समय की करवट (भाग ५९) – कोरियन युद्ध और कोल्ड़ वॉर

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

२५ जून १९५० को उत्तर कोरिया की सेना ने दक्षिण कोरिया की सीमा का उल्लंघन कर दक्षिण कोरिया में प्रवेश किया और कोरियन युद्ध की शुरुआत हुई। यह हालाँकि ऊपरी तौर पर उत्तर एवं दक्षिण कोरिया के बीच का युद्ध था, वह दरअसल अमरीका एवं सोव्हिएत रशिया के बीच के ‘कोल्ड वॉर’ का ही अंजाम था -दो महासत्ताओं के, आगे चलकर प्रदीर्घ कालावधि तक चले ‘कोल्ड वॉर’ का पहला व्यक्त और सशस्त्र संघर्ष!

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ (‘युनो’) की स्थापना हुई, तब उसके लगभग सारे सूत्र हाथ में होनेवाली अति‘पॉवरफुल’ सुरक्षापरिषद की भी स्थापना की गयी। पाँच स्थायी सदस्य और दस अस्थायी सदस्य ऐसा इस सुरक्षापरिषद के सदस्यों का विभाजन था। अमरीका, सोव्हिएत रशिया, ब्रिटन, फ्रान्स और चीन इन पाँच स्थायी सदस्यों के हाथों में सभी सूत्र थे।

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कोरियन युद्ध के समय चीन के पदच्युत राष्ट्राध्यक्ष चँग-कै-शेक

जिस दौर में युनो की स्थापना हुई, उस समय चीन यह ‘रिपब्लिक ऑफ चायना’ के नाम से जाना जाता था। चँग-कै-शेक ये नॅशनलिस्ट नेता उस समय उसके राष्ट्राध्यक्ष थे। बीसवीं सदी के आरंभ में चीन में होनेवाली पारंपरिक राजेशाही का त़ख्ता पलटकर जनता की सरकार लानेवाले और आधुनिक चीन के राष्ट्रपिता के रूप में जाने जानेवाले ‘सन-यत्-सेन’ के वे निकटवर्तीय थे और उनके बाद राष्ट्राध्यक्ष बन चुके थे; लेकिन वे नॅशनलिस्ट यानी जनतन्त्रवादी होने के कारण चिनी कम्युनिस्ट उनके विरोध में थे। यह खाई बढ़ती गयी और आगे चलकर बड़े संघर्ष में रूपान्तरित हुई। दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान जापान का आक्रमण रोकने हेतु संघर्षबंदी हुई तो थी, लेकिन विश्‍वयुद्ध ख़त्म होने के बाद पुनः संघर्ष शुरू हुआ।

इस दौरान सन १९४५ में युनो की स्थापना हुई, तब चँग-कै-शेक ने युनो के चार्टर पर चीन की ओर से हस्ताक्षर किये थे और दूसरे विश्‍वयुद्ध के दक्षिण-पूर्व एशियाई विभाग में चीन ने अमरीका को की हुई सक्रिय मदद के बदले में अमरीका ने, ब्रिटन जैसे अन्य दोस्तराष्ट्रों का विरोध होने के बावजूद भी, चीन को समर्थन देने के कारण चीन युनो के स्थायी सदस्यों में स्थान हासिल कर सका था।

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कोरियन युद्ध के समय चीन के सर्वेसर्वा माओ झेडाँग

हालाँकि आंतर्राष्ट्रीय व्यासपीठ पर चँग-कै-शेक को ऐसी मान्यता मिल रही थी, मग़र फिर भी ‘घर में’ उनकी स्थिति डाँवाड़ोल ही थी। कम्युनिस्टों का विरोध अब बहुत ही बढ़ गया था, जिसके परिणामस्वरूप तीव्र संघर्ष भड़क उठा था। आगे चलकर सन १९४९ में माओ झेडाँग के नेतृत्व में चीन में बग़ावत हुई और माओ झेडाँग के नेतृत्व में होनेवाली ‘पीपल्स लिबरेशन आर्मी’ ने चँग-कै-शेक की सरकार को पदच्युत किया। चँग-कै-शेक ने तैवान में आश्रय लिया।

अब प्रॉब्लेम कहाँ शुरू हुआ और ‘कोल्ड वॉर’ का इससे क्या संबंध है?

माओ ने चीन में सत्ता हथियाने के बाद चीन को ‘पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चायना’ के रूप में घोषित किया और रशिया के छिपे समर्थन के साथ युनो को इसके बारे इत्तिलाह करके, सुरक्षापरिषद के पाँच स्थायी सदस्यों में जो चीन का स्थान था, उसपर अब यह नया नाम होनेवाले चीन (‘मेनलँड चायना’) का हक़ जताया। लेकिन चँग-कै-शेक ने कई चिनी नागरिकों के साथ और मुख्य रूप में अपनी सरकार के साथ तैवान में स्थानान्तरण किया था और तैवान को ही ‘रिपब्लिक ऑफ चायना’ घोषित कर, युनो की सुरक्षापरिषद में होनेवाले स्थायी स्थान (परमनन्ट सीट) पर अभी भी अपना ही हक़ होने का आवेदन किया था।

माओप्रणित चीन को यदि मान्यता दी, तो सुरक्षापरिषद में सोव्हिएतपरस्त एक और सीट बढ़ेगी, इस डर से अमरीका ने यह भूमिका अपनायी कि युनो ने मान्यता दी हुई चँग-कै-शेक की सरकार अब विजनवास में होकर (गव्हर्न्मेन्ट इन एक्साईल) उस सरकार को बतौर ‘चीन की अधिकृत सरकार’ हमारा समर्थन है और उन्होंने तैवान के दावे का समर्थन किया।

इसपर निषेध जताने के लिए सोव्हिएत ने सन १९५० में सुरक्षापरिषद का बहिष्कार किया। दरअसल उनमें से हर एक सदस्य को, किसी भी प्रस्ताव को ठुकराने की दृष्टि से ‘व्हेटो पॉवर’ (नकाराधिकार) होने के कारण, वे सुरक्षापरिषद में रहकर भी इसका विरोध कर सकते थे। लेकिन न जाने क्यो, उन्होंने यह कदम उठाया।

यह बात अमरीका को फ़ायदेमन्द प्रतीत हुई। जब २५ जून १९५० को उत्तर कोरिया की सेना ने दक्षिण कोरिया की सरहद में अतिक्रमण किया, तब उसका विरोध करने के लिए वहाँ युनो की संयुक्त सेनाओं को भेजने का प्रस्ताव अमरीका ने, सोव्हिएत की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाकर मंज़ूर करवा लिया और सेनाओं को भेज भी दिया। उनमें ज़ाहिर है, सर्वाधिक सेना अमरीका की ही थी।

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कोरियन युद्ध के समय दक्षिण कोरिया के सर्वेसर्वा सिंग्मन र्‍ही

अब पहली बात, यह अतिक्रमण क्यों किया गया? उस समय के उत्तर कोरिया के सर्वेसर्वा किम-टू-संग और दक्षिण कोरिया के सर्वेसर्वा सिंगमन र्‍ही ये दोनों भी पूरे कोरिया पर अपना ही एकछत्री नियन्त्रण चाहते थे। उसके लिए किम ने अप्रैल १९५० में स्टॅलिन से मदद माँगी थी। चालाक़ स्टॅलिन ने हालाँकि तात्त्विक (?) दृष्टि से समर्थन दिया, लेकिन खुलेआम मदद करने में असमर्थता दर्शायी और सक्रिय सहायता के लिए चीन के पास जाने के लिए कहा। उसके अनुसार किम मई १९५० में चीन गया। माओ सहायता करने के लिए राज़ी हो गया, क्योंकि चँग-कै-शेक ने आश्रय लिये हुए तैवान को जीतने के लिए उसे बाद में कोरिया की ज़रूरत पड़नेवाली थी।

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कोरियन युद्ध के समय उत्तर कोरिया के सर्वेसर्वा किम-टू-संग

सन १९५० के जून महीने में किम-टू-संग ने ‘पूरे कोरिया में अगस्त में चुनाव लिये जायेंगे’ ऐसा इकतरफ़ा घोषित कर, अपने तीन निरीक्षकों को दक्षिण कोरिया में भेजा। इस प्रपोजल को ग़ैरक़ानूनी क़रार देकर दक्षिण कोरिया ने उन तीन निरीक्षकों को गिरफ़्तार किया। इससे उत्तर कोरिया को दक्षिण कोरिया पर आक्रमण करने का अच्छाख़ासा बहाना मिल गया और उन्होंने – दक्षिण कोरियन सेना ने ‘थर्टिएट्थ पॅरॅलल नॉर्थ’ इस सीमारेखा का उल्लंघन किया होने का आरोप करते हुए २५ जून को दक्षिण कोरिया पर आक्रमण किया।

२५ जून को यह घटना घटित होने के बाद महज़ एक हफ़्ते के अन्दर ही उत्तर कोरियन सेना ने लगभग पूरे दक्षिण कोरिया पर कब्ज़ा कर लिया था।

इस प्रकार ‘कोल्ड वॉर’ का पहला सशस्त्र संघर्ष साबित हुए इस ‘लड़वाये गये’ कोरियन युद्ध में आगे क्या हुआ?