी इसी माध्यम से वे कर रहे हैं। ‘चाकरी’ अर्थात दास्यत्व, पूर्ण समर्पितता, पूरी तरह संलग्नता। हम अपने जीविकोपार्जन के लिए जहाँ पर काम करते हैं, वहाँ के किसी व्यक्ति की, उस काम की, आमदनी की, हमारे काम की या हमारी वाह वाह की, सफलता या असफलता की, अहंकार की या अन्य किसी भी बात की गुलामी नहीं आने देंगे, अपना काम पूरी इमानदारी से करेंगे। तात्पर्य यह है कि वह काम, आमदनी, कोई व्यक्ति, कोई वृत्ति, अहंकार इनमें से कोई भी हमारे जीवन में सत्ताधीश नहीं होंगे अर्थात सर्वोच्च स्थान पर नहीं होंगे।

इसका गलत अर्थ निकालकर यदि कोई कहता है कि इससे क्या हम अपने काम के साथ गैरज़िम्मेदार नहीं रहेंगे? जिस काम से मेरी रोज़ी रोटी चलती है, परिवार का पेट पलता है, उसे क्या हमें शतप्रतिशत समय नहीं देना चाहिए?

अपने काम के प्रति, अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति उपेक्षित भाव रखना यह इसका अर्थ नहीं है। हमें अपना व्यवसाय, अपनी नौकरी तो पूरी ईमानदारी से करनी ही है। इसमें कामचोरपन करना ठीक नहीं। परन्तु यह सब करते समय हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जो भी काम मैं कर रहा हूँ वह काम और इनके साथ होनेवाला व्यवहार तो केवल लौकिक रूप में ही मुझसे संबंधित है। मेरे जीवन के सच्चे मालिक तो केवल साईनाथ ही हैं और उनका दास्यत्व ही मेरा जीवन है, मेरी सच्ची नौकरी है। इस बात का ध्यान हमें सदैव रखना चाहिए।

नौकरी और चाकरी इनके बीच का फर्क बाबा स्पष्ट रूप से समझाकर हमें बता रहे हैं कि नौकरी तो केवल इसी जन्म तक हम से संबंधित है, परन्तु ‘चाकरी’ यह तो शाश्‍वत अखंड जन्मजन्मांतर की है। इस जन्म में यह जो नौकरी है, वह दूसरे जन्म में बदल जायेगी, बॉस भी बदल जायेगा, व्यवसाय भी बदल जायेगा; परन्तु भगवान एवं उनकी चाकरी कभी नहीं बदलेगी, वे तो हमारे जन्मजन्मांतर तक के साथी हैं। साईनाथ भी हमसे यही कह रहे हैं कि तुम नौकरी, व्यवसाय कोई भी करो (अर्थात् पवित्रता ही प्रमाण है इस मर्यादा में रहने वाला ही) परन्तु वह इसी जन्म के साथी होंगे। एक बात का स्मरण रहे कि मेरी (साईनाथ की) चाकरी ही दर असल शाश्‍वत है। हमें नौकरी और चाकरी इनके बीच के ङ्गर्क को ध्यान में रखकर साई-हरि की चाकरी निरंतर करते ही रहना है।