समय की करवट (भाग ६२) – वॉर्सा पॅक्ट, हंगेरी और आगे….

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-२२

आख़िरकार जो प्रदीर्घ समय तक चलेगा ऐसा प्रतीत हो रहा था वह कोरियन युद्ध समाप्त हो गया, उसके लिए प्रायः दो घटनाएँ कारणीभूत हुईं – सन १९५३ में अमरीका एवं सोव्हिएत रशिया में हुए सत्तापरिवर्तन। अमरीका में ट्रूमन की जगह पर आयसेनहोवर सत्ता में आया; वहीं, रशिया में स्टॅलिन की मृत्यु होकर उसकी जगह पर निकिता ख्रुश्‍चेव्ह ने कार्यभार सँभाला।

उसके बाद ही कोरियन युद्ध में समझौते की चर्चा संभव हो सकी।

ट्रूमन के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में इस कोल्डवॉर के डर से अमरीका के सरकारी संरक्षणखर्चे में कई गुना, कुछ कुछ क्षेत्रों में तो फ़िज़ूल ही बढ़ोतरी हुई।

वहीं, स्टॅलिन ने इस युद्ध को प्रतिष्ठा का मुद्दा (‘प्रेस्टिज इश्यू’) बनाया था।

आयसेनहोवर ने रक्षाखर्च में कटोतरी की।

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स्टॅलिन के पहचानचिन्ह मिटाने का कार्यक्रम हाथ में लेने के बावजूद भी पश्‍चिमी देशों के मन में सोव्हिएत का ख़ौफ़ क़ायम रखनेवाला – सोव्हिएत रशिया का राष्ट्राध्यक्ष निकिता ख्रुश्‍चेव्ह

ख्रुश्‍चेव्ह ने सोव्हिएत रशिया में ‘डिस्टॅलिनायझेशन’ कार्यक्रम शुरू कर स्टॅलिनयुग के पहचानचिन्हों को मिटा देने की शुरुआत की।

लेकिन आयसेनहोवर ने रक्षाखर्च में कटोतरी करते समय भी कोल्ड वॉर में रहनेवाली अमरीका की भेदकता बरक़रार रखी थी। उल्टा, उसे बढ़ाने की ही कोशिश की। ट्रूमन डॉक्ट्रिन में कम्युनिस्ट सोव्हिएत पर लगाम कसने के लिए ज़रूरतमन्द देशों को आर्थिक सहायता की आपूर्ति आदि राजकीय उपायों का अवलंबन करने पर ज़ोर दिया गया था; वही, अब आयसेनहोवर के कार्यकाल में उसमें – ‘ज़रूरत पड़ने पर’ परमाणुबम आदि विध्वंसक साधनों का इस्तेमाल करना, इन जैसे ‘सोल्युशन्स’ का भी समावेश किया गया।

ख्रुश्‍चेव्ह ने ‘कोल्ड वॉर’ की इस शान्ति की कालावधि का अधिक चालाक़ी से इस्तेमाल करने की शुरुआत की – पश्‍चिमी देशों को मात देने हेतु सोव्हिएत की लष्करी ताकत को बढ़ाने के लिए!

विश्‍वयुद्ध के बाद स्थापन हुए ‘नाटो’ (‘नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनायझेशन’) के लिए यह कोरियन युद्ध यानी पहला ही युद्ध-अभ्यास था। उस समय के लिए ही सही – ‘रशियन्स आऊट, अमेरिकन्स इन अँड जर्मन्स डाऊन’ (‘नाटो’ के पहले महासचिव के भाषण के वचन) यह ध्येय होनेवाले ‘नाटो’ ने इस युद्ध से सबक सीखते हुए अपनी संरचना को बदलकर अधिक मज़बूत किया।

इस कोरियन युद्ध में ‘नाटो’ ने निभायी भूमिका को प्रत्युत्तर देने हेतु सोव्हिएत रशिया ने सन १९५६ में ‘वॉर्सा समझौते’ द्वारा युरोपस्थित अपने अंकित राष्ट्रों का गठबंधन तैयार किया….अपने मज़बूत, लेकिन अदृश्य ‘आयर्न कर्टन’ में बंदिस्त किया हुआ!

इन राष्ट्रों की सरकारें हालाँकि सोव्हिएत रशिया की अंकित थीं, आम नागरिक ज़ुल्म के तले रौंदे जा रहे थे। पश्‍चिमी देशों में होनेवाले विमुक्त वातावरण की ख़बरें सुन-सुनकर अधिक ही बेचैन हो रहे थे। एक अलग ही क़िस्म की अंतर्गत सुप्त धधकती धारा इन नागरिकों में तैयार हो रही थी। सबकुछ ‘आलबेल’ यक़ीनन ही नहीं था।

लेकिन इसकी ख़बरें ‘बाहर की’ दुनिया तक न पहुँचें, इसके एहतियात सेन्सॉरशिप द्वारा बरते जा रहे थे।

लेकिन जिस तरह गॅस पर रखे गये प्रेशर कूकर में जमा होनेवाली भाप बाहर जाने के लिए मार्ग रखना पड़ता है, अन्यथा उसके फूटने की संभावना होती है, वैसा ही वातावरण इन राष्ट्रों में निर्माण होने की शुरुआत हुई थी।

पहली चिंगारी भड़की हंगेरी में….

वहाँ की सरकार के सोव्हिएतपरस्त दमनतन्त्र के कार्यक्रम से ऊबकर वहाँ के नागरिकों ने पहले बग़ावत की। वहाँ के स्टॅलिनपरस्त राष्ट्राध्यक्ष मात्यास रकोसी को ‘डिस्टॅलिनायझेशन’ कार्यक्रम के तहत ख्रुश्‍चेव्ह ने अपने पद से हटा दिया होने के कारण, अँधेरे में लड़खड़ाती वहाँ की जनता को प्रकाश की किरन दिखायी देकर उसका धीरज बढ़ गया था।

इस बग़ावत की शुरुआत की वहाँ के छात्रों ने। अपनी माँगों को सरकार तक और सभी लोगों तक पहुँचाने हेतु इन निदर्शकों ने वहाँ के रेडिओकेंद्र पर धावा बोल दिया। भीतर घुसे छात्रों को वहीं पर बन्दी बनाकर रखा गया। यह ख़बर बाहर समझते ही बाहर खडे निदर्शकों ने निदर्शन करना चालू किया। वहीं, सोव्हिएत की तरह संरचना रखकर निर्माण की गयी वहाँ की खुफ़िया पुलीस यंत्रणा ने उनपर रेडिओकेंद्र में से गोलीबारी शुरू की। इस एक घटना के कारण जनमत प्रक्षुब्ध बनकर यह बग़ावत पूरे हंगेरी में फैल गयी।

जनमत को शान्त करने के लिए नयी सरकार ने – खुफ़िया पुलीसयंत्रणा को बरखास्त करना, वॉर्सा समझौते से बाहर होने के लिए कदम उठाना, सबकुछ आलबेल होने के बाद मुक्त वातावरण में चुनाव लेना – इन जैसी कुछ घोषणाएँ कीं।

उस समय सोव्हिएत आर्मी ने हस्तक्षेप किया और हज़ारों हंगेरियन नागरिकों को गिरफ़्तार किया, मार दिया या फिर तड़ीपार कर दिया। इस अफ़रातफ़री के माहौल में दो लाख से भी अधिक हंगेरियन नागरिकों ने देशत्याग किया।

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‘टाईम’ मॅगझिन का सन १९५६ का ‘पर्सन ऑफ द इयर’ – ‘आम हंगेरियन स्वतंत्रतासैनिक’

एक सोव्हिएतपरस्त देश में हुई इस बग़ावत को पश्‍चिमी प्रसारमाध्यमों ने अच्छाख़ासा चर्चा में रखा। इतना कि ‘टाईम’ मॅगझिन का सन १९५६ का ‘पर्सन ऑफ द इयर’ है, यह ‘आम हंगेरियन स्वतंत्रतासैनिक’; ऐसा घोषित किया गया!
(मज़े की बात यह थी कि इसी ‘टाईम’ मॅगझिन का अगले ही साल का यानी सन १९५७ का ‘पर्सन ऑफ द इयर’ निकिता ख्रुश्‍चेव्ह था!)

लेकिन हंगेरी के लोगों को स्वतन्त्रता का सूरज देखने के लिए अगले कई सालों तक संघर्ष करना पड़ा।

सन १९५६ से १९६१ इस कालावधि में ख्रुश्‍चेव्ह ने पश्‍चिमी जगत को अपने परमाणुअस्त्र-कार्यक्रम का ख़ौफ़ दिखाकर उन्हें जकड़कर रखा था।
सन १९६० का दशक शुरू हुआ, वह कोल्ड वॉर के एक पुराने स्थान पर नया मोरचा खोलने के लिए!