समय की करवट (भाग ३०)- ‘युरोपियन युनियन’ २१वीं सदी की ओर….

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।
इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’

हेन्री किसिंजर

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आखिरक़ार सन १९९३ में अधिकृत रूप में युरोपीय महासंघ (‘युरोपियन युनियन’) का निर्माण हो ही गया। लगभग ४० सालों की उसकी निर्माणप्रक्रिया में उसने कई स्थित्यंतरों का अनुभव किया। ‘युरोपियन कोल अँड स्टील कम्युनिटी’ से ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ से ‘युरोपियन युनियन’ तक!

दो विश्‍वयुद्धों में से होकर गुज़रे युरोप पर एक और संभाव्य युद्ध टालने हेतु, युरोपीय देशों में कोयला और स्टील इन क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की दृष्टि से पहली संस्था का निर्माण किया गया था। वह संकल्पना बेहद सफल हो जाने के बाद अब उसे अधिक व्यापक रूप में पूरे आर्थिक क्षेत्र के लिए उपयोग में लाना तय किया गया और फिर दूसरे संगठन का जन्म हुआ।

पहला संगठन ६ देशों ने एकसाथ आकर स्थापन किया था। इस प्रवास में यह सदस्यसंख्या अब १९८० के दशक की आख़िर तक बढ़कर १२ तक पहुँच गयी थी। इस ध्रुवीकरण की प्रक्रिया ने अधिक रफ़्तार पकड़ी, वह सन १९८९-९० के दोनों जर्मनियों के एकत्रीकरण से और ख़ासकर सन १९९०-९१ के सोव्हिएत युनियन के विघटन से। सोव्हिएत युनियन के विघटन से पूर्व युरोप के कई छोटे छोटे राष्ट्र आज़ाद हो गये। वे केवल आज़ाद ही नहीं हुए, बल्कि उनमें से कइयों ने कम्युनिझम का त्याग कर जनतंत्र का मार्ग अपनाया।

सोव्हिएत युनियन के विघटन से पूर्व युरोप स्थित बल्गेरिया, झेक रिपब्लिक, हंगेरी, पोलंड, रोमानिया, स्लोव्हाकिया ऐसे कई राष्ट्रों पर होनेवाला कम्युनिझम का प्रभाव ख़त्म हो गया और उन्होंने भी युरोपीय महासंघ का दरवाज़ा खटखटाना शुरू किया। उसीके साथ पहले सोव्हिएत युनियन में समाविष्ट रहनेवाले इस्टोनिया, लॅटव्हिया और लिथुआनिया; साथ ही, पहले के युगोस्लॉव्हिया का एक रिपब्लिक स्लॉव्हेनिया और  सायप्रस एवं माल्टा ये ‘मेडिटेरिअन’ देश; इन्होंने भी ‘ईयू’ का सदस्य बनने के लिए आवेदनपत्र दिया।

‘ईयू’ की सदस्यसंख्या बढ़ने की दृष्टि से ये घटनाएँ तो महत्त्वपूर्ण साबित हो ही गयीं; लेकिन सोव्हिएत युनियन के विघटन के बाद हालाँकि ‘कोल्ड वॉर’ ख़त्म हो चुका था, मग़र फिर भी अब सारी दुनिया में अमरिकी अर्थव्यवस्था की मानो मोनोपॉली ही स्थापित हुई। ‘ग्लोबलायझेशन’ की आड़ में से अमरीका इस ‘आर्थिक महासत्ता’ का असली चेहरा धीरे धीरे लोगों को ज्ञात होने लगा। ऐसी ताकतवर अमरीका के आर्थिक साम्राज्य को मात देनी है, तो अपनी अर्थव्यवस्था भी उसके टक्कर की होनी चाहिए और यह कोई एकाद-दो राष्ट्रों का काम ही नहीं है। उसके लिए एकत्रित होकर आपसी सहयोग से ही काम करना चाहिए, इस एहसास से – एक ‘महादेश’ बनने की इच्छा पर सवार हुए युरोपीय देशों ने अपने अपने राष्ट्रीय हितसंबंधों का खयाल रखते हुए भी, ये हितसंबंध इस प्रक्रिया के कम से कम आड़े आयेंगे इसकी ओर ध्यान दिया। उदाहरण के तौर पर, युरोपीय महासंघ के संसद सदस्यों का, उस उस देश की जनता – देशांतर्गत चुनावों की तरह ही – ठेंठ चुनाव करती है। ये सदस्य संसद का कामकाज चालू रहते समय उनका सीटिंग अ‍ॅरेंजमेंट भी देशनिहाय न होते हुए ‘ब्लॉक’निहाय होता है। अर्थात् उदा. सोशालिस्ट विचारधारा रहनेवाली पार्टियाँ किसी न किसी रूप में लगभग हर एक देश में ही होती हैं। इस कारण हर एक देश की सोशालिस्ट पार्टी के कोई न कोई सदस्य युरोपीय संसद में होते ही हैं। इसीके साथ, उस देश की भिन्न विचारधारा होनेवालीं पार्टियों के सदस्य भी वहाँ हो सकते हैं। अब मान लो, किसी देश को उसकी जनसंख्या के अनुपात में १० सदस्य चुनकर इस संसद में भेजने की अनुमति है। इस एक ही देश के 10 सदस्यों में से मान लो ४ सदस्य सोशालिस्ट विचारधारा होनेवाली पार्टी के और अन्य ६ लोग किसी दूसरी विचारधारा रहनेवालीं पार्टियों के हैं। लेकिन युरोपीय संसद में कामकाज के लिए बैठते समय ये १० सदस्य देशनिहाय एकसाथ नहीं बैठेंगे; बल्कि सर्व देशों की ‘सोशालिस्ट’ विचारधारा होनेवाली पार्टियों के सदस्य एक गुट के रूप में बैठते हैं। वही बात भिन्न विचारधारा रहनेवाली पार्टियों की। समान विचारधारा होनेवाली पार्टियों के सदस्य अपने अपने देश के अनुसार गुट न बनाते हुए, उस समान विचारधारा की पार्टियों के सदस्यों के साथ बैठेंगे, फिर चाहे उस गुट के अन्य सदस्य किसी भी देश के हों।

अर्थात् यहाँ पर एक ‘महादेश’ का कारोबार चलाते हुए देशविषयक संकुचित भावनाएँ नहीं देखी जातीं। ‘ईयू’ के सदस्यदेशों ने कोई निर्णय संपूर्ण विचारविनिमय करके लिया है, यानी वह निर्णय ‘ईयू’ का सदस्य होनेवाले मेरे देश के लिए भी ‘ऑटोमॅटिक’ कल्याणकारी होने ही वाला है, यह भावना वृद्धिंगत हुई दिखायी देती है। एक अनुशासनबद्ध समूह के तौर पर काम करना है, तो ‘मेरे देश को इतना ही क्यों, यही क्यों, वही क्यों’ इस तरह के संकुचित सवाल अब धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं।

‘युरोपियन युनियन’
यहाँ पर एक ‘महादेश’ का कारोबार चलाते हुए देशविषयक संकुचित भावनाएँ नहीं देखी जातीं। ‘ईयू’ के सदस्यदेशों ने कोई निर्णय संपूर्ण विचारविनिमय करके लिया है, यानी वह निर्णय ‘ईयू’ का सदस्य होनेवाले मेरे देश के लिए भी ‘ऑटोमॅटिक’ कल्याणकारी होने ही वाला है, यह भावना वृद्धिंगत हुई दिखायी देती है।

जितने देश उतनी संस्कृतियाँ, परंपराएँ, रूढ़ियाँ, पद्धतियाँ होंगी ही और फिर उनके प्रति रहनेवाला गर्व/दुरभिमान भी होगा और फिर एकसाथ आते समय झगड़े भी होने ही हैं। युरोपीय महासंघ में दाख़िल होना चाहनेवाले हर नये राष्ट्र को समा लेते समय ‘ईयू कल्चर’ और उस देश की रूढ़ियाँ-पद्धतियाँ इनमें टकराव होना ही है। लेकिन इसके बावजूद भी, संघ के तौर पर एकसाथ चलते समय ‘गिव्ह अँड टेक’ की नीति अपनानी होगी, यह बात इन सभी राष्ट्रों को मंज़ूर है और अहम बात यह है कि ‘ईयू’ को भी मंज़ूर है। इसलिए ‘ईयू’ ने समय समय पर अपनी नीतियों में, पद्धतियों में, क़ानूनों में समय समय पर बदलाव करके उन्हें फ्लेक्जिबल बनाया – अधिक मज़बूत बनाया। ख़ासकर इन नये नये आज़ाद हुए देशों की आर्थिक स्थिति एकदम ख़राब बन चुकी थी। अंतर्गत विद्रोहों से, धार्मिक-वांशिक युद्धों के कारण ये देश विनाश की ओर निकल पड़े थे। उन्हें अपने पैरों पर खड़ा रहने के लिए कुछ समय लगने ही वाला था। ऐसे देशों को युरोपीय महासंघ का सदस्य बनने से फायदा ही होनेवाला था।

इक्कीसवीं सदी में युरोपीय महासंघ का लक्ष्य प्रायः इस प्रकार का होगा –

*    युरोपीय नागरिकों के जीवन में शांति, प्रगति और स्थिरता लाना।
*    युरोप महाद्वीप का विभाजन हो सके ऐसे मुद्दों को मात देना।
*    युरोप महाद्वीप के नागरिकों को सुरक्षित जीवन प्रदान करना।
*    युरोप महाद्वीप में संतुलित आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा देना।
*    ग्लोबलायझेशन की चुनौती का सामना करना; लेकिन यह करते समय भी युरोप महाद्वीप के लोगों की विभिन्नता को ठेंस न पहुँचाना।
*    युरोप महाद्वीप की पहचान बन चुके मूल्यों को बढ़ावा देना। उदा. विकास की गति को कायम रखना और उसके लिए आदर्श वातावरण का निर्माण करना, मानवी अधिकारों का आदर और आम मनुष्य को केंद्रस्थान में रखकर बनायी हुई मार्केटविषयक आर्थिक नीति।

यह सब कहने-सुनने में अच्छा लग रहा था और मुख्य बात, अपनी समस्याओं का, समूह के रूप में काम करते हुए हल निकालने की युरोपीय राष्ट्रों की इच्छा तो यक़ीनन ही अच्छी थी। लेकिन समूह के तौर पर काम करने की इस इच्छा का मानो इम्तिहान ही ले रही हैं ऐसी कुछ समस्याओं का भी (‘क्रायसिस’) ‘ईयू’ को सामना करना पड़ा।