समय की करवट (भाग ६१) – चिनी ड्रॅगन के प्रथम ही दिखायी दिये नाखून

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-२१

इस प्रकार लगभग एक करोड़ लोगों की जानें लेकर प्रत्यक्ष कोरियन युद्ध समाप्त तो हुआ, लेकिन उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच के अगामी संघर्ष के बीज बोये गए। उसीके साथ, चिनी ड्रॅगन भी अब नीन्द से जग रहा होने की नांदी इसी युद्ध में से सर्वप्रथम मिली।

तब तक चीन के बारे में किसी ने गंभीरता से सोचा नहीं था, दरअसल उसके बाद भी कई सालों तक नहीं। लेकिन चीन की सुप्त क्षमता का एहसास होनेवाले बुद्धिमान लोग तब भी थे, लेकिन उस समय किसी ने उनकी राय पर गंभीरतापूर्वक नहीं सोचा। जब अठारहवीं सदी के जगज्जेता सम्राट नेपोलियन ने चीन के बारे में कहा था कि ‘सोये हुए चिनी ड्रॅगन को सोने ही दो, उसे जगाओ मत। क्योंकि वह यदि जाग गया तो पूरी दुनिया को हिला देगा’; तब उसके इस वक्तव्य को उस समय किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया था और तत्कालीन चीन की हालत को देखते हुए कोई इस वक्तव्य पर गंभीरता से सोचें यह मुमक़िन ही नहीं था; उल्टा ‘चीन में क्या है इतना घबराने जैसा?’ ऐसा उसका मज़ाक उड़ाया गया।

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कोरियन युद्ध में चीन द्वारा ‘ह्युमन वेव्ह टेक्निक’ का इस्तेमाल किया गया।

इस कोरियन युद्ध में चिनी ड्रॅगन की पूँछ पर पैर गिरा था और चिनी ड्रॅगन जाग गया था। दरअसल उस समय, अंतर्गत संघर्ष में से झुलस गये चीन में माओ झेडाँग द्वारा लायी गयी कम्युनिस्टों की सत्ता ज़रासी स्थिर हो रही थी। ऐसा होने के बावजूद भी दुनिया की सबसे ताकतवर महासत्ता को चुनौती देने की हिम्मत माओ ने दिखायी। इसका कारण, उसे अपनी देशांतर्गत प्रतिमा को बड़ा करना था। उसीके साथ, हम एक कम्युनिस्ट सत्ता की सहायता के लिए दौड़े चले आये, यह दिखाकर उसे आंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट जगत में अपना स्थान मज़बूत करना था। सबसे अहम बात यानी आज नहीं तो कल, चीन को अमरीका के साथ कहीं न कहीं मुक़ाबला करना ही पड़नेवाला है, इसका उसे मन ही मन एहसास था।

हालाँकि इस युद्ध में चीन पीछे हटा था और उसमें उसका बहुत बड़ा नुकसान हुआ था, मग़र फिर भी सरकारी यंत्रणा ने अपने नागरिकों में प्रचारतंत्र का प्रभावी रूप में इस्तेमाल किया। इसी प्रसार-प्रचार तंत्र के ज़रिये इस देश में अमरीकाविरोध के बीज हमेशा के लिए बोये गए। हालाँकि खुले आम तात्कालिक कुछ भी कारण न होते हुए चीन ही इस युद्ध में सहभागी हुआ था, मग़र फिर भी ‘युद्ध की शुरुआत हमने नहीं की, बल्कि हमारे हितसंबंध जब हमें ख़तरे में पड़े दिखायी देने लगे, तब ही हमने उन्हें मह़फूज़ रखने के लिए इस युद्ध में हिस्सा लिया और हमारा देश अविकसित होने के बावजूद भी उसने एक महा-ताकतवर सत्ता को टक्कर देकर उसे कुछ समय तक ही सही, लेकिन पीछे धकेल दिया’ यह बात प्रभावी प्रचारतंत्र के ज़रिये चिनी नागरिकों के मन पर अंकित की गयी। इस कारण इस युद्ध के ख़त्म होने तक एक क़िस्म की राष्ट्रीयत्व की भावना सारे चिनी नागरिकों में उमड़कर आयी – हमारे देश को दुनिया के शिखर पर ले जाने की भावना!

लेकिन अमरीकापरस्त चँग-कै-शेक को चीन की सत्ता में से निकाल बाहर कर देने के बाद उसने जिस तैवान की पनाह ली थी, उस तैवान को निगलने की प्रतिशोधबुद्धि की योजना को माओ अंजाम नहीं दे सका, आज तक नहीं। अमरीका ने पश्‍चात्समय में आँखों में तेल डालकर तैवान की रक्षा की और उसे मेनलँड चायना निगल न पायें, इसका ध्यान रखा।

इस युद्ध के बाद दक्षिण कोरिया तक़रीबन दशक भर लड़खड़ा रहा था। लेकिन अमरीकापरस्त खुली अर्थव्यवस्था का स्वीकार करने के कारण आगे चलकर उसे रास्ता दिखायी दिया और औद्योगिकदृष्टि से विकसित राष्ट्र के रूप में उसने पश्‍चात् के दशकों में तेज़ रफ़्तार पकड़ी। लेकिन उत्तर कोरिया औद्योगिकदृष्टि से कभी भी विकसित नहीं हो पाया और उसे हमेशा चीन की बैसाखियों का आधार लेकर ही रहना पड़ा। चीन इस उद्देश्य को साध्य कर सका था। मुख्य बात, जनसंख्या की ताकत को चीन जान गया था। यह जनसंख्या और भी बढ़ें, इस दिशा में माओ की सरकारी यंत्रणा ने विशेष प्रयास शुरू किये।

सबसे अहम बात यह थी कि सोया हुआ चिनी ड्रॅगन जाग जाकर, प्रथम ही उसके नाख़ून दुनिया को दिखायी दिये थे!