समय की करवट (भाग ३६) – ‘बर्लिन वॉल’ : बर्लिनवासियों के मन में दरार

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।
इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’

हेन्री किसिंजर

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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

पूर्व जर्मनी द्वारा स्वीकार की गयी सोव्हिएत ‘स्टाईल’ कम्युनिस्ट राज्यपद्धति पसंद न होनेवाले पूर्व जर्मन नागरिकों ने जब अधिक से अधिक प्रमाण में, बर्लिन के मार्ग से पश्चिम जर्मनी में पलायन करना शुरू किया और जब उनकी तादाद इतनी बढ़ गयी कि उनकी पहली पंचवार्षिक योजना के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक होनेवाला कुशल मनुष्यबल भी उन्हें मिलना बन्द हो गया; तब जाकर कहीं नींद से जागे सोव्हिएत्स ने बर्लिन का, पूर्व तथा पश्चिम बर्लिन में हुआ बँटवारा प्रत्यक्ष रूप में दीवार बाँधकर पक्का कर देने का फ़ैसला किया। शुरुआत में जागतिक समुदाय की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसका अँदाज़ा न होने के कारण ठेंठ दीवार बाँधने का ‘ऑर्डर’ देने में ख्रुश्‍चेव्ह टालमटोल रहा था। शुरू शुरू में केवल बाड़ का निर्माण करने की उसने अनुमति दी। लेकिन उसी दौरान अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष जे. एफ़. केनेडी ने ‘बर्लिन के सोव्हिएत-नियंत्रित भाग में वे क्या करते हैं यह उनका निजी प्रश्‍न है’ ऐसा वक्तव्य किया। संक्षेप में, ‘इस प्रकार का कोई भी कदम सोव्हिएत्स द्वारा उठाया गया, तो अमरिका उसका खुले आम विरोध नहीं करेगी’ ऐसा अमरिका द्वारा दर्शाने के कारण; ख्रुश्‍चेव्ह की हिम्मत बढ़कर उसने इस पक्की दीवार के निर्माण का ‘ऑर्डर’ दिया। लेकिन ऐसा दर्शाने में अमरिका का उद्देश्य यही था कि – सोव्हिएत रशिया यदि ऐसी दीवार का निर्माण बर्लिन के बीच करता है, तो स्वाभाविक रूप में उसका कार्यक्षेत्र पूर्व बर्लिन तक ही सीमित रहेगा, पश्चिम बर्लिन की दिशा में और आगे बढ़कर वह पूरा बर्लिन नहीं निगलेगा। इस कारण उन्होंने उस समय तो इस प्रकार का कदम उठाने के लिए सोव्हिएत्स को उत्तेजन ही दिया। लेकिन बलवानों की इस सहूलियत की राजनीति में बलि चढ़ायी गयी पूर्व बर्लिन के नागरिकों की!

बर्लिन वॉल का निर्माण शुरू करने से पहले पूर्व जर्मनी की सेना ने उस प्रदेश को ‘सील’ किया था।

ख़ैर! १२ अगस्त १९६१ की रात को यह फ़ैसला पूर्व जर्मन सरकार तक पहुँचाया गया और रातोंरात पूर्व-पश्चिम बर्लिन को विभाजित करनेवाली सीमारेखा पर पूर्व जर्मन सेना को तैनात किया गया। पूर्व-पश्चिम बर्लिन को जोड़नेवाली सड़कों का, पूर्व जर्मनी के भीतर का दीवार से सटा भाग उखाड़ दिया गया था और उसमें भी, पूर्व जर्मनी के किसी भी नागरिक ने यदि पश्चिम बर्लिन में भाग जाने की कोशिश की, तो उसे गोली मार देने के आदेश इस सेना को दिये गये थे।

१३ अगस्त की भोर से ही बाड़ के निर्माण की शुरुआत हुई। दीवार की पूर्व की ओर अड़ंगें डाले गये, ‘चेन-फ़ेन्सिंग’ का निर्माण किया गया, बारूद बिछाये गये। सबसे अहम बात यानी ‘नो-मॅन्स लँड’ का निर्माण किया गया, ताकि यदि कोई भागने की कोशिश करें, तो वह तुरन्त नज़र आकर उसे गोली से उड़ा देने में कोई दिक्कत न हों!

यह दीवार बाँधने का मुख्य कारण पूर्व जर्मनी ने यह दिया था कि ‘पूँजीवादी पश्चिमी देशों के अतिक्रमण से पूर्व जर्मनी के समाजवादी वातावरण की रक्षा करने के लिए बाँधी गयी दीवार’। इसके अलावा, पश्चिम बर्लिन में पश्‍चिमी देशों के गुप्तचरों की भरमार यह भी कारण दिया गया। उसी के साथ, पश्चिम बर्लिन के नागरिक हररोज़ नौकरी-व्यवसाय के सिलसिले में पूर्व जर्मनी में आते हैं और केवल पूर्व जर्मनी के लोगों के लिए रियायती दरों के लिए होनेवाले अनाज तथा अन्य वस्तुएँ खरीदकर पश्चिम बर्लिन में ले जाकर बेचते हैं और केवल पूर्व जर्मनी के लोगों के भले के लिए सरकार द्वारा घोषित की गयीं योजनाओं का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं, ऐसा हो-हल्ला भी पूर्व जर्मन सरकार ने मचाया था। यह कालाबाज़ार कुछ हद तक सच भी था। लेकिन केवल इसी कारण के लिए यह दीवार बाँधी गयी, इस बात पर पश्‍चिमी देश तो क्या, पूर्व बर्लिन के लोगों ने भी यक़ीन नहीं किया। क्योंकि वे पूरी तरह जानते थेकि यह दीवार हमें पश्चिम बर्लिन में जाने से रोकने के लिए बाँधी गयी है।

बर्लिन का विभाजन करनेवाली यह दीवार बर्लिन में नहीं, बल्कि मानो बर्लिनवासियों के सीने पर ही बाँधी गयी थी। अब पूर्व या पश्चिम बर्लिन का कोई भी नागरिक एक ही शहर में रहता होने के बावजूद भी दूसरे आधे भाग में बिलकुल जा नहीं सकनेवाला था। शहर के अधिकांश लोगों के कोई न कोई रिश्तेदार दूसरे आधे भाग में रहते ही थे। पूर्व बर्लिन के कइयों की नौकरियाँ पश्चिम बर्लिन में थीं, वे चली गयीं। कई लोगों के धंधे-व्यवसाय शहर के दूसरे आधे भाग में थे, ज़ाहिर है, उनसे रातोंरात हाथ धोना पड़ा।

यह दीवार बाँधी जाने के बाद दोस्तराष्ट्रों की नींद धक्के से खुल गयी और अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष केनेडी ने, ‘बर्लिन ब्लॉकेड’ के दौरान वहाँ पर सफ़लतापूर्वक काम किये हुए ‘ल्युशिअस क्ले’ इस रिटायर्ड़ सेनाअधिकारी को ‘राजदूत’ का दर्जा देकर बर्लिन भेजा। चार देशों में हुए बर्लिनविषयक समझौते के अनुसार पूरे बर्लिन शहर पर चारों देशों का समान रूप में हक़ था और अन्य तीन देशों की सेनाओं को, वे जब चाहें तब सोव्हिएत-नियंत्रित पूर्व जर्मनी से पश्चिम बर्लिन में प्रवेश करने का अधिकार था। यह दीवार यानी दरअसल इस समझौते का भंग ही था। सोव्हिएत्स पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के लिए केनेडी ने इस कलम (मुद्दे) का उपयोग करने का तय किया और दोस्तराष्ट्रों की सेना इस मार्ग से पश्चिम बर्लिन में भेजी और आगे चलकर तीन साल तक हर तीन महीने बाद यह उपक्रम जारी रखा।

इस बर्लिन वॉल की लंबाई आख़िर में तक़रीबन ८७ मील की थी। अगले साल तक अधिक सावधानी बरतने के लिए उसके भीतर ही १०० मीटर पर एक और दीवार का निर्माण किया गया। इनके बीच आनेवाले सारे घर गिराकर उनके निवासियों को रातोंरात अन्यत्र स्थानांतरित किया गया। दोनों दीवारों के बीच के भाग को ‘नो-मॅन्स लँड’ घोषित किया गया। यदि कोई दीवार लाँघकर गया, तो उसके पैरों के निशान मिलें, अहम बात यानी किस अधिकारी से लापरवाही हुई है इसका पता चलें इसलिए वहाँ पर रेती बिछायी गयी। इस बीचवाली १०० मीटर की पट्टी को आगे चलकर ‘डेथ स्ट्रिप’ कहा जाने लगा। मूल दीवार में भी अगले वर्षों में सुधार किये जाकर वह अधिक मज़बूत बनायी गयी। उसीके साथ काँटें होनेवाले तारों का बाड़, बंकर्स, वॉचटॉवर्स, शिकारी कुत्तें, रास्तों पर नुकीलें क़ीलें बिछाना आदि ‘हमेशा के’ उपाय तो किये ही थे!

इस दीवार के बनने से पूर्व जर्मनी का थोड़ाबहुत फ़ायदा हुआ भी। वहाँ के नागरिक पश्चिम बर्लिन में भाग जाने करने का प्रमाण ज़बरन् ही सही, लेकिन लगभग ना के बराबर हुआ। कालाबाज़ार बन्द हो गया। लेकिन लोगों के मन एकदम प्रक्षुब्ध हो चुके थे!