श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-३९)

तात्यासाहब की बात सुनते ही तुरंत। दौड़ पड़ा मैं वहाँ बाबा थे जहाँ।
चरणधूलि में लोटांगण किया। आनंद न समा रहा था मन में॥ 

हेमाडपंत की यह साईचरणधूली-भेंट हमारे जीवन में भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। ‘साईबाबा साठेजी के वाडे के कोने तक आ गये हैं’, यह सुनते ही हेमाडपंत तेज़ी से दौड़ते हुए बाबा के पास जा पहुँचे और उन्होंने बाबा की चरणधूली में लोटांगण किया। ‘मेरे सद्गुरु आये हैं’ यह बात यदि हम किसी से सुनते भी हैं तब हमें दौड़ते हुए वहाँ जा पहुँचना चाहिए और सद्गुरु की चरणधूली में लोटांगण करना चाहिए। यह करने से ही मन में समा न पाये ऐसे अपार आनंद की प्राप्ति हमें होती हैं।

हम सबको ऐसा लगता है कि हमारा मन हमेशा आनंदमय रहे और दुख की परछाई तक हम पर पड़ने न पाये; परन्तु हम देखते हैं कि होता तो इसके बिलकुल विपरित ही है। हमारे जीवन में दुख के बड़े-बड़े पहाड़ खड़े रहते हैं और सुख की एक किरण भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती हैं। हमारा मन अकसर भय, चिंता, व्यथा, दुख आदि से भरा होता है। ‘आनंद न समा पाये मन में’ ऐसी स्थिति हमारे जीवन में भला कैसे निर्माण हो सकती है?

इसीलिए हेमाडपंत के आचरण का अध्ययन हमें करना चाहिए। साई से हुई पहली मुलाक़ात के बारे में हेमाडपंत क्या कहते हैं? वे कहते हैं कि उनके मन में आनंद समा ही नहीं पा रहा था। यह कहकर वे बताते हैं कि साईचरणधूली में लोटांगण करने से ‘नूतन जीवन का आरंभ वहीं से हुआ’ ऐसी उनकी स्थिति हो गई है। उनके जीवन में आनेवाले सुखदुख आदि द्वंद्वों को पूर्णविराम मिल गया। साथ ही आनंद का प्रवाह अखंड रूप में भरभरकर प्रवाहित होने लगा। कभी सुख तो कभी दुख इस तरह के सारे द्वंद्वों का दौर थम गया और

आनंद की झील में आनंद तरंग। आनंद ही अंग आनंद का॥ 

इस प्रकार की आनंदमयता व्याप्त होकर मन साईचरणों में सदा के लिए संलग्न हो गया।

साईचरणधूली

हेमाडपंत के आचरण के द्वारा हम यही सीखते हैं कि ‘तुम और मैं मिलकर करें, तो इस दुनिया में ऐसा कुछ भी ऐसा नहीं है, जो संभव ना हो सके।’ इस मर्यादाशील भक्तिस्थिति को यानी ‘तुम और मैं मिलकर’ इस शाश्‍वत संलग्नता को कैसे प्राप्त करना है? तो पहले यह जानना चाहिए कि जब तक मैं इस साईनाथ के चरणों के साथ संलग्न नहीं हो जाता हूँ, तब तक मेरे जीवन में आनंद का प्रवाह प्रवाहित नहीं हो सकता है। हेमाडपंत के आचरण से हम यह जान पाते हैं कि इस साईनाथ के साथ संलग्न कैसे होना है यानी अखंड रूप में कैसे जुड़ना है।

हेमाडपंत के आचरण में निम्नलिखित बातें विशेष तौर पर दिखाई देती हैं, जो साईसच्चरित की ओवियों में यानी पंक्तियों में दिए गए शब्दों द्वारा प्रकट होती हैं।

१) सुनते ही
२) तेज़ी से
३) दौड़ पड़ा बाबा थे जहाँ पर
४) साईचरणधूल में लोटकर बाबा के चरणों पर ‘लोटांगण’ किया।

हमें इन मुद्दों से चार महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ सीखनी चाहिए।

१) भगवान इस धरती पर अवतरित होते हैं यह सुनना यानी इस बात को मान लेना।
२) भगवान से मिलने की उत्कटता।
३) भगवान के पास तुरंत ही दौड़कर जाना।
४) भगवान के दर्शन होते ही तुरंत ही उनके चरणधूली में लेट जाना (लोटांगण करना)।

१) सुनना – मेरे ये साईनाथ भगवान हैं और वे अवतार लेकर आये हैं। ‘सुनना’ इस बात का तात्पर्य है क्रिया में उतारना। हेमाडपंत यहाँ पर नूलकर जी से केवल इतना ही नहीं सुनते हैं कि बाबा वाडे के कोने के पास तक आ गए हैं, बल्कि नानासाहब चांदोरकर और काकासाहब दीक्षित के समान श्रेष्ठ भक्तों की बात सुनकर वे शिरडी जा पहुँचे हैं। नाना एवं काका के समान अत्यन्त सज्जन पुरुष, भक्तिरस से संपन्न, निर्मोही भक्तश्रेष्ठ जब ‘भगवान आये हैं’ ऐसा मुझे बताते हैं, तब मुझे उनकी बात सुननी ही चाहिए। इस तरह का जो ‘सुनना’ है, वही हेमाडपंत को यहाँ पर अभिप्रेत है।

हमें भी कभी न कभी, किसी न किसी के मुख से साई की लीलाओं का पता चलता ही है। हम उस भक्त का मजाक उड़ाकर उसका मुँह बंद कर देते हैं। यहाँ पर हमें ध्यान में रखना चाहिए कि कहने वाला व्यक्ति स्वयं किस प्रकार का आचरण रखता है, इस बात को ध्यान में रखकर हमें उसकी बात सुननी चाहिए। साईनाथ की भक्तिसेवा में प्रेमपूर्वक रम जानेवाला ऐसा कोई श्रद्धावान जब हमें इस साईनाथ के बारे में कुछ बताता है, तब हमें उसकी बात सुननी चाहिए। साथ ही साईनाथ का श्रद्धावान जब सचमुच बड़ी आत्मीयता के साथ हमें साई के बारे में कुछ बताता है, उनकी लीलाओं का वर्णन करता है, तब हमें उसकी सच्ची आत्मीयता को पहचानकर उसकी बात सुननी चाहिए।

२) तेज़ी से- जल्दी से, तुरंत यह बात इस सुनने के बाद आती है। सुनने के बाद तुरंत ही उसपर अमल करना चाहिए। अकसर इस साईनाथ के बारे में, साईलीलाओं के बारे में हम सुनते हैं, परन्तु बाबा से मुलाकात करने का आकर्षण हम में नहीं होता है। आम तौर पर साईनाथ की पोथी लाकर, श्रीसाईसच्चरित का ग्रंथ लाकर उसे रोज़ पढ़ने की ‘तेज़ी’ हम नहीं दिखाते हैं। भगवान को, इस साईनाथ को मेरी मुसीबतों के समय तुरंत ही आना चाहिए, एक क्षण का भी विलंब किए बगैर इन्होंने तत्काल ही मेरी मदद करनी चाहिए, साई को तेज़ी से सब कुछ करना चाहिए ऐसी मेरी इच्छा होती है। परन्तु बाबा की भक्ति के मामले में, बाबा के चरणस्पर्श के मामले में मैं क्या ऐसी तेज़ी रखता हूँ? हमें साईभक्ति में कुछ करना हो तो हमारा रवैया रहता है कि तुरंत करने की क्या आवश्यकता है, आज रहने दो, कल देखेंगे।

बाबा के देहधारी रहने पर अनेक लोग इस तरह आज-कल करते-करते विलंब करके शिरडी में जाने की बात टालते रहे और अंत में शिरडी जाना उनको नसीब ही नहीं हुआ। मेरा स्वयं का कोई काम हो तो उसे जल्द से जल्द पूरा करवाने की जल्दी मुझे होती है। परन्तु साईबाबा के ज़रूरतमंद बच्चों की सेवा करने में हम तेज़ी कहाँ दिखाते हैं? हेमाडपंत जब सुनते हैं कि बाबा वाडे के कोने तक आ पहुँचे हैं, तब वे तुरंत ही तेज़ी से बाबा के पास जाने का निश्‍चय कर लेते हैं। तेज़ी से करना यानी वह कार्य यह मेरी प्राथमिकता (प्रायॉरिटी) होना। साईभक्ति को प्राथमिकता देकर उस बात को करना, यही है वह ‘तेज़ी’, जो हम में सदैव होनी चाहिए।

३) बाबा की ओर दौड़ पड़ना – हेमाडपंत ‘बाबा कोने तक आ पहुँचे हैं’ यह सुनते ही बाबा की दिशा में दौड़ पड़े। हेमाडपंत की उम्र उस वक्त साठ साल की थी। तब भी बाबा से मिलने के लिए वे चलकर नहीं गए, बल्कि उस उम्र में भी वे दौड़ पड़े। हेमाडपंत मुख्य रास्ते पर ही खड़े थे, परन्तु उन्होंने यह नहीं कहा कि बाबा यहीं से जानेवाले हैं तो वे मुझे मिलेंगे ही, मुझे दौड़ने की क्या ज़रूरत है? हेमाडपंत को स्वयं के सामान की भी फिक्र नहीं थी कि मैं यदि बाबा से मिलने जाता हूँ तो मेरे सामान का क्या होगा? हेमाडपंत उस व़क्त मुंबई से शिरडी का सफ़र करके शिरडी में दाखिल हुए थे तो स्वाभाविक है कि वे उस समय सफ़र की थकान महसूस कर रहे होंगे। मग़र तब भी उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि अभी तो मैं शिरडी में पैर रख रहा हूँ, लंबा सफ़र करके थक चुका हूँ, थोड़ी देर विश्राम करने के पश्‍चात् बाबा से मिलने चला जाऊँगा।

हेमाडपंत के मन में यह विचार भी नहीं आया कि स्नान आदि किए बिना बाबा का दर्शन कैसे करूँ? मेरे भगवान स्वयं ही मेरे लिए चलकर आये हैं, फिर मैं जैसा भी हूँ वैसा ही उनके पास दौडकर जाऊँगा। हमें यहाँ पर यह सीख लेनी चाहिए कि सद्गुरु की ओर दौड़ पड़ना कितना महत्त्व रखता है। सद्गुरु की ओर दौड़ पड़ना तो दूर की बात है, हम उलटे विलंब करते हुए, ऊपर से अनेक बहाने बताने लगते हैं। मुझे सद्गुरु के पास चलकर, धीरे धीरे जाना नहीं हैं, बल्कि दौड़ पड़ना है मेरे भगवान के पास, उनके चरणों में।

इन महत्त्वपूर्ण तीन बातों का अध्ययन आज हमने हेमाडपंत के आचरण के द्वारा किया। अगले लेख में चौथी एवं सबसे महत्त्वपूर्ण बात का यानी ‘चरणधूली में लोटांगण करना’ इस बात का अध्ययन करेंगे।