समय की करवट (भाग ६०) – ‘कोल्ड़ वॉर इन ऑटो मोड़’

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
—————————————————————————————————————————————————
‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
—————————————————————————————————————————————————

इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

२५ जून १९५० को उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया की सीमा में अपनी सेना घुसायी और कोरियन युद्ध शुरू हुआ। वैसे देखा जाये, तो दुनिया के नक़्शे पर के ये दो ‘नन्हे से’ देश – उत्तर एवं दक्षिण कोरिया….उनके बीच के संघर्ष को भला दुनिया क्यों इतनी अहमियत दे रही थी?

दो तानाशाहों की विस्तारवादी वृत्तियों के बीच के संघर्ष में से इस युद्ध का जन्म हुआ और ये दो तानाशाह ये मूलतः ही सैद्धान्तिक विरोध (‘आयडिओलॉजिकल कॉन्फ्लिक्ट’) होनेवालीं दुनिया की दो प्रमुख महासत्ताओं की पनाह में होनेवाले तानाशाह थे। इस कारण उनके बीच के संघर्ष को उन दो महासत्ताओं ने ‘अपना’ माना। दूसरे को किसी भी बात में हावी नहीं होने देना है, लेकिन हमें जहाँ मुमक़िन हो वहाँ उसे मात देनी है, इस ‘कोल्ड वॉर’ की मूलभूत प्रेरणा में से ‘कोरियन वॉर’ भड़कता गया – वह महज़ दो कोरियाओं के बीच का युद्ध नहीं रहा, बल्कि अमरीका और सोव्हिएत रशिया के बीच के ‘कोल्ड वॉर’ का वह एक ‘एपिसोड’ बना। प्रदीर्घ समय तक चला ‘कोल्ड वॉर’ जिन थोड़ी घटनाओं से ‘भड़क उठा’ और उसकी दाहकता दुनिया को विशेष रूप से महसूस हुई, उनमें से एक उदाहरण है ‘कोरियन वॉर’!

उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर आक्रमण कर हफ़्तेभर में ही दक्षिण कोरियन सेना को और भी दक्षिण की ओर खदेड़ते हुए अधिकांश दक्षिण कोरिया पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।

उत्तर कोरियन हुकूमशाह किम-टू-संग यह सोव्हिएतपरस्त होने के कारण, उसने किये हुए आक्रमण को ‘सोव्हिएत का विस्तारवाद’ क़रार देकर अमरीका ने उसे रोकने के लिए वहाँ संयुक्त सैनिकी कार्रवाई करने का फ़ैसला किया और सुरक्षापरिषद में होनेवाली सोव्हिएत की तात्कालिक अनुपस्थिति में वैसा प्रस्ताव युनो द्वारा मंज़ूर भी करी लिया था। इस लगभग तीन लाख की संयुक्त सेना में स्वाभाविक रूप में अमरिकी सेना सर्वाधिक यानी ढ़ाई लाख से भी अधिक होनेवाली थी। बाक़ी की सेना यानी केवल यह कार्रवाई ‘आंतर्राष्ट्रीय’ प्रतीत हों इसलिए ब्रिटन, कॅनडा, टर्की, फ़्रान्स, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, इथियोपिया, नेदरलँड्स, फ़िलिपाईन्स थायलंड जैसे अन्य दोस्तराष्ट्रों की सेना से की हुई भर्ती थी।

दूसरे विश्‍वयुद्ध में अमरीका ने जीत लिये जापान की प्रशासकीय व्यवस्था देखने के लिए जापान में रखी गयीं दोस्त राष्ट्रों की सेनाओं से यह भर्ती की गयी थी। इससे पहले कि यह सेना एकत्रित होकर कोरिया तक पहुँच पायें, उत्तर कोरियन फ़ौज़ों ने दक्षिण कोरियन सेनाओं को दक्षिण कोरिया की बिलकुल दक्षिणी छोर तक पीछे खदेड़ दिया था। अब दक्षिण कोरियन सेना केवल पुसान प्रांत तक सीमित होकर रही थी और ‘अब कभी भी यह उत्तर कोरियन फ़ौज़ पुसान में घुसकर हमें मार देगी’ इस डर के साये में थी।

इस कारण अमरिकी सेना के प्रमुख जनरल मॅकआर्थर ने एक अलग ही चाल चलने का तय किया। उसने दक्षिण कोरिया की राजधानी सेऊल के पास के इंचॉन में से (यानी दक्षिण में पुसान तक भीतर घुसी उत्तर कोरियन सेना के पीछे से) दक्षिण कोरिया में प्रवेश किया और उस उत्तर कोरियन सेना की पीछे से घेराबंदी की और पीछे से उनपर हमला किया।

अब इस नये जोशवाली सेना के शिकंजे में फ़ॅंसी उत्तर कोरियन सेना ने धीरे धीरे पीछे हटना शुरू किया। तक़रीबन सव्वा लाख उत्तर कोरियन सेना अमरिकी सेना के कब्ज़े में बतौर युद्धबंधक आयी। सन १९५० के ख्रिसमस तक युद्ध समाप्त कर मैं अपने देश में लौटूँगा, ऐसी डींगें हाँकनेवाले मॅकआर्थर ने बचीकुची उत्तर कोरियन सेना को पुनः उत्तर की दिशा में खदेड़ दिया।

७ अक्तूबर को मॅकआर्थर की सेना ने ‘थर्टिएट्थ पॅरॅलल नॉर्थ’ यह उत्तर-दक्षिण कोरिया के बीच की सीमारेषा को लाँघकर उत्तर कोरिया में प्रवेश किया और उत्तर कोरियन सेना को और उत्तरी छोर तक धकेलते हुए लगभग सारे उत्तर कोरिया पर कब्ज़ा किया।

लेकिन यह करते हुए वह उत्तर कोरिया की उत्तरी दिशा में होनेवाले चीन की सीमारेखा के नज़दीक पहुँच गया।

इसीका हौआ खड़ा कर चीन इस पड़ाव पर अमरिकी सेना के विरोध में इस युद्ध में उतरा।

२५ नवंबर को चीन ने अपनी लगभग दो लाख सेना इस युद्ध में उतरवायी। उनके हाथ में सोव्हिएत रशिया द्वारा आपूर्ति की गये अत्याधुनिक शस्त्र और मन में अमरीका के खिला़फ़ खौलता तीव्र विद्वेष था। इस सेना ने ‘ह्यूमन-वेव्ह टेक्निक’ (भारी संख्या में सैनिकों को उतरवाकर असमंजसता की स्थिति पैदा करके दुश्मन को हराने का टेक्निक) का इस्तेमाल कर अमरिकी सेना को पुनः दक्षिण की ओर खदेड़ने की शुरुआत की। ३१ दिसंबर को और पाँच लाख सैनिक इस युद्ध में उतरवाकर मॅकआर्थर की सेना को उत्तर-दक्षिण कोरिया की सीमारेखा के पास खदेड़कर दक्षिण कोरिया में प्रवेश किया।

चीन का पल्ड़ा ऐसे भारी हो रहा था कि तभी अमरीका ने और सेना वहाँ पर भेजी। इस सेना के साथ बाँबर्स जैसे अत्याधुनिक शस्त्रास्त्र भेजे गये थे। इस सेना ने पुनः चिनी सेना को ‘थर्टिएट्थ पॅरॅलल नॉर्थ’ तक खदेड़कर सन १९५१ के मार्च तक दक्षिण कोरिया पर पुनः नियंत्रण प्राप्त किया।

इस पड़ाव पर इस युद्ध की बढ़ती भीषणता का एहसास होकर अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष ट्रूमन ने मॅकआर्थर को युद्ध रोकने के आदेश दिये और इस आदेश की ज़ाहिर आलोचना करने के कारण मॅकआर्थर को सस्पेंड़ भी किया गया।

ऐसे दोनो सेनाओं द्वारा एक-दूसरे को आगे-पीछे खदेड़ देने में १९५३ साल शुरू हुआ।

इस पड़ाव पर अमरीका और सोव्हिएत रशिया में राजनीतिक दृष्टि से सर्वोच्च महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो गये। अमरीका के चुनावों में ट्रूमन की हार होकर, उसके स्थान पर आयसेनहॉवर अमरीका के राष्ट्राध्यक्ष बन गये; वहीं, सोव्हिएत रशिया में स्टॅलिन की मृत्यु होकर, निकिता ख्रुश्‍चेव्ह सोव्हिएत पार्टी के सेक्रेटरी (अर्थात् सर्वेसर्वा) बन गये।

आयसेनहॉवर ने, युद्ध न रोकने पर ऐटमबम का इस्तेमाल करने की धमकी चीन को दी। चीन ने २७ जुलाई १९५३ को युद्धबंदी के समझौते पर हस्ताक्षर किये। आयसेनहॉवर ये अमरीका के ‘टॉप टेन’ राष्ट्राध्यक्षों में से एक माने जाते हैं।

लगभग एक करोड़ लोगों की बलि लेकर ही यह युद्ध थम गया।

लेकिन ‘कोल्ड वॉर’….? ‘कोल्ड वॉर’ की शुरुआत करनेवाले ट्रूमन और स्टॅलिन तो सत्ता में नहीं थे। लेकिन अब मानवी खून का चस्का लगा हुए इस ‘कोल्डवॉर’ को जारी रखने के लिए किसी की भी ज़रूरत नहीं थी…वह ‘ऑटो मोड’ में चला गया था!