समय की करवट (भाग ५८) – कोल्ड़ वॉर की अगली चाल – कोरियन युद्ध

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद, ख़ासकर युरोप में तेज़ी से बढ़ रहे सोव्हिएत प्रभाव पर रोक लगाने के लिए अमरीका ने अपनी, कम्युनिझम को जहाँ हो सके वहाँ विरोध करने की ‘कन्टेनमेंट पॉलिसी’ पर अधिक ही भारी मात्रा में अमल किया।

अमरिकी राजनीतिज्ञ जॉर्ज केनन ने मॉस्को से भेजे ‘लाँग टेलिग्राम’ के कारण शुरू हुई विचारप्रक्रिया को निश्चित आकार दिया, तत्कालीन अमरिकी अध्यक्ष हेरी ट्रुमन ने। ट्रुमन के प्रयासों से आकार धारण की यह नीति ‘ट्रुमन डॉक्ट्रिन’ के नाम से जानी जाती है और उसपर अमल करने के लिए जो खर्च का प्लॅन मंज़ूर हुआ, उसे ‘मार्शल प्लॅन’ के नाम से जाना जाता है। इसमें ऊपरि तौर पर, दूसरे विश्‍वयुद्ध की आग में झुलसे हुए राष्ट्रों के पुनर्निर्माण हेतु अर्थसहायता दी जाती थी, लेकिन इसका मूल उद्देश ‘ईस्टर्न ब्लॉक’(सोव्हिएत प्रभाव में होनेवाले पूर्व युरोपीय देश) का आकार न बढ़ें, यह था। इसी दौरान ट्रुमन के ही शासनकाल में अस्तित्व में आयी ‘सी.आय.ए.’ इस अमरिकी गुप्तचरसंस्था के ज़रिये इस तरह के कई व्यवहार होते थे। पूरी दुनियाभर में इस ‘ट्रुमन डॉक्ट्रिन’ पर अमल करते हुए, इस सी.आय.ए. ने दुनियाभर में जो क्रियाकलाप किये, उससे वह हमेशा चर्चा में रही।

सन १९४९ में सोव्हिएत रशिया ने परमाणुबम का टेस्ट कर परमाणुबम के विषय में होनेवाली अमरीका की ‘मोनोपली’ को ख़त्म किया। इसी दौरान चीन ने, अमरीका के बलबूते पर खड़ी कै शेक चँग के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय सरकार को ख़त्म कर कम्युनिस्ट राज्यप्रणाली का स्वीकार किया।

इन बदलती घटनाओं ने ट्रुमन अपनी नीतियों का सिंहावलोकन करने पर मजबूर हो गया। ‘कन्टेनमेंट पॉलिसी’ के तहत, लष्करी साधनों की अपेक्षा राजकीय साधनों पर (यानी अर्थसहायता आदि कर देशों को अपने पक्ष में कर लेना इन जैसी बातों पर) अधिक ज़ोर दिया गया था। लेकिन अब बदलते हालातों में इस ‘कन्टेनमेंट पॉलिसी’ का विस्तार कर, उसमें केवल राजनीतिक साधनों तक सीमित न रहते हुए लष्करी विकल्पों का भी इस्तेमाल कर इस नीति को अधिक तेज़तर्रार बनाना ट्रुमन को आवश्यक प्रतीत होने लगा।

इसके लिए उसने अमरिकी गृहमंत्रालय के द्वारा एक ‘रिव्ह्यू रिपोर्ट’ मँगवाया। यह रिपोर्ट ‘एनएससी-६८’ के नाम से जाना जाता है। इसमें यह दृढ़तापूर्वक जताया गया था कि ‘अब समय आ गया है कि अमरीका दुनिया को अधिक निर्णायक रूप में अपनी महत्ता दिखायें। उसके लिए – ‘पश्चिम गोलार्ध की (=अमरीका की) सुरक्षा करना और सोव्हिएत ने दुनियाभर में जगह जगह युद्धखोरी को बढ़ावा देनेवाले जो कारनामें चलाये हैं उन्हें कुचल देना’ यह लक्ष्य निर्धारित किया गया था और इस लक्ष्य में अमरीका का साथ देनेवाले देशों को आर्थिक, लष्करी एवं अन्य सभी प्रकार की सहायता देने की ज़रूरत प्रतिपादित की गयी थी। इस लक्ष्य को साध्य करने के लिए शान्ति के दौर में भी अमरीका को लगातार अपने लष्करी सामर्थ्य को बढ़ाते रहने ज़रूरी है, यह भी प्रतिपादित किया था।

अमरिकी सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों को यह रिपोर्ट जँचा नहीं था और वह रिपोर्ट केवल सोव्हिएत का हौआ खड़ा करके ‘कोल्ड वॉर’ को भड़काने का काम कर रहा है, ऐसा मत ‘विलियर्ड थॉर्प’ जैसे वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने व्यक्त किया था।

ट्रुमन खुद भी लष्करी खर्चे में कटौती करने के पक्ष में था। उसने भी इस रिपोर्ट को चर्चा के लिए विभिन्न समितियों के पास भेजा।
लेकिन उतने में एक ऐसी घटना हुई, जिससे अमरीका की अगली रणनीति की नींव नये से डाली गयी।

समय की करवट, अध्ययन, युरोपीय महासंघ, विघटन की प्रक्रिया, महासत्ता, युरोप, भारतसमय की करवट, अध्ययन, युरोपीय महासंघ, विघटन की प्रक्रिया, महासत्ता, युरोप, भारतउत्तर कोरिया से ‘अपराध’ हो गया और उनकी सेना ने ‘थर्टिएट्थ नॉर्थ पॅरॅलल’ – ३८वें अक्षवृत्त का उल्लंघन किया! यह ३८वाँ अक्षवृत्त, उत्तर तथा दक्षिण कोरिया का विभाजन करनेवाले अक्षवृत्त के तौर पर आंतरराष्ट्रीय मान्यताप्राप्त है।

इस ‘थर्टिएट्थ पॅरॅलल नॉर्थ’ की कहानी कुछ और ही है। इस ३८वें अक्षवृत्त को उत्तर एवं दक्षिण कोरिया को विभाजित करनेवाली रेखा के रूप में सन १८९६ में मान्यता मिली। उससे पहले जापान ने संपूर्ण अविभाजित कोरिया पर कब्ज़ा किया था और इसके लिए जापान ने अँग्रेज़ों से मान्यता भी प्राप्त करा ली थी। जापान के हाथों से कोरिया का नियंत्रण हथियाने के लिए रशिया जानतोड़ कोशीश कर रहा था।

भविष्य में इसको लेकर कुछ बखेड़ा खड़ा न हो जायें इसके लिए जापान ने ही रशिया को यह सुझाव दिया कि कोरिया का उत्तर और दक्षिण ऐसे दो भागों में विभाजय किया जाये; और फिर उसके अनुसार दोनों देशों ने कोरिया पर आधा-आधा कब कर लिया। आगे चलकर दूसरे विश्‍वयुद्ध में जापान ने शरणागति का स्वीकार करने के बाद हुई चर्चाबैठक में कोरिया का मसला सामने आया। उस समय यह तय किया गया कि इस ‘थर्टिएट्थ पॅरॅलल नॉर्थ’ का बारिक़ी से पालन कर उत्तर और दक्षिण कोरिया ऐसे दो देशों का निर्माण किया जायें। सोव्हिएत रशिया के प्रभाव में होनेवाले उत्तर कोरिया ने कम्युनिस्ट शासनप्रणाली को अपनाया और अमरिकी प्रभाव में होनेवाले दक्षिण कोरिया ने पूँजीवादी शासनप्रणाली का स्वीकार किया और दोनों के बीच की साँप-नेवले की सख्यता यह हमेशा स्फोटक मसला रहा।

इसी कारण…. जब उत्तर कोरिया से यह ‘थर्टिएट्थ पॅरॅलल नॉर्थ’ का उल्लंघन करने का अपराध हुआ, तब अमेरिका ने इसमें ‘जाती तौर पर’ ध्यान देने का तय हुआ। ट्रुमन ने ‘एनएससी-६८’ में बताये गये निष्कर्षों का स्वीकार करते हुए, मार्शल प्लॅन की निधि बढ़ाई और रक्षाखर्च में चौगुना बढ़ोतरी की।

इसी में से ‘पुराना हिसाब’ चुकता करने के लिए ‘लड़ाया गया’ – कोरियन युद्ध!