श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४२

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन। प्रेमपूर्वक उनका श्रवण।
होगा इससे भक्त-कश्मल-दहन। सरल साधन परमार्थ का॥

‘क्यों साईबाबा, क्यों किया आपने ऐसा मेरे साथ’ इस तरह के अविश्‍वास भरे उलटे सवाल साईबाबा से पूछते समय हमारी जीभ बिलकुल भी नहीं लड़खड़ाती।

बाबा से अपनी इच्छापूर्ति की माँग करते समय हमारी जीभ बिलकुल सी भी नहीं हिचकिचाती।

बाबा से झूठ बोलते समय भी हमारी जीभ बिलकुल भी नहीं कँपकँपाती।

बाबा को झूठे कारण देते समय, बाबा के सामने बहाने बनाते समय भी हम शर्म मेहसूस नहीं करते। कितनी चलती है ना हमारी जीभ अपने स्वार्थ के लिए!

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईपरन्तु बाबा का गुणसंकीर्तन करते समय, बाबा का कौतुक करते समय क्या हमारी जीभ चलती है? हमें स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए।

हमारे कान दूसरों की निंदा सुनते समय नहीं थकते। पड़ोस के घर में क्या झगड़ा चल रहा है यह सुनने के लिए तुरंत ही हमारे कान खड़े हो जाते हैं।

अपनी प्रशंसा भी हमें काफ़ी अच्छी लगती है। परन्तु साईनाथ के बोल हमें सुनाई नहीं देते। बाबा का गुणवर्णन सुनने में हम थक जाते हैं। आखिर ऐसा करने से हमें क्या हासिल होनेवाला है?

वाणी एवं श्रवण-इंद्रिय इनका सर्वश्रेष्ठ उपयोग श्रीसाईनाथ का प्रेमपूर्वक गुणवर्णन करना और उसे सुनना यही तो है। साईनाथ का गुण ही इस प्रक्रिया के द्वारा हमारे अंदर जायेगा और वही हमारे द्वारा अभिव्यक्त होगा। जो अंदर जायेगा वह भी बाबा का ही गुण और जो बाहर आयेगा वह भी बाबा का ही गुण।

कहने का ताप्तर्य यह है कि गुणसंकीर्तन करते रहने से हमारे अंदर-बाहर, सभी दिशाओं में केवल साईनाथ के ही गुणों की सत्ता होगी। साईनाथ के, सद्गुरुतत्त्व के सारे गुण ये पवित्रता-अधिष्ठित सत्य, प्रेम एवं आनंद इन्हीं मूल तीन गुणों के ही विभिन्न स्वरूप हैं। अर्थात् साईनाथ का गुणसंकीर्तन करते रहने से हमारे जीवन में अंदर-बाहर सर्वत्र पवित्रता-अधिष्ठित सत्य, प्रेम और आनंद का ही साम्राज्य होगा।

जहाँ पर साईनाथ का गुणसंकीर्तन ही अंदर-बाहर भरा हुआ होता है, वहाँ पर साईनाथ की कृपा सर्वत्र प्रवाहित होती ही रहती है। फिर वहाँ पर बुरी प्रवृत्ति कैसे और कहाँ से प्रवेश करेगी? हमारा प्रारब्ध भी हम पर हमला कैसे कर सकता है? जहाँ पर साईनाथ निरंतर खड़े रहते हैं, वहाँ पर बुरी नजर से देखने की हिम्मत भला कौन कर सकता है?

तृतीय अध्याय के आरंभ में ही श्रीसाईनाथ स्वयं ही, स्वमुख से गुणसंकीर्तन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए कहते हैं –

जो गाता है मेरा चरित्र, मेरा पवाड़ा (यशगान)। फिर चाहे उसके उच्चारण टेढे मेढे ही क्यों न हों।
मैं खड़ा ही रहता हूँ। उसके ही आगे-पीछे चारों ओर॥

बाबा के शुद्ध यश का वर्णन करनेवाले भक्त के आगे-पीछे, चारों तरफ स्वयं बाबा सदैव खड़े रहते हैं, वे अपने भक्त का परिपालन करते हैं, ङ्गिर उस भक्त के, उस श्रद्धावान के हिस्से में दु:ख आ ही नहीं सकता है। ऐसे श्रद्धावान के प्रारब्ध का नाश अवश्य होता ही है। गुणसंकीर्तन यही सरल एवं श्रेष्ठ मार्ग है, क्योंकि इसी मार्ग पर चलते हुए हमें प्राप्त होता है, अपने प्रिय साईनाथ का सामीप्य। साईनाथ स्वयं ही गुणसंकीर्तन के माध्यम से प्राप्त होते हैं, इस बात का पता हमें यहाँ पर चलता है।

श्रीसाईसच्चरित, श्रीरामरसायन जैसे गुणसंकीर्तन करनेवाले ग्रंथ हमें यही सबसे बड़ी एवं सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात बतलाते हैंऔर इसीलिए इन्हें बारंबार पढ़ते रहना, सुनते रहना, प्रेमपूर्वक उनका परिशीलन करते रहना यही सबसे अधिक सुंदर एवं श्रेष्ठ मार्ग है।

हेमाडपंत आगे कहते हैं कि गुणसंकीर्तन का यह मार्ग सबसे अधिक आसान इसलिए है, क्योंकि यह मार्ग सभी के लिए खुला है। इसमें कोई बंधन अथवा अवरोध नहीं है। जात-पात, धर्म-भाषा, प्रांत, वर्ण, शिक्षा आदि कोई भी बंधन इसके आड़े नहीं आता है। सभी लोग इस गुणसंकीर्तन के मार्ग से आनंदपूर्वक प्रेमप्रवास कर सकते हैं। हम ठहरे सामान्य गृहस्थ, हम अनेक प्रकार के विषयों में उलझे रहते हैं, अनेक प्रकार की इच्छा-वासनाओं के बीज हमारे मन में तेज़ी से बढ़ते रहते हैं। हमें इस बात का अहसास तो होता है कि यह गलत हो रहा है, पर फिर भी हमारा मन हमारी बात सुनने को तैयार ही नहीं होता। जिन्हें पश्‍चात्ताप (पछतावा) होता है, जो सच्चे मन से, दिल से सुधरने का प्रयास करते हैं और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि श्री साईनाथ पर जिन्हें पूरा विश्‍वास है, उनका उद्धार भी इस गुणसंकीर्तन से ही होता है।

योगयाग, ध्यानधारणा, कर्मकांड, ज्ञान आदि के लिए न जाने कितने प्रयास करने पड़ते हैं। फिर भी उस मार्ग में पतन-भय तो होता ही है। गुणसंकीर्तन का मार्ग सुगम एवं सरल मार्ग है और इसमें पतन का भी भय नहीं है। इन कथाओं को प्रेमपूर्वक श्रवण करने के लिए केवल एक ही बात का ध्यान रखना जरूरी है कि इन्हें प्यार से, दिल लगाकर श्रवण करना चाहिए। बस् इतना ही श्रम है, इससे अधिक कुछ भी नहीं।

साईकथा केवल प्रेमपूर्वक श्रवण करने का यह मार्ग हमारे लिए परम श्रेयस्कर है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि ये कथाएँ हमारे पंचमहापातकों का नाश करती हैं, उनका समूल उच्छेद कर देती हैं। इस भव का पाश सदैव हमें जखड़े रहता है, इससे हम अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, कभी भी हम स्वतंत्र रूप से साँस भी नहीं ले पाते हैं। इन कथाओं के श्रवण से भवपाश भी छूट जाते हैं, साथ ही सारे बंधनों से धीरे-धीरे मुक्तता प्राप्त होती है। और फिर जैसा मैं मूलत: था, बिलकुल वैसे ही अब श्रीसाईनाथ के चरणों का निवासी बन जाता हूँ।

आखिर हम सब चाहते क्या हैं?
जीवन में शांति, तृप्ति, सन्तोष।

और यह सब कुछ श्रीसाईनाथ की कथाओं से हमें प्राप्त होता ही है। इतना ही नहीं, बल्कि ये कथाएँ ही हमें यह सब कुछ प्रदान करती हैं। अर्थात् ये कथाएँ केवल परमार्थ को ही नहीं अपितु हमारी गृहस्थी को भी आनंददायक बनाती हैं।

सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इन कथाओं को श्रवण करते समय सहज ही साई के सगुणरूप का ध्यान होता है और बारंबार इन कथाओं का श्रवण, कीर्तन, मनन, चिंतन, निदिध्यास आदि के द्वारा बाबा का सगुण रूप अर्थात् साक्षात् श्रीसाईनाथ ही हमारे चित्त में समा जाते हैं। हमारे हृदयसिंहासन पर श्रीसाईनाथ राजा बनकर विराजमान हो जाते हैं। इससे होता यह है कि हमारे जीवन में रामराज्य आ जाता है।

अपने जीवन में रामराज्य की स्थापना करने के लिए इन कथाओं से आसान अन्य कोई भी मार्ग हम सामान्य साईभक्तों के लिए क्या कहीं पर भी हो सकता है? नहीं! हमारी गृहस्थी और परमार्थ को एक साथ सुन्दर बनाने के लिए यह सद्गुरु-गुणसंकीर्तन का मार्ग ही हमारे लिए दिव्य मार्ग है।