श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२०)

मैं तो केवल चरणों का दास।
ना करना मुझे उदास।
जब तक इस देह में साँसें चल रही हैं।
निजकार्य पूरा करवा लिजिए॥

हेमाडपंत की यह बहुत ही सुंदर ओवी है, जिस में उन्होंने हमें यह समझाया है कि नरजन्म की इतिकर्तव्यता क्या है। ‘जब तक इस देह में श्‍वास है यानी मैं जीवित हूँ, तब तक बाबा, आप अपना जो कुछ भी कार्य मुझ से करवाने की इच्छा रखते हो, वह करवा लो। मुझे उदास मत करना, मुझे केवल आपके चरणों का दास बनकर ही जीवन जीना है।’ यह प्रार्थना हेमाडपंत बाबा से करते हैं।

हम भी अपने जीवन में अनेक कार्य आदि करने की इच्छा रखते हैं। हमारे जीवन में भी कुछ उद्देश्य हमारे द्वारा निर्धारित किया गया होता है, कुछ आशा-आकांक्षाएँ होती हैं, हमारे जीवन का कुछ ध्येय होता है। सत्य-प्रेम-आनंद-पावित्र्य इन सभी का अनुसरण करनेवाला हर एक ध्येय, हर एक कार्य निश्‍चित ही अच्छा होता है। परन्तु ‘मैं अपने जीवन में क्या करने की इच्छा रखता हूँ’ इसकी अपेक्षा ‘साईनाथ मुझ से क्या करवाने की इच्छा रखते हैं’ इस बात को अहमियत देने वाला ही हकीकत में अपने जीवन की इतिकर्तव्यता साध्य करता है।

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हम यदि अपने जीवन में अध्यन करते हैं तो हमें पता चल जाता है कि जीवन के हर एक मोड़ पर मुझे क्या करना है इसके प्रति मेरे अपने विचार भी विभिन्न प्रकार के थे। इसी के साथ यह भी महसूस होता है कि हम ने निश्‍चय क्या किया था और हकीकत में हुआ क्या। मैं करने क्या निकला था और क्या हो गया! जीवन में काफी कुछ ऐसा हो चुका होता है जिसके प्रति मैंने कभी सोचा भी न था। और कई कार्य तो ऐसे ही हो चुके होते हैं। और कितने कार्य तो लाख कोशिश करने के बावजूद भी मैं पूरा न कर सका। मेरे ऐसे कितने ही निर्णय थे जो काफ़ी सोच-समझकर करने पर भी गलत ही साबित हुए और कभी ऐसे भी हुआ कि अधिक गहराई तक न सोच-समझकर लिया गया निर्णय सही निकला। ऐसा क्यों हुआ, इसका उत्तर ढूँढ़ पाना किसी भी मनुष्य के बुद्धि के क्षमता से परे की बात होती है। और ऐसे समय में इन बातों के चक्कर में पड़कर समय बर्बाद करना भी कोई बुद्धिमानी नहीं है। जब कोई निर्णय गलत साबित होता है, उस समय मुझ में क्या त्रुटी है जिससे मेरा यह निर्णय गलत साबित हुआ, इस बात का विचार करते हुए स्वयं में आवश्यक सुधार करना जरूरी है। यह हर एक मनुष्य का कार्य है। अन्यथा कर्मस्वातंत्र्य का नियम मनुष्य कभी भी नहीं जान पायेगा। ‘एक करने जाओ होता कुछ और ही है’ इस बात का अनुभव तो मनुष्य को बारंबार आते ही रहता है। और इसका कारण भी मनुष्य का कर्मस्वातंत्र्य ही है।

विज्ञान का कर्मसिद्धांत यह भारतीय कर्मफल-सिद्धांत का ही प्रत्यक्ष लौकिक स्वरूप है। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इस बारे में सुस्पष्ट मार्गदर्शन किया है। कर्म का अटल सिद्धांत किसी के भी टाले नहीं टल सका है। इसलिए हर एक कार्य के प्रति कुछ न कुछ नुक्स निकालते हुए यह ऐसा क्यों हुआ, वह वैसा क्यों हुआ इन सब झमेलों में पड़कर, जो हो चुका है उससे हमें क्या सीख लेनी है यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात है। भूतकाल को तो हम बदल नहीं सकते फिर इस बात की उधेड़बुन करने का कोई मतलब ही नहीं है। दर असल पुन: ऐसी गलती न हो इस बात के लिए हमें अधिक सावधान होना चाहिए। साथ ही अपने स्वयं के आचार-विचार का बारीकी से परीक्षण करके स्वयं को सुधारना चाहिए। साथ ही जो हरिकृपा मेरे प्रारब्ध का नाश करनेवाली है, उसे प्राप्त करने के लिए श्री साईनाथ की भक्ति और भी भली-भाँति करनी चाहिए।

सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात तो यह है कि बाबा को मुझसे क्या करवाना है, यह मुझे अच्छी तरह से समझकर, उसी के अनुसार उस कार्य को हाथ में लेना चाहिए। हमारा ‘संकल्प’ क्या है, इसकी अपेक्षा बाबा का मेरे लिए क्या ‘संकल्प’ है, यह जानना अधिक महत्वपूर्ण हैं। हेमाडपंत यहाँ पर हमें यही बता रहे हैं कि बाबा को मुझ से जो कार्य करवाना है, उसे और भी अधिक अच्छे से मैं कैसे कर सकूँगा इसके प्रति सावधान रहना चाहिए। इसीलिए हेमाडपंत बाबा से प्रार्थना करते हैं कि –

‘जब तक इस देह में साँसें चल रही हैं। निजकार्य पूरा करवा लिजिए॥

बाबा, मेरा संकल्प क्या है वह मुझे बिलकुल भी नहीं सोचना है। आप जो मुझसे करवाना चाहते हैं, वही कार्य करना यही मेरा ‘संकल्प’ है। ‘निजकार्य पूरा करवा लीजिए’ यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। बाबा आप को जो करवाना है, वह करवा लिजिए। बाबा के हाथों में निर्णय सौंप देने से मैं निश्‍चिंत रह सकता हूँ क्योंकि बाबा का संकल्प ही सत्यसंकल्प है और वही सदैव सफल संपूर्ण होता है।

बाबा का मंदिर बनाऊँ, बाबा का कीर्तन करूँ, बाबा की अन्य कुछ सेवा करूँ अथवा और कुछ करूँ? इनमें से हर एक कार्य अच्छा ही है, परन्तु क्या बाबा मुझसे वह कार्य करवाना चाहते हैं, यह बात अधिक महत्वपूर्ण है। बाबा की इच्छा यह है कि वे मुझ से श्रीसाईसच्चरित की विरचना करवाना चाहते हैं, तो ङ्गिर मुझे भी वही करना चाहिए। जिस उद्देश्य से बाबा ने मुझे चरित्र लेखन की आज्ञा दी है। उसके अनुसार मेरी भूमिका वही है। दूसरों की भूमिका कितनी भी अच्छी क्यों न हो परन्तु मैं उसे करूँगा यह कहना गलत है क्योंकि बाबा ने यदि मेरे लिए वही भूमिका उचित होती तो वही दी होती।

किसी भी नाटक में विभिन्न प्रकार की भूमिकाएँ होती हैं। दिग्दर्शक ही इस बात का निश्‍चय करता है कि इस भूमिका को इस विशेष व्यक्ति को ही निभानी है। क्योंकि यही व्यक्ति इस भूमिका के लिए योग्य है। यह बात वह भली-भाँति जानता है। इसीलिए वह दिग्दर्शक है। फिर यदि कोई वृद्ध अभिनेता यदि कहता है कि मुझे नाटक का वह युवा किरदार का़ङ्गी पसंद आया इसीलिए मुझे वही भूमिका करनी है तो क्या वह योग्य होगा? इससे होगा यह कि वह लोगों के सामने मज़ाक का कारण बन जायेगा।

ये साईनाथ सबसे बड़े दिग्दर्शक हैं और इस दुनिया के रंगमंच पर कौन कौन सी भूमिका भली-भाँति अदा कर सकता है ये तो वही जानते हैं। बात यहीं पर खत्म नहीं होती, बल्कि वे ही उन विशेष व्यक्तियों से उस भूमिका को अच्छी तरह से करवाने में समर्थ हैं और वह कौशल्य भी उनके पास है। यहीं पर यह बात हमारी समझ में आ जाती है कि मुझे ही यह भूमिका क्यों दी गई है, यह प्रश्‍न बाबा से पूछना ही गलत है। ऐसा प्रश्‍न बाबा से पूछना यह सर्वथा गलत होगा। वही भूमिका मेरे लिए उचित है इसीलिए बाबा ने मुझे दी है।

जो वृद्ध अभिनेता यदि दिग्दर्शक की बात को अनसुना कर अपना स्वयं का कथानक लिखकर अपने ही नाटक में उस युवा अभिनेता की भूमिका यदि स्वयं करता है, तो इससे होगा क्या उसका वह नाटक चलेगा भी नहीं और साथ ही उसकी जगहँसाई भी होगी, क्योंकि ना तो उस अभिनय को अदा करने की क्षमता उसमें नहीं है और ना ही वह भूमिका इस उम्र में उस पर जँच रही है। बाबा की आज्ञा का उल्लंघन करके जब हम स्वयं ही अपनी अक्ल लड़ाने लगते हैं, अपनी मर्जी चलाने लगते हैं, तब हम पर भी ऐसी स्थिति आ जाती है। हम अपना कार्य पूरा करना चाहते हैं, परन्तु उस समय वह उचित नहीं होता है और यही कारण है कि हम जीवन में अयशस्वी होकर उदास हो जाते हैं।

हेमाडपंत यहाँ पर स्पष्टरूप में बता रहे हैं कि बाबा मैं केवल आपके ही चरणों का दास हूँ, जो भी आप मुझे देंगे उस भूमिका को निभाना ही मेरी ज़रूरत है एवं वही मेरे लिए हितकारी है। यहाँ पर वादविवाद करना गलत है। जैसे उस वृद्ध अभिनेता का दिग्दर्शक के साथ वाद-विवाद करना यह गलत था, उसी तरह हम भी यदि ‘मुझे यही भूमिका क्यों दी’ इस तरह से बाबा के साथ वाद-विवाद करते हैं तो वह गलत है। हेमाडपंत हम से कह रहे हैं कि बाबा के चरणों के दास बन जाओ, बाबा जो कह रहे हैं उसे चुपचाप मान लो और यदि ऐसा आचरण कोई भी करता है तो वह कभी भी ‘उदास’ नहीं होता, उसके जीवन में कभी भी पश्‍चाताप करने की नौबत नहीं आती। अब हमें ही यह तय करना है कि साईनाथ का दास बनकर जीवन की इतिकर्तव्यता को साध्य करना है या साई की आज्ञा का उल्लंघन करके उदास हो जाना है। हमें ही निश्‍चय करना है कि साई की आज्ञा का पालन करके भवसागर को पार करना है या डूबनेवाला प्रारब्ध लेकर अपनी ही अधोगति करवानी है। इस बात का निर्णय हम सभी को स्वयं ही करना है।