श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-११)

मेरा नाम मेरी ही भक्ति। मेरा बस्ता मेरी ही पोथी।
मेरा ध्यान अक्षय चित्त में। विषयस्फूर्ति कैसे वहाँ॥

हमने अध्ययन किया कि साईराम संपूर्णत: हमारे मन में, हमारे जीवन में ‘कर्ता’ बनकर रहें इसके लिए हमें क्या करना चाहिए। बारंबार इस साईराम को हमारे बाह्य मन से अन्तर्मन की ओर प्रवाहित करते रहना यही हमारा काम है और इसके लिए बाह्य मन को बारंबार साईराम के चरणों से जोड़े रखना ज़रूरी है। जिसका मन साईचरणों में जडा हुआ नहीं है, उसका मन विषय वासनाओं में फँस जाता है। साईचरणों में मन संलग्न होने से ही मन का चित्त में रूपांतर हो जाता है और इसीलिए ऊपरलिखित पंक्ति के अनुसार हमें पाँच कार्य करने चाहिए।

इन पंक्तियों में ही नहीं बल्कि इनके पहले वाली पंक्तियों से ही यानी साई की गवाहीवाली पंक्तियों से ही साईनाथ स्वयं के पास ही कर्तापन लेकर बोल रहे हैं! बाबा का यह ‘मैं’ यदि मेरे जीवन में प्रवाहित हो जाता है, तब मेरा अहंकार अपने आप ही समाप्त हो जाता है। मेरे जीवन में जब तक मेरा ‘मैं’ सक्रिय रहेगा, तब तक विषयवासना, भण्डासुर, क्रोधासुर इनके जैसी दुष्ट शक्तियाँ मन में तूफान मचायेंगी ही, दुष्ट प्रारब्धरूपी रावण के बंदीवास में मेरी शांति-तृप्तिरूपिणी सीतामाई होगी ही। इसीलिए साईनाथ का ‘मैं’ मेरे जीवन में सक्रिय होना यही मेरी ज़रूरत है। मेरे ‘मैं’ की स्फूर्ति जब तक मेरे मन में है, तब तक विषय स्फूर्ति होती ही रहेगी, परन्तु जब इस साईनाथ का ‘मैं’ मन में स्फुरित होगा, तब वह पूरे मन में व्याप्त होकर मन का चित्त में रूपांतर करेगा। तब मन में अन्य बातों की स्फूर्ति न होकर केवल साईनाथ की ही स्फूर्ति होती रहेगी यही तो मेरे उद्धार के लिए लगनेवाली ज़रूरत है। यही मेरे विकास का रहस्य है। इसके लिए बाबा का ‘मैं’ पाँच स्तरों पर प्रकट होना ज़रूरी है।

१) मेरा नाम
२) मेरी भक्ति
३) मेरा बस्ता
४) मेरी पोथी
५) मेरा ध्यान अक्षय चित्त में

अब हम इन पाँच बातों को अपने जीवन में कैसे ला सकते हैं, यही हम देखेंगे। इस अध्ययन के द्वारा हम जान जायेंगे कि यह मार्ग सचमुच आसान है, हम सभी इस मार्ग से प्रवास कर सकते हैं।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई १) मेरा नाम (साईनाथ का नाम, भगवान का नाम)
यह सबसे प्राथमिक तत्त्व है, क्योंकि मन का ‘नम:’ करनेवाला नाम ही है। ग्रंथराज श्रीमद्पुरुषार्थ में कहे अनुसार मन का ‘नम:’ (शारण्य) में रूपांतर करनेवाला संप्रेरक (Catalyst) है नाम। मुझे मेरी साईमाता के साथ जोड़नेवाली नाल ही नाम है। हम इस भगवान का नाम बारंबार लेते रहें, मन में यदि विषयवासनायें अपना सिर उठाती हैं, बुरे विचार उठने लगते हैं, तब तुरन्त ही भगवान का नाम लेना है। हाथों से गलती हो रही होती है, ऐसे में भी जिस क्षण हमें अपनी गलती का अहसास होता है, उसी क्षण से हमें भगवान का नाम स्मरण करना आरंभ कर देना चाहिए, नाम लेते रहना चाहिए।

इस नामस्मरण के दौरान प्रेम एवं विश्‍वास में अधिकाधिक वृद्धि करते रहना चाहिए। सुबह उठने के साथ ही, हर एक कार्य के आरंभ में, काम करते समय एवं कार्य पूरा हो जाने पर, हर रोज़ पढ़ाई शुरु करते समय, भोजन पकाना आरंभ करते समय एवं भोजन पकाते समय, खाना खाते समय, रात में सोते समय भगवान का नाम लेते रहना है। हमारे प्रतिदिन के सफर के दरमियान अथवा जब भी खाली समय मिलेगा तब हमें नामस्मरण करते रहना है। यह करना तो कोई कठिन बात नहीं है।

यह सब करते समय ही महत्त्वपूर्ण बात है – रामनाम बही लिखना। वैसे तो नाम लेते समय हमारा मन दसों -दिशाओं की उडान भरते रहता है, परन्तु जब हम लिखने बैठते हैं, उस समय मन अधिक स्थिर होता है। साथ ही हमारा यह नाम साक्षात श्रीहनुमानजी के साथ लेते रहने से और हनुमानजी जहाँ पर सक्रिय हैं, ऐसी रामनाम बही में लिखते रहने के कारण वह हमारे लिए अधिक महत्त्व रखता है। इसी तरह दैनिक ‘प्रत्यक्ष’ के अन्तर्गत आनेवाला रोज़ का जप लिखना एवं प्रार्थना कहना यह भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ऊपर दिए गए सभी कार्य हम नित्यनियमित रूप में सहज ही कर सकते हैं। जब कोई यह करता रहता है तब वह नाम ही उस ‘नामी’ को हमारे जीवन का कर्ता बना देता है और हमारा जीवन भगवान के चरणों में पूर्णरूपेण जुड़ जाता है।

२) मेरी भक्ति : (साईनाथ की भक्ति, भगवान की भक्ति)
उपासना और सेवा का मेलजोल ही भक्ति है। ताली एक हाथ से नहीं बजाई जा सकती है। उसी तरह इन दोनों कार्यों के बगैर भक्ति पूरी नहीं होती। एक तरफ से ही मुद्रित (प्रिंटेड) नोट चलन के रूप में उपयोग में नहीं लायी जा सकती है।

उसका दोनों ओर से छपा होना ज़रूरी होता है। उसी तरह उपासना और सेवा ये भक्ति के चलन के दो पहलू हैं। राम के साथ सीता एवं लक्ष्मण दोनों ही खड़े रहते हैं, साईनाथ भी श्रद्धा एवं सबुरी के बीच में विराजमान हैं। उसी तरह भगवान उपासना एवं सेवा इन दोनों से ही प्राप्त होते हैं। एक पंखवाला पक्षी जिस तरह उड़ नहीं सकता है, उड़ने के लिए उसके पास दोनों पंखों का होना ज़रूरी होते है। वैसे ही विकास के आकाश में उडान भरने के लिए उपासना एवं सेवा ये श्रद्धावानों के पंख ही हैं।

कोई यदि कहता है कि मैं केवल साईनाथ की उपासना ही करूँगा और बाबा के बच्चों की सेवा नहीं करूँगा तो इसका अर्थ यह होगा कि वह केवल एक पैर पर ही चलने का प्रयास कर रहा है। और यह रास्ता काफ़ी दूर तक का होने के कारण एक पैर पर ही चलनेवाले के लिए कठीन है और इसी लिए इस तरह चलना संभव नहीं होगा। एक पैर पर हम ज़्यादा देर तक सीधे खड़े भी नहीं रह सकते हैं, फिर चलने की बात ही दूर की है। उपासना एवं सेवा ये श्रद्धावानों के दो पैर हैं, जो उसे भगवान के चरणों की ओर ले जानेवाले देवयान पथ पर चलानेवाले हैं। दो पैरों से चलनेवाले के लिए यह राह काफ़ी आसान है, सहज एवं सुंदर है, इस राह पर चलने वाले को कभी भी थकान का अहसास भी नहीं होता।

केवल उपासना अथवा केवल सेवा से अहंकार उत्पन्न हो सकता है, परन्तु जब इन दोनों का हम मेलजोल रखते हैं उस समय उपासना का अहंकार सेवा के कारण उत्पन्न नहीं होने पाता है और सेवा का अहंकार उपासना के कारण उत्पन्न नहीं होने पाता है। ये सेवा एवं उपासना जब हम सामूहिक रूप में करते हैं, उस समय ये हमारे लिए दो पंखों का विमान बन जाते हैं। व्यक्तिगत उपासना एवं सेवा इससे तो हम चलकर जा सकते हैं, परन्तु सामूहिक सेवा एवं उपासना के कारण हम विमानमार्ग से प्रवास करते हैं।

एक अकेला व्यक्ति यदि एक-एक पाषाण डालकर सेतु बनाने का प्रयास करता है, तब उसे कितना समय लगेगा, इस भावसागर में सेतु बनाकर उस पार जाने के लिए? परन्तु यही कार्य यदि श्रीराम की आज्ञा लेकर श्रीहनुमानजी के मार्गदर्शन में सभी वानरसैनिक सामूहिक रूप से करते हैं, तब वह कितने अचूक रूप में एवं तेज़ी से बनाकर पूरा हो जाता है और इस सेतु पर से लंका तक के सागर को क्या, इस भवसागर को भी पार किया जा सकता है। पूरी की पूरी वानरसेना ही नहीं, बल्कि सेतु बनाने में अपना योगदान देनेवाली गिलहरी भी भवसागर के पार चली जाती है और साथ ही वह सदैव श्रीराम के साथ ही रहती है। सामूहिक उपासना एवं सेवा में मेरा योगदान भले ही उस गिलहरी के समान ही क्यों न हो, परन्तु वह होना ही चाहिए और ‘मेरा भी इसमें सहभाग है’ इस प्रकार का अहंकार उस गिलहरी के पास नहीं था, बिलकुल वैसे ही मेरे पास भी यह अहंकार नहीं होना चाहिए कि ‘मैं सामूहिक सेवा एवं उपासना में सहभागी हूँ’।