समय की करवट (भाग ४६) – श्रमजीवियों की सरकार

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

आधुनिक मानवी इतिहास में रशियन राज्यक्रांति यह वैसे तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना है। उसके कई पहलू हैं, जिन सभी को इस लेखमाला में समाविष्ट नहीं किया जा सकता। उसका महज़ सारांश यहाँ पर प्रस्तुत किया गया है। लेकिन उसे भी इतने विस्तार से हम लोग देख रहे हैं उसका कारण भी पुनः वही है। आज़ाद भारत में जन्मी हमारी पीढ़ी को परतंत्रता का दुख क्या होता है, यह पता नहीं है और ना ही यह आज़ादी पाने के लिए हमारी पीढ़ी ने कोई क़ीमत अदा की है। इस कारण हम स्वतंत्रता की अहमियत को नहीं जानते। जर्मन लोगों ने और रशियन लोगों ने आज़ादी पाने के लिए और अभिव्यक्तीस्वतंत्रता के लिए जो क़ीमत अदा की है, उसे देखकर तो हम चौकन्ना होना चाहिए। यह सच है कि हमारी पीढ़ी ने हमारे देश के स्वतंत्रतासंग्राम में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन कम से कम देश को पुनः परतंत्रता की दिशा में धकेलने में तो हमारा हिस्सा न हों, इतने एहतियाद ही यदि हममें से हर एक बरतें, तो भी काफ़ी है। ख़ैर!

अक्तूबर १९१७ की रशियन राज्यक्रांति के बाद रशिया में हालाँकि स्थापितों की सत्ता का त़ख्ता पलट गया, मग़र फिर भी संकल्पित श्रमजीवियों की पहली सरकार कोई सहजता से नहीं बनी, क्योंकि सत्ता से च्युत किये गये स्थापित शान्त नहीं बैठे थे। फिर स्थापितों की ‘व्हाईट आर्मी’ और लेनिन के नेतृत्व में होनेवाली बोल्शेविकों की ‘रेड आर्मी’ इन दोनों में सत्तासंपादन के लिए घमासान लड़ाई हुई, जिसे ‘रशियन सिव्हिल वॉर’ कहा जाता है। लगभग ४ साल चले इस सिव्हिल वॉर के बाद ही, तक़रीबन डेढ़ करोड़ रशियनों की जानें लेकर और अरबों रुबल्स को मिट्टी में मिलाने के बाद ही सोव्हिएत संघराज्य बनने का मार्ग खुल गया था।

इस लड़ाई से सोव्हिएत ने महत्त्वपूर्ण सबक यह सीखा कि विरोध उत्पन्न होने के बाद उससे लड़ते रहने के बजाय, विरोध को उत्पन्न होने ही न देना बेहतर है; और अगले लगभग पच्चास साल उन्होंने इसी एक तत्त्व के तहत सोव्हिएत रशिया पर फ़ौलादी पंजे से – एकाधिकारशाही से राज किया। लेकिन यहाँ पर यह एकाधिकारशाही किसी व्यक्ति की न होकर, यह व्यक्ति जिस पक्ष का नेतृत्व कर रही थी, उस पक्ष की थी। लेकिन प्रचारप्रसार की दृष्टि से, यह पक्ष जिन विचारों का समर्थन करता है उन विचारों की यह विजय है, ऐसे रंग में उसे रंग दिया गया।

साथ ही, इस प्रकार की एकाधिकारशाही में हालाँकि थोड़ाबहुत ज़ुल्म-ज़बरदस्ती का अंश था, मग़र फिर भी मुख्य तौर पर प्रसार-प्रचारतंत्र से लोगों का बुद्धिभेद (ब्रेनवॉशिंग) करके एकाधिकारशाही थोंप दी गयी। यानी पूँजीवाद को ‘व्हिलन’ संबोधित करके, वैसी अर्थव्यवस्था की कमियाँ या अलाभ ही हमेशा रशियन लोगों के सामने प्रस्तुत किये गये। हर नयी पीढ़ी इसी प्रकार से ‘प्रोग्रॅम्ड’ की गयी। इस कारण, एकाधिकारशाही थोंपते समय कुछ गिनेचुने अपवादों (एक्सेप्शन्स) को छोड़कर, उनपर ज़ुल्म-ज़बरदस्ती करने का प्रसंग ही कभी आया नहीं; और यदि कभी कभार ऐसी ज़ुल्म-जबरदस्ती करने की नौबत आ ही गयी, तो भी कम्युनिस्ट शासन के दौरान रशिया के प्रसारमाध्यमों (मीड़िया) पर कड़ी सेन्सॉरशिप जारी होने के कारण ऐसी बातें प्रायः बाहर मालूम नहीं पड़तीं थीं।

साथ ही, ‘वॉर कम्युनिझम’ की नीति अपनाकर बोल्शेविकों ने सारी सत्ता अपने ही हाथ में रखी थी। इसमें हालाँकि पूरी रशियन अर्थव्यवस्था डाँवाडोल हो गयी थी, मग़र फिर भी जो कुछ भी उत्पादन हो रहा था, वह प्राथमिकता से रेड आर्मी के सैनिक एवं श्रमजीवी मज़दूरों के लिए रखा जाता और उसमें से जो बच जाता था, वही अन्य लोगों को दिया जाता। इस अनाज का भी रेशनिंग किया जाता था। साथ ही, निजी (प्राइवेट) उद्योगधंधे सरकार ने ग़ैरक़ानूनी क़रार दिये ही थे।

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क्रॉन्स्टड्ट में हुई बग़ावत
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क्रॉन्स्टड्ट में नाविकों की बग़ावत के बाद बंदरगाह में ही रखे गये जहाज़

चार साल का सिव्हिल वॉर इस प्रकार कुचल देने के बाद और युद्धपरिस्थिति के कारण अकालसदृश्य हालात उद्भवित हो चुके रशिया के लोगों की प्रतिकारशक्ति कमज़ोर कर देने के बाद लेनिन रशिया का सर्वेसर्वा बना। लेकिन सन १९१४ के बाद निरन्तर युद्धपरिस्थिति और उसके कारण आये ग़रीबी के हालात इनका लगातार मुक़ाबला कर रही रशियन जनता के ग़ुस्से का उसे सामना करना पड़ा। सन १९२१ में फ़िनलंड के समुद्र में रशिया की मालिक़ियत होनेवाले ‘क्रॉन्स्टॅड्ट’ बंदरगाह पर के नाविकों ने बग़ावत का ऐलान किया। ‘सोव्हिएत चाहिए, लेकिन उनकी कम्युनिस्ट विचारधारा नहीं चाहिए’ इस संकल्पना को केंद्र में रखकर यह बग़ावत की गयी थी। साथ ही, अभिव्यक्तीस्वतंत्रता, समूह में एकत्रित होने की स्वतंत्रता, राजनीतिक कैदियों की रिहाई और ‘किसान अपना सारा अनाज केवल सरकार को ही बेचें’ इस नीति का विरोध ये इस बग़ावत के मुख्य मुद्दे थे।

हालाँकि लगभग सालभर की कार्रवाई से पुनः ट्रॉट्स्की के नेतृत्व में ही यह बग़ावत कुचल दी गयी, लेकिन आख़िरकार इसमें से सोव्हिएत नेतृत्व ने यह सीख ली कि अब यदि विकास के कदम जल्द ही नहीं उठाये, तो ऐसीं बग़ावतें इसी तरह चालू रहेंगी। उस दौर में रशिया से सटे देशों में एकाधिकारशाही सत्ताएँ हासिल कर रहीं थीं, लेकिन जैसा कि लेनिन, ट्रॉट्स्की आदि सोच रहे थे, वैसी किसी भी पूँजीवादी देश में उनके जैसी कम्युनिस्ट क्रान्ति वगैरा नहीं हुई। अतः यह दुनिया के ‘समाजवादीकरण’ का बोझ अब हम अकेले को ही उठाना पड़नेवाला है, यह रशियन नेतृत्व की समझ में आया था; और यदि हमारी क्रान्ति को बरक़रार रखना है, तो खौले हुए लोगों को जल्द से जल्द शान्त करना पड़ेगा, इस बात का उन्हें यक़ीन हो गया। लेकिन उसके लिए लोगों को मर्यादित व्यक्तिगत स्वतंत्रता देना अनिवार्य था।

उसके लिए सोव्हिएत रशिया में ‘न्यू इकॉनॉमिक पॉलिसी’(एनईपी) की शुरुआत की गयी।