श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२१)

मैं तो केवल चरणों का दास। मत कीजिए मुझे उदास।
जब तक चल रही है इस देह में साँस। निजकार्य पूरा करवा लीजिए॥

हेमाडपंत इस प्रार्थना के द्वारा बाबा से विनति करते हैं कि जब तक मैं जीवित हूँ मुझसे पुरुषार्थ करवा लीजिए। अकसर हर एक व्यक्ति यही सोचता है कि वह जो करना चाहता है, वही होना चाहिए। लेकिन मुझे जो करना है, वह यदि बाबा की इच्छा के विरुध्द यानी बाबा के द्वारा मेरे लिए बनायी गयी योजना के विरुद्ध होनेवाली बात होगी, तो मैं जो चाहता हूँ वैसा होना यह मेरे लिए हानिकारक होगा। निजकार्य का संपादन होने के लिए बाबा की इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार बाबा के द्वारा बताये गए कार्य को पूरा करना ही मेरा पुरुषार्थ है। हमारा क्षुद्र स्वार्थ सदैव व्यर्थ ही साबित होता है, केवल पुरुषार्थ ही यशस्वी होता है। ‘जब तक देह में साँस चल रही है, तब तक मुझसे पुरुषार्थ करवा लीजिए, ऐसी प्रार्थना हेमाडपंत बाबा से कर रहे हैं क्योंकि पुरुषार्थ यही मेरे जीवन के ‘राम’ है और राम के बगैर जैसे सीताजी नहीं रहतीं, बिलकुल वैसे ही पुरुषार्थ किए बगैर तृप्ति भी नहीं मिलेगी। पुरुषार्थ एवं तृप्ति के बगैर जीवन में उदासीनता छा जाती है। बाबा का दास पुरुषार्थ एवं तृप्तिसहित अत्यन्त यशस्वी संपन्न जीवन जीता है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईइसीलिए हेमाडपंत प्रार्थना करते हैं कि इस दास के शरीर में जब तक प्राण हैं, तब तक आप अपना कार्य पूरा करवा लीजिए। मुझसे जो भूमिका करवाने की आप की जो इच्छा है, उसे पूरा करवा लीजिए। अब यहाँ पर हमारे मन में यह प्रश्‍न निर्माण हो सकता है कि बाबा ने जो भूमिका मुझे दी है क्या हम उसे पूरा भी कर सकते हैं? यहीं पर हेमाडपंत पहले ही दी गई पंक्तियों के माध्यम से हमें मार्गदर्शन कर रहे हैं। हेमाडपंत कह रहे हैं कि मैं तो सामान्य हूँ ही, मेरी क्षमता भी सामान्य ही है और इस साईसच्चरित-लेखन का कार्य ठहरा असामान्य! बाबा के द्वारा जो भूमिका मुझे सौंपी गई है, वह असामान्य है और इसे निभाना बड़ा ही मुश्किल काम है। परन्तु यहीं पर हेमाडपंत अत्यन्त विश्‍वासपूर्वक कह रहे हैं कि जो भी भूमिका बाबा के द्वारा मुझे सौंपी गई है वह असामान्य है और मैं एक सामान्य मनुष्य हूँ, फिर भी बाबाने मुझे इस भूमिका को निभाने को कहा है, तो इसका अर्थ यही है कि इस भूमिका को मैं पूरी ईमानदारी एवं लगन के साथ निभाऊँगा ही, क्योंकि यह मुझ से करवाने वाले मेरे साईनाथ असाधारण सामर्थ्यों से संपन्न हैं। इस साईनाथ के दरबार में असंभव ऐसा कुछ भी नहीं है। यदि इनकी इच्छा होगी तो यह असामान्य भूमिका एक सामान्य से सामान्य मनुष्य से भी वे भली भाँति करवा सकते हैं। मेरी क्षमता चाहे कितनी भी सामान्य क्यों न हो मगर तब भी ‘कर्ता’ साईनाथ अपार सामर्थ्य के धनी हैं और वे कुछ भी कर सकते हैं।

कार्य यदि नहीं था सामान्य। आज्ञा शिरोधार्य कर ली।
बाबा के जैसे वदान्य के होते हुए। मुझे कारण क्या घबराने का॥

श्रद्धावान को कभी भी अपने-आप को असमर्थ नहीं समझना चाहिए। यदि मैं मेरे साईनाथ का हूँ तो मुझे हीनभावना नहीं रखनी चाहिए। मेरे साईनाथ ही सबसे ‘ग्रेट’ हैं। तो मैं उनका दास कभी भी अपने आप को कमजोर नहीं समझूँगा। यदि मैं इनके चरणों में हूँ, यदि इनके चरणों का दास्यत्व करने में ही मैं अपने-आप को धन्य मानता हूँ तो मुझे दैन्य भाव रखने की ज़रूरत ही नहीं हैं। बाबा जैसे ‘वदान्य’ के होते हुए और ङ्गिर उन्हीं के द्वारा मुझे यह भूमिका अदा करने की आज्ञा मिल चुकने पर मुझे दैन्यभाव रखने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। वदान्य का एक अर्थ है ‘वाचस्पति’ और साथ ही दूसरा अर्थ ‘उदारदाता’ यह भी है। साईनाथ की दो शक्तियों के बारे में हेमाडपंत यहाँ पर हमें बतला रहे हैं।

१) साई का वचन ही सत्य साबित होता है।
२) साई ही उस वचन को सत्य में उतारने हेतु मुझे हर प्रकार से सामर्थ्य की आपूर्ति करते रहते हैं।

यहाँ पर हमें इस बात का पता चल जाता है कि हेमाडपंत कितना सुंदर मार्गदर्शन हमें इस ‘वदान्य’ शब्द के द्वारा कर रहे हैं। साईनाथ के मुख से जैसे ही आज्ञा हुई कि ‘तुम बस्ता रख दो, तुम चरित्र-लेखन करो’ तो फिर बाबा के ये वचन सत्य साबित होंगे ही! यदि मैंने यह निश्‍चय किया होता और बगैर बाबा की आज्ञा लिए ही इस कार्य को आरंभ कर देता, तो ऐसा करने से पहले मुझे अपनी क्षमता का अहसास रखना चाहिए। और अब जब बाबा के ही मुख से ये बोल बाहर निकले हैं, तो ङ्गिर बाबा ही इसे सत्य में उतारेंगे, इसमें कोई भी संदेह नहीं है। दूसरी बात यह है कि इस बात को सत्य साबित करने के लिए मुझे जिस सामर्थ्य की ज़रूरत है, उसे पूरा करने के लिए बाबा पूरी तरह समर्थ हैं, बाबा के समान ‘परम-उदारदाता’ दूसरा और कोई नहीं है। जब बाबा बोलते हैं, तब वह सत्य में उतारने के लिए आवश्यक रहनेवाली सारी सामग्री, हर एक कार्य पूरा करने के लिए और उसे पूर्ण करवाने के लिए बाबा पूर्णत: समर्थ हैं ही।

मुझे केवल ‘आज्ञा शिरोधार्य’ करनी चाहिए। बाबा की आज्ञा सिर आँखों पर रखकर मुझे उसी के अनुसार प्रयास करते रहना चाहिए। ‘बाबा ने जो कहा है वह यदि सच होने ही वाला है, तो फिर मुझे परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है’, ऐसा विचार कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना यह सर्वथा गलत ही है। बाबा का कार्य बाबा ही पूरा करवाने वाले हैं और इसके लिए मुझे चुनकर उन्होंने मुझे विकास करने का अवसर भी प्रदान किया है। इसीलिए मुझे इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपना स्वयं का समग्र विकास करना चाहिए।

बाबा ने मेरा चुनाव क्यों किया, यह प्रश्‍न ही अप्रस्तुत है। बाबा तो यह कार्य किसी से भी करवा सकते हैं, फिर भी उन्होंने मुझे ही क्यों चुना, इस प्रश्‍न का उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ? यह तो केवल बाबा ही जानते हैं। किसे कौन सी भूमिका करने के लिए कहना है यह तो बाबा का ही अधिकारक्षेत्र है। कप्तान तो केवल वे ही हैं, फिर उनके अधिकारक्षेत्र में मेरे द्वारा दखल अंदाज़ी करना यह गलत है। किसे क्या करना है इसका निर्णय तो केवल बाबा को ही करना है, मुझे नहीं। साथ ही बाबा ने किसे क्या कहा है, इस बात की चीर-फाड़ करना भी उचित नहीं है, यह काम मेरा नहीं है। मुझे तो केवल यही जानना है कि बाबा ने मुझसे जो कहा है, उसे मुझे करना है। ‘बाबा ने मुझे क्यों कहा’ इसकी अपेक्षा ‘बाबा ने क्या कहा’ यह अधिक महत्व रखता है। मैं इस काम के योग्य हूँ इसीलिए यह काम करने को कहा है। दूसरा कोई योग्य नहीं है इसीलिए किसी अन्य को नहीं कहा गया है, मुझे ही कहा गया है, इस प्रकार की गलत तुलना भी हेमाडपंत नहीं करते हैं। उलटे वे कहते हैं कि मेरी कुछ भी योग्यता न होते हुए भी साईनाथ मुझे यह भूमिका अदा करने को कह रहे हैं, इसमें मेरा कोई भी कर्तृत्व न होकर भी इस में केवल श्रीसाईनाथजी का अकारण कारुण्य है और बाबा के कारुण्य के लिए कोई कारण नहीं, बाबा के वात्सल्य के लिए कोई कारण नहीं, केवल वे ही निरपेक्ष प्रेम करते हैं।

सभी प्रकार से मैं पामर। किस कारण से ये ‘करुणासागर’।
‘दयाघन’ बरस पड़े मुझ पर। मैं तो कुछ भी नहीं जान पाया॥

हमें हेमाडपंत से यही सीखना चाहिए कि ‘मेरे बड़प्पन के कारण, मेरी योग्यता के कारण बाबा ने मुझे यह भूमिका निभने को कहा है’, इस तरह की गलतफहमी में न पड़कर, साईनाथजी की इस लीला में से श्रीसाईनाथ की करुणा का, दया का एवं अकारण प्रेम आदि गुणों का अनुभव लेना चाहिए। ‘मैं कितना ‘ग्रेट’ हूँ और मेरे ग्रेट होने के कारण ही बाबा ने मुझे यह ज़िम्मेदारी सौंपी है’, ऐसे भ्रम में मुझे कभी भी नहीं रहना चाहिए। संत श्री ज्ञानेश्‍वर जी महाराज ने जिस भैंसे से वेद की ऋचाओं का उच्चारण करवाया, वह भैंसा कोई ग्रेट नहीं था, अपि तु सच में ‘ग्रेट’ थे वे संत ज्ञानेश्‍वर जी महाराज।