श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-०३)

इसी में तुम्हारा कल्याण है। मेरे भी अवतार की सार्थकता है।
जो अनन्यरूप से नित्य मेरा ध्यान करता है। उसका ध्यान मैं सदैव रखता ही हूँ॥

साईबाबा ‘निज-दासों का ध्यान मैं रखता ही हूँ’ इस बात की गवाही देते हैं। निज-दासों के योगक्षेम का ध्यान रखने के लिए बाबा सदैव तत्पर हैं ही और वे ही एकमात्र समर्थ हैं, परन्तु बाबा का दास बनने के लिए मुझे अपनी भूमिका को समझना अनिवार्य है। इसके लिए हमें गीता के इस श्‍लोक का आधार लेकर तीन बातों को जीवन में उतारना ज़रूरी है। यह हमने पिछले लेख में देखा। आज हम इन बातों पर गौर करेंगे।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई

१) अनन्यशरण :- ‘मेरे अपने केवल एकमात्र ये साईनाथ ही हैं, इस साईनाथ के अलावा अन्य किसी को मैं जानता ही नहीं। मेरा जो कुछ भी होना होगा वह ये साईनाथ ही करेंगे, चाहे जो भी हो जाए मग़र फिर भी मैं बाबा के अलावा अन्य किसी के भी पास नहीं जाऊँगा। मेरे सर्वस्व केवल ये साईनाथ ही हैं और इनके लिए ही मेरा जीवन समर्पित है। इसी भाव के साथ साईनाथ के चरणों में पूर्ण शरण जाना ही अनन्यशरण रहना है। कछुए के बच्चे जिस तरह केवल अपनी माँ को ही देखते हैं उसी तरह साईनाथ को देखना यह अनन्यशरण रहना है।

२) पर्युपासना :- मैं अपनी पूर्ण क्षमता के साथ मेरी जितनी भी ताकत है वह पूरी तरह से लगाकर साईनाथ की भक्ति एवं सेवा में सदैव सक्रिय रहना ही पर्युपासना है। साईनाथ के समीप जाने के लिए सदैव पिपिलिका पंथ से प्रवास करते रहना ही पर्युपासना कहलाता है, इसके लिए साईनाथ की तरह साईनाथ के बच्चों की, श्रद्धावानों की, ज़रूरतमंद वृद्ध पीड़ितों की सेवा करना ही पर्युपासना कहलाता है। पर्युपासना के अंतर्गत आनेवाली सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात है, १०८% अपनी ओर से योगदान देना। मैं हाथ में आनेवाली कोई भी चीज़ संभालकर रखने की बजाय अपनी पूरी ताकत के साथ जब साईनाथ की भक्ति में, सेवा में स्वयं को पूर्ण रूपेण समर्पित कर देता हूँ, तभी वह पर्युपासना कहलाती है।

३) नित्याभियुक्त :- नित्य अभियुक्त होना अर्थात् सर्वथा केवल साईनाथ के साथ निरंतर जुड़ा रहना। बिलकुल उसी तरह जैसे माँ के गर्भ में बच्चा माँ की नाल द्वारा अपनी माँ के साथ निरंतर जुड़ा रहता है, वह एक पल के लिए भी वियुक्त नहीं होता है। साईनाथ के साथ इसी तरह का नित्य-अभियुक्तत्व मुझे भी प्राप्त होना चाहिए।

फिर हमारे सामने यहाँ पर प्रश्‍न खड़ा होता है कि वह ‘नाल’ कौन सी है, जो हमें सदैव इस साईनाथ के साथ जोड़कर रखती है? यह ‘नाल’ है, साईनाथ का ‘नाम’ प्यार से लेते रहना। बाबा हमसे यही कह रहे हैं।

शामा एक बात और कहता हूँ। प्रेमपूर्वक लेगा जो मेरा नाम।
उसकी मैं सारी इच्छाएँ। पूरा भी करता हूँ और प्रेम भी बढ़ाता हूँ॥

बाबा स्वयं ही कह रहे हैं, जो प्रेमपूर्वक मेरा नाम लेता रहेगा, उसकी सारी इच्छाएँ मैं पूरी करूँगा, उसके योगक्षेम का वहन भी मैं ही करूँगा। और मुख्य तौर पर उसकी ज़रूरतों को, उसकी इच्छाओं को पूरा करते समय भी उसकी आसक्ति को बढ़ने न देकर मेरा प्रेम ही बढ़ता रहेगा। यहाँ पर हमें एक बात पर गौर करना है कि ऐसा भक्त अकसर उचित कामना को, उचित एवं पवित्र इच्छाओं को ही सदैव धारण करेगा, इसीलिए बाबा कहते हैं कि ‘मैं ही उनकी सकल इच्छाओं की पूर्ति करूँगा।’ यहाँ पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि नित्याभियुक्तत्व प्राप्त करने के लिए साईनाथ का नाम लेते ही रहना यह सहज सुंदर एवं आसान मार्ग बाबा स्वयं ही हमें बतला रहे हैं। इस साईनाथ का यह नाम ही वह ‘नाल’ है, जो मुझे हमेशा मेरे भगवान के साथ जोड़कर रखनेवाली है।

यहाँ पर हमें एक महत्त्वपूर्ण बात को समझ लेना चाहिए कि जब तक बच्चा माँ के गर्भ में रहता है, तब तक उस बच्चे को अपने योगक्षेम की चिंता नहीं रहती है, उसके योगक्षेम का वहन उसकी माँ ही करते रहती है। जन्म लेने के पश्‍चात् ही उसे दूध पीना, उसे निगलना, उसे पचाना, श्‍वास लेना आदि सभी प्रकार की क्रियायें करनी पड़ती हैं। आगे चलकर वह जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है, वैसे वैसे उसे अपनी चिंता करनी पड़ती है, अपना ध्यान रखना पड़ता है। परन्तु यही बालक जब तक अपनी माँ के गर्भाशय में रहता है अर्थात उसकी नाल उसकी माँ के साथ जुड़ी रहती है, तब तक उसके योगक्षेम का वहन उसकी माँ ही करती रहती हैं।

हमें भी यह नामरूपी नाल इस साईमाऊली के साथ इसी प्रकार से जोड़कर रखती है। इस नाम के कारण ही मैं सदैव बाबा के साथ अभियुक्त रहता हूँ। और इसीलिए मेरा सभी प्रकार से ध्यान बाबा ही रखते हैं। माँ के गर्भ में रहनेवाला बालक माँ के गर्भाशय में जिस तरह से निश्‍चिन्त रहता है, उसी तरह साई का निरंतर नाम लेते रहनेवाले भक्त के साथ भी होता है। इस नाम को प्रेम से लेते रहना, यही मेरे लिए महत्त्वपूर्ण है। फिर यह नाम मैं नामस्मरण, नामसंकीर्तन, भजन इन रूपों में ही लूँगा अथवा गुणलीला संकीर्तन के रुप में लूँगा, परन्तु वह मैं प्रेमपूर्वक लेते रहूँगा। नामस्मरण करते-करते ही गुणसंकीर्तन एवं लीलासंकीर्तन भी करना चाहिए, क्योंकि गुण-लीला संकीर्तन से हमारे अंतर में प्रवाहित होनेवाला प्रेमभाव तीव्रगति के साथ बढ़ते रहता है, विश्‍वास भी बढ़ते रहता है और यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

ऐसे में, बाबा की लीला गाते समय, बाबा की कथा कहते समय हमारा उच्चारण अशुद्ध हो, हमारी वाणी शुद्ध ना भी हो, तब भी कोई बात नहीं। जैसा भी हो, परन्तु मैं प्रेमपूर्वक एवं आत्मविश्‍वास के साथ अपने साईबाबा की लीलाओं का गान करता ही रहूँगा। यदि मेरी बोली शुद्ध नहीं है, उलटी-सीधी भी है, तब भी मैं यदि अपनी भक्ति एवं सेवा केवल अपने बाबा के प्रेमवश ही करता रहता हूँ, तो निश्‍चित ही इससे मेरा साई मेरा तारणहार बनकर मेरे जीवन में सक्रिय रहेगा ही। क्योंकि मेरे और मेरे साईनाथ के बीच मेरा अशुद्ध उच्चारण अथवा उलटे-सीधे बोल कभी भी आड़े नहीं आयेंगे। लोग यदि हँसते हैं तो उन्हें हँसने दो। कोई कहेगा कि इसकी वाणी अशुद्ध है, तो कोई कहेगा कि इसे तो ठीक से कथा भी कहने नहीं आता। जिसे जो भी कहना है कहें, मैं तो अपने बाबा का गुणगान करता ही रहूँगा। मुझे पूरा विश्‍वास है कि ये मेरे साईनाथ सबकुछ जानते हैं। मेरा बाह्य उच्चार भले ही अशुद्ध क्यों न हो, मेरी भक्ति को व्यक्त करने का तरीका भी उलटा-सीधा क्यों न हो, मग़र फिर भी मेरे हृदय का प्रेमभाव एवं विश्‍वास साईनाथ को पता ही है और मेरे साईनाथ को भी उसी प्रेम की भूख हैं। मेरे हृदय का भोला भाव ही उन्हें सर्वाधिक पसंद है, इसी लिए मेरी कोई भी नादानी मेरे और मेरे साईनाथ के बीच आ ही नहीं सकती है। मुझ से जैसे बन पड़े वैसे मैं अपने साईनाथ का नाम लेता ही रहूँगा। बाबा के चरित्र को गाता ही रहूँगा, सद्गुरु-गुणसंकीर्तन करता ही रहूँगा। मराठी ओवी में ‘पोवाड़ा’ यह शब्द आता है, जो काफ़ी महत्त्व रखता है। बाबा की हर एक कथा में रहने वाले वीर रस का भरापूरा भंडार ही यह पोवाड़ा है। साईनाथ की हर एक लीला वीररस का दरिया ही है।

मेरा उच्चारण अशुद्ध है तब भी कोई हर्ज़ नहीं है, परन्तु मेरे हृदय का शुद्ध होना अधिक महत्त्व रखता है। मेरा तरीका उलटा या सीधा है, सही या गलत है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है, कोई बात नहीं परन्तु मेरा मन तो सरल है ना! यही अधिक महत्त्व रखता है। ऋजुभाव यानी भोला भाव; और यह भोला भाव ही सर्वश्रेष्ठ है। मेरी भक्तिसेवा की, कथा-संकीर्तन की पद्धति चाहे जैसी भी हो, मग़र ये साईनाथ सब कुछ जानते ही हैं, यह विश्‍वास होना आवश्यक है और इसी कारण सबसे अधिक महत्त्व रखता है, श्रद्धावान का अन्त:करणस्थ विश्‍वास। इसीलिए बाबा इस अध्याय में स्वयं गवाही देते हैं –

जो भी मेरा गुणसंकीर्तन करता है, फिर उसकी बोली अशुद्ध भी क्यों न हो, यदि उसका भाव शुद्ध है, तो मैं मेरा चरित्र गानेवाले श्रद्धावान के आगे-पीछे, चारों ओर खड़ा रहता ही हूँ।