श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १८)

15_Sai-Dalatana_23-12 copyआज संपूर्ण विश्व ही जैसे आय. सी. यू. में है और ऐसी भीषण स्थिति से विश्व को बचानेवाला धन्वन्तरि एकमात्र मेरा यह साईनाथ ही है | शिरडी में आई महामारी के संकट से बाबा ने जिस तरह शिरडी को बचाया, उसी तरह इस तृतीय विश्‍वयुद्ध की महामारी से भी ये मेरे साईनाथ ही संपूर्ण विश्व को बचानेवाले हैं | ‘यदि यह शरीर छोड़कर मैं चला भी जाऊँ | फिर भी मैं दौड़ा चला आऊँगा भक्तों की पुकार पर ॥ अपने इस वचन का पालन वे करते ही हैं |

आज के समय में भी साईसच्चरित का प्रथम अध्याय हमारे लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है | आज तृतीय विश्‍वयुद्ध के बादल दुनिया पर मँडरा रहे हैं | संपूर्ण विश्व में सर्वथा अशांति का साम्राज्य फैला हुआ है और विश्व के हर एक राष्ट्र का निवासी भय की छाया में जी रहा है | मनुष्य ‘मानवधर्म’ को भूलकर विद्वेष के दलदल में धँसा हुआ है | यहॉं पर एक महत्त्वपूर्ण बात पर ध्यान देनी चाहिए कि बाह्य परिस्थिति का मूल कारण आंतरिक परिस्थितियों में ही होता है और इसी लिए किसी भी बाह्य परिस्थिति पर उपाय ढू्ँढने के लिए आंतरिक परिस्थिति पर पहले विचार करना बहुत ज़रूरी होता है | आज की विपरित परिस्थिति का मूल कारण है- ‘मर्यादा-उल्लंघन’| जब मनुष्य मर्यादा पुरुषार्थ को छोड़कर स्वैर व्यवहार (मनमानी) करने लगता है, तब ही बाह्य एवं आंतरिक विश्व का संतुलन बिगड़ जाता है और वहीं से सभी प्रकार की आपत्तियों का सिलसिला शुरू हो जाता है | आज दुनिया में नैसर्गिक एवं मानवनिर्मित आपत्तियों का बहुत अधिक उत्पात मचा हुआ है, जो हम देख ही रहे हैं | इन सभी आपत्तियों का मूल कारण है, मानवों के द्वारा किया गया मर्यादा उल्लंघन | पर्यावरण का र्‍हास होने के कारण नैसर्गिक आपत्तियों का उद्भव हो रहा है, वहीं सत्य, प्रेम, एवं आनंद इन ईश्‍वरी मूल्यों के र्‍हास से मानवनिर्मित आपत्तियॉं मँडरा रही हैं |

शिरडी पर मानवनिर्मित एवं नैसर्गिक दोनों प्रकार की आपत्तियॉं आयी थीं, यह बात हम साईसच्चरित में पढ़ते ही हैं | प्रथम अध्याय में वर्णित महामारी यह मानवनिर्मित आपत्ति ही है | कॉलरा, प्लेग आदि जैसे रोग मानवों के प्रज्ञापराध के कारण ही होते हैं | हम ही गंदगी का निर्माण करते हैं, गंदगी फैलाते हैं, जल, भूमि एवं वायुमण्डल को प्रदूषित करते हैं | हम अपने स्वाथ्य का ध्यान नहीं रखते, जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियों को पूरक परिस्थिति का निर्माण करते हैं और एक दिन महामारी के रूप में ये आपत्तियॉं मुँह खोलकर सामने आ जाती हैं | शिरडी के सामने भी उस समय महामारी की समस्या आगे आकर खडी हो गई थी |  बाबा ने गॉंव की सीमा पर आटे की लक्ष्मण रेखा खींचकर इस महामारी का विनाश किया यानी मर्यादा पुरुषार्थ की संस्थापना की | शिरडी की सीमा पर फैलायें गये आटे की रेखा ही लक्ष्मण रेखा अर्थात् मर्यादा है |

मानव, मर्यादा एवं महामारी इन तीनों शब्दों का आरंभ ‘म’ से ही होता है | मनुष्य को इस मर्यादा के इस ‘म’ का ध्यान सदैव रखना चाहिए, नहीं तो महामारी का ‘म’ उसके जीवन में प्रवेश करके तूफान मचा देगा और इस बात का मनुष्य को पता भी नहीं चल पायेगा | ये साईनाथ, ये साईराम स्वयं ही मर्यादा पुरुषोत्तम हैं | इस प्रथम अध्याय में ही हेमाडपंत ने साईबाबा मानवदेह की मर्यादा का पालन कदम कदम पर बारीकी से करते हुए मर्यादा पुरुषार्थ को सिद्ध कैसे करते हैं, यही दर्शाया है | गेहूँ पीसने की इस कथा में मर्यादा पुरुषार्थ बाबा ने कैसे सिद्ध किया, यह हम देखेंगे |

सर्वप्रथम मानवदेह की मर्यादा का पालन करके एक मनुष्य जिस तरह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ जो कार्य कर सकता है, उसी तरह बाबा ने भी गेहूँ पीसने की लीला शुरू की | ‘सब तरफ महामारी का प्रकोप हुआ है, उस में क्या कर सकता हूँ’ यह कहकर चूप नहीं बैठना चाहिए | मुझे अपनी क्षमता के अनुसार जो भी उचित कार्य मैं कर सकता हूँ, उसे मुझे करना ही चाहिए | ‘सत्यसंकल्प के दाता नारायण होते हैं’ इस वचन को सदैव स्मरण रखकर हमें सत्य का दामन थामे प्रयास करते रहना चाहिए और ‘यशदाता वे मंगलधाम नारायण हैं’ यह अनुभव ऐसे श्रद्धावान को मिलता ही है | श्रद्धावान को कैसा आचरण करना चाहिए, यह बात साईबाबा स्वयं के आचरण के द्वारा हमें बताते हैं, मर्यादा पुरुषार्थ सिद्ध करते हैं |

शिरडी में तेली-बनिये ने जब बाबा को तेल नहीं दिया, तब क्या बाबा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे? नहीं | बिलकुल नहीं | ‘मेरे मालिक दत्तगुरु, जो इस विश्व के मूल प्रकाश हैं, वे कभी भी मेरे जीवन में अंधकार का एक क्षण भी नहीं आने देंगे, अंधकार पर सदैव प्रकाश की विजय होती ही है और मेरी यह द्वारकामाई मेरे लिए गायत्री माता ही है | वे अपना काम अचूकता से करती ही रहते हैं, मुझे अपना काम करना चाहिए |’ इसी निष्ठा के साथ बाबा द्वारकामाई में आये | टमरेल में बचा थोडा सा तेल आत्माराम को अर्पण कर दिया यानी स्वयं पी गए | फिर हाथ पर हाथ धरे बैठे न रहते हुए ‘मेरे पास मालिक दत्तगुरु की कृपा से पानी तो है, तो मेरे दत्तगुरु की प्रार्थना कर मैं यह पानी ही इन दीयों में डाल दूँगा, फिर मेरे दत्तगुरु इन सारे दीयों को प्रकाशित करने में पूर्ण समर्थ हैं ही |’ दत्तगुरु के प्रति होनेवाली इस पूर्ण श्रद्धा के साथ बाबा ने दीपों में पानी डाल दिया | उनमें बाती भीगों दी, फिर एक के बाद एक करके सारे दीपों को जला दिया, ज्योति से ज्योति को जगा दिया |

हमें लगता है कि यह चत्मकार है | सच में देखा जाये तो बाबा यहॉं पर मर्यादा पुरुषार्थ सिद्ध करके दिखा रहे हैं | जो मेरे पास है, जितनी मेरी क्षमता है, उसे ठीक से पहचानकर और अपने परमेश्वर से प्रार्थना कर अपनी क्षमता के अनुसार, परमेश्वरी नियम के अनुसार प्रयास करना और उसी के अनुसार लक्ष्य सिद्ध करना ही मर्यादा पुरुषार्थ कहलाता है | अपनी खुद की मर्यादा पहचानकर अपनी ताकत धीरे-धीरे बढाते हुए, अपनी क्षमता का विस्तार करते हुए अपना विकास करना ही मर्यादा पुरुषार्थ है | मेरे पास क्या नहीं है इसका जोड़-घटाना करने की अपेक्षा जो मेरे पास है उसका उपयोग करके परमेश्वरी कार्य के आरंभ में, काम करते समय और काम पूरा हो जाने पर प्रभु की प्रार्थना करते हुए पुरुषार्थ करना यही मर्यादा का गर्भगृह है | यदि मेरा संकल्प सत्य के अनुरूप है, परमेश्वरी नियमों के अनुसार है, तब वह मेरा न होकर राम का संकल्प बन जाता है और वह सत्य ही साबित होता है, बिलकुल १०८% प्रतिशत पूरा होता ही है | बाबा की जिस तरह दत्तगुरु पर, उनके सामर्थ्य पर, उनकी कृपा पर पूरी श्रद्धा है, उसी तरह मेरी भी मेरे साईनाथ पर श्रद्धा होनी ही चाहिए | चाहे कितना भी बडा संकट क्यों न आये, मग़र फिर भी उपलब्ध साधनों के सहारे मैं सहज ही उस संकट को मात देकर उस पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ |

महामारी की कथा में भी बाबा ने इसी तरह मर्यादा पुरुषार्थ कर दिखाया है |  मेरे पास उपलब्ध गेहूँ को मैं जाते में रगड़ रहा हूँ यानी इस महामारीरूपी बैरी को जाते में रगड़ रहा हूँ, ऐसा सत्यसंकल्प करके साईनाथ गेहूँ पीसने की लीला शुरू कर देते हैं | गेहूँ की पीसाई न होकर महामारीरूपी बैरी को ही वे पीस रहे हैं और द्वारकामाई की यानी गायत्रीमाता की गोद में बैठकर इस सत्यसंकल्प के द्वारा किये गये प्रयास को उचित फल देने के लिए मेरे दत्तगुरु समर्थ हैं ही, इस दत्तगुरु के प्रति होनेवाली आस्था के साथ ही बाबा गेहूँ पीस रहे हैं |

हेमाडपंत सुस्पष्ट शब्दों में साई का यह सत्यसंकल्प हमें बता रहे हैं – गोधूम नहीं बल्कि उस बैरी महामारी को ही साईनाथ ने जॉंते में रगड़ दिया और फिर उस आटे को सीमा पर डलवाया |

गोधूम यानी गेहूँ | यह गेहूँ न होकर महामारी ही है और इस बैरी को ही जाते में रगड़ना है, इस सत्यसंकल्प से साईराम ने इस मर्यादा पुरुषार्थ को सिद्ध किया | इस पुरुषार्थ को सिद्ध करते समय उन्होंने हम मानवों के सामने स्व-आचरण के द्वारा आदर्श तो प्रस्थापित किया ही, परंतु साथ ही हमें भी इस कायर्र् में सम्मिलित होने का अवसर प्रदान कर हमें मर्यादा पुरुषार्थ सिद्ध करने का आसान मार्ग भी दिखाया|

हमारा मर्यादा पुरुषार्थ है, साईबाबा के कार्य में अपनी पूरी क्षमता के साथ सम्मिलित होना | इस कथा से हमारी समझ में आता है कि साईबाबा ने कितनी सहजता से उन चार औरतों के जीवन का विकास किया है, उन्हें परमेश्वरी कार्य में सहभागी होने का अवसर दिया है, उनसे नाम-गुण-लीला का संकीर्तन एवं सेवा दोनों ही बातें एक ही समय पर करवायी हैं, फलाशा नष्ट कर निष्काम कर्मयोग करवाया है, फिर उन्हीं के हाथों उस आटे को गॉंव की सीमा पर डलवाने का महत्त्वपूर्ण काम भी करवाया है अर्थात उनका पुरुषार्थ भी सिद्ध करवाया है और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन सारी घटनाओं के द्वारा महामारी से छुटकारा तो दिलवाया ही है, पर साथ ही मर्यादाशील भक्ति के मार्ग पर पूरी तरह स्थिर करके प्रेमप्रवास भी करवाया है, जिससे उन्हें अखंड साईराम प्राप्त हुए |

आज हमें अपने मन की महामारी से मुक्ति पाकर अखंड साईराम की प्राप्ति यदि करनी है, तो प्रथम अध्याय की इस कथा को अपने अन्तर्मन में घोलना चाहिए, उतारना चाहिए|