समय की करवट (भाग २३) – युरोपीय महा‘संघ’

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

आज से हम पिछले लेख में बताये गये हेन्री किसिंजर के वक्तव्य के आधार पर दुनिया की गतिविधियों पर थोड़ा ग़ौर करते हैं।

‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक  हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर

अर्थात् साधारणतः १९९० के दशक में किये गये इस वक्तव्य पर ही ग़ौर किया जाये, तो युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप का एकत्रित होना, इसे उसके बाद घटित हुई घटनाओं की पूर्वसूचना कह सकते हैं। इसलिए आज हम उसीसे शुरुआत करते हैं।

युरोप महाद्वीप….पृथ्वी के भूभाग के स्थूल रूप से जो सात प्रमुख भाग बन चुके हैं, उन सप्तमहाद्वीपों में से एक महाद्वीप। पृथ्वी के कुल पृष्ठभाग के महज़ दो प्रतिशत तथा कुल भूभाग के केवल ६.८ प्रतिशत एरिया रहनेवाले इस महाद्वीप में, हज़ारों वर्षों से जो कई विघटन, एकत्रीकरण होते आये हैं, उनके परिणास्वरूप आज के दौर में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग ५० देशों का समावेश है। उनमें रशिया यह एरिया की दृष्टि से सबसे बड़ा महाद्वीपसदृश्य देश है; वहीं, व्हॅटिकन सिटी यह सबसे छोटा देश।

यह महाद्वीप, उत्तर दिशा में आर्क्टिक महासागर, पश्चिम दिशा में अटलांटिक महासागर, दक्षिण दिशा में मेडिटेरियन समुद्र और पूर्व की ओर ब्लॅक समुद्र इनके द्वारा मर्यादित हुआ है। जिस पश्‍चिमी संस्कृति ने आगे चलकर दुनिया को दीवाना बनाया और सारी दुनिया में ही किसी न किसी प्रकार से जिसका अनुकरण किया गया, वह विकसित हुई इसी युरोप महाद्वीप में।

इस महाद्वीप में मानव के बसने के ज्ञात इतिहास की शुरुआत इसापूर्व ४५००० से लेकर इसापूर्व २५००० वर्षों तक के दौर से होती है। आधुनिक मानवी इतिहास की सबसे पुरानी संस्कृतियों में से दो यानी ग्रीक और रोमन संस्कृतियों का उदय हुआ, वह इसी युरोप महाद्वीप में। सैंकड़ों साल ये संस्कृतियाँ यानी कला, साहित्य, काव्य, शास्त्र, गणित, तत्त्वज्ञान, शिक्षण, न्यायशास्त्र, व्यापार इन मामलों में संपन्नता की बुलंदी पर पहुँचकर युरोप की मानो पहचान ही बन गयीं?थीं। आज लगभग सभी क्षेत्रों में प्रचलित रहनेवालीं रूढ़ियाँ, परंपराएँ, नियम इनका उद्गमस्थान कहीं न कहीं तो इन दो संस्कृतियों में है।

गणितीय मूलतत्त्व, भौमितीय मूलतत्त्व, नंबर थिअरी, खगोलशास्त्र जैसे आज सर्वत्र प्रचलित रहनेवाले गणितों एवं शास्त्रों की नींव इन दो संस्कृतियों के पायथॅगोरस, आर्किमिडीज, युक्लिड, हिपोक्रेट्स इन जैसे गणितज्ञों, वैज्ञानिकों, वैद्यकविशेषज्ञों ने की खोजों पर ही आधारित है। इतना ही नहीं, बल्कि उपरोक्त आधुनिक पश्‍चिमी संस्कृति का कुल मिलाकर अधिकांश भाग मूलतः इन दो संस्कृतियों में से ही उद्गमित हुआ है। इन संस्कृतियों में नागरिकों को प्रशासन (अ‍ॅडमिनिस्ट्रेशन) में सहभागी करा लेनेवाले ‘असेंब्ली ऑफ़ सिटिझन्स’ जैसे प्रयोग सफल रूप में किये गये।

ऐसी ये दो संस्कृतियाँ इसापूर्व ७ से ८ वीं सदी में उदयित हुईं और सैंकड़ों साल संपन्नता की बुलंदी पर रहने के बाद, इसवीसन ६ठीं से ७वीं सदी तक या तो सत्तापिपासू, लालची आक्रमकों के हमलों का शिकार बन गयीं या फिर आबादी बढ़ने के कारण जगह की कमी महसूस होने के कारण गृहयुद्धों का शिकार बन गयीं।

अगले कुछ-सौ साल यह आक्रमणों का एवं गृहयुद्धों का दौर गुज़रने के बाद, लगभग १४वीं सदी से आधुनिक विज्ञान की राह पर चलनेवाले युरोप की शुरुआत होती है। प्रायः इसी दौर से; पूर्व की ग्रीक एवं रोमन संस्कृतियों में बुलंदियों को छूतीं हुईं कलाएँ, शास्त्र, विद्याएँ – जो बाद के दौर में लगातार आक्रमणों के कारण लुप्त हो चुकी थीं – उनमें से अच्छी बातों का पुनरुज्जीवन (‘रेनेसन्स’) किये जाने की शुरुआत हुई। लेकिन यह पुनरुज्जीवन होते समय कई प्रचलित, परंतु ग़लत रूढ़ि-धारणाएँ जड़ से हिल गयी थीं। यह रेनेसन्स का कालखंड साधारणतः इसवीसन १४ वीं सदी से लेकर १७ वीं सदी तक माना जाता है। इसी कालखंड में, भविष्य हलचल करानेवाली प्रिंटिंग प्रेस की तकनीक़ की युरोप में खोज की और प्रसारमाध्यम आधुनिक बनने की शुरुआत हुई।

१६वीं सदी तक युरोप में ‘राष्ट्र’ के तौर पर सुस्थिर हुए इंग्लैंड़, फ्रान्स, पोर्तुगाल, स्पेन, कोलंबिया आदि देशों ने अब युरोप के बाहर के नये नये इलाक़ों पर कब्ज़ा करने की मुहिमों की शुरुआत की। इसवीसन १४९२ में कोलंबस द्वारा अमरीका की (‘न्यू वर्ल्ड’) खोज की जाने पर वहाँ की प्रचंड साधनसंपत्ति, ख़ासकर सोने की खानों का लालच युरोपियनों को होने लगा और अगले सौ-डेढ़सौ वर्षों में युरोपियन लोगों के झुँड़ जहाज़ भरभरकर अमरीका के पूर्व किनारे पर उतरने लगे। उन्होंने आधुनिक विज्ञान के साथ संबंध न रहनेवाले, अर्थात् किसी भी प्रकार के आधुनिक शस्त्र-अस्त्र, संरक्षणयंत्रणा पास न रहनेवाले, अमरीका के मूल निवासियों को अपना गुलाम बनाया और आधुनिक शस्त्र-अस्त्रों के बल पर वे उनपर राज करने लगे। अब वहाँ से आनेवाली बेशुमार साधनसंपत्ति और उसीके साथ औद्योगिक क्रांति इनके कारण ब्रिटन जल्द ही दुनिया की पहले नंबर की महासत्ता बना।

बाक़ी इंग्लैंड़ के साथ साथ, अन्य युरोपीय देश अफ्रिका एवं एशिया महाद्वीपों के दीनदुर्बल, सुरक्षाहीन लोगों को येनकेनप्रकारेण अपना ग़ुलाम बनाकर उपनिवेशों के रूप में साम्राज्यविस्तार करने लगे ही थे।

उसी दौरान १८वीं सदी में अमरिकी राज्यक्रांति ने ब्रिटीशों की सत्ता अपने कंधेसे उतारकर, अपने उपर रहनेवाला ‘ब्रिटीश उपनिवेश’ यह स्टँप मिटा दिया और स्वतंत्र देश के रूप में मार्गक्रमणा शुरू की। १८वीं सदी के अन्त में फ्रेंच राज्यक्रांति होकर, वहाँ के ज़ुल्मी और ऐशोआराम में मशगूल रहनेवाले राजघराने का त़ख्ता वहाँ की जनता ने पलट दिया और जनतंत्र लाने की दिशा में मार्गक्रमणा शुरू की। १९ वीं सदी के उत्तरार्ध से रशिया में भी क्रांति की नयीं हवाएँ बहना शुरू हो ही चुका था।

१९वीं सदी तक युरोप के अधिकांश देशों में राजसत्ताएँ या तो ख़त्म हुईं थीं या फिर केवल नामधारी शेष बची थी और वहाँ पर किसी न किसी प्रकार के जनतंत्र का स्वरूप उदयित हुआ था। लेकिन युरोप के बाहर रहनेवाले अपने उपनिवेशों में ये देश जनतंत्र का नाम भी नहीं लेते थे, वहाँ पर सामंतशाही (फ्युडलिझम) जैसा बर्ताव कर, वहाँ के लोगों को गुलामों की तरह रखते थे। १९वीं सदी के अन्त तक ऐसे कई देशों में स्वतंत्रतासंग्राम शुरू हो चुके थे।

हेन्री किसिंजर
२०वीं सदी ने जिन दो महाभयानक विश्‍वयुद्धों को देखा, वे प्रायः ‘युरोप-सेन्ट्रिक’ होने के कारण उसकी आँच ज़्यादा से ज़्यादा युरोप के लोगों को महसूस हुई। दूसरे विश्‍वयुद्ध के अंत तक युरोप के कई देश कंगाल हो गये। इस दूसरे विश्‍वयुद्ध से युरोपियन देश सबक सीखे ही थे। ऐसा कुछ तो करना चाहिए, जिससे कि युरोपियन देशों में युद्ध ही न हों, इस दिशा में उनका विचार शुरू हुआ। युरोपीय महा‘संघ’ की संकल्पना एक निश्‍चित आकार धारण करने लगी थी!

२०वीं सदी ने जिन दो महाभयानक विश्‍वयुद्धों को देखा, वे प्रायः ‘युरोप-सेन्ट्रिक’ होने के कारण उसकी आँच ज़्यादा से ज़्यादा युरोप के लोगों को महसूस हुई। दूसरे विश्‍वयुद्ध के अंत तक युरोप के कई देश कंगाल हो गये।

अहम बात यह थी कि दूसरा विश्‍वयुद्ध हालाँकि ब्रिटन और दोस्तराष्ट्रों ने जीता, मग़र फ़िर भी उन्हें उसकी ऐसी ज़बरदस्त क़ीमत चुकानी पड़ी की अल्प अवधि में ही उनके ‘सूरज कभी भी न ढलनेवाले’ साम्राज्य का मानो दीवाला ही निकल गया और उनकी गुलामी में रहनेवाले भारत जैसे कई देश कड़ा संग्राम करके आज़ाद हुए।

इस दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद, ‘दुनिया का औद्योगिक नेता’ इस स्थान पर से युरोप महाद्वीप पदच्युत हुआ और उसका स्थान अमरीका ने लिया।

इस दूसरे विश्‍वयुद्ध से युरोपियन देश सबक सीखे ही थे। आत्यंतिक वंशाभिमान हमें किस हालत में ले आया है, इसका खेद कई देशों के विचारवंतों को होने ही लगा था। ऐसा कुछ तो करना चाहिए, जिससे कि युरोपियन देशों में युद्ध ही न हों, इस दिशा में उनका विचार शुरू हुआ।

युरोपीय महा‘संघ’ की संकल्पना एक निश्‍चित आकार धारण करने लगी थी!