५२. आधुनिक इतिहास की दहलीज़ पर

इस प्रकार जेरुसलेमस्थित ज्यूधर्मियों ने पुनः ग़ुलामी में ही नये सहस्राब्द में (इसवीसन के दूसरे सहस्राब्द में – मिलेनियम में) प्रवेश किया था| अब गत लगभग ४५० वर्ष मुस्लिमों के विभिन्न खलिफाओं के वंशों का राज्य जेरुसलेम प्रान्त पर था| सारे युरोप भर में तथा मध्यपूर्व में भी अब बायझन्टाईन साम्राज्य को अरब आक्रमकों के सामने, ख़ासकर तुर्की आक्रमकों की ‘सेलजुक’ तुर्की शाखा के आक्रमण के सामने अच्छीख़ासी मात खानी पड़ रही थी| इसवीसन १०८५ तक सेलजुक तुर्की साम्राज्य, उनके तत्कालीन सुलतान मलिक शाह (पहले) के अथक प्रयासों से वैभव की बुलंदी पर पहुँच चुका था| पूर्व की ओर चीन तक तथा पश्‍चिम दिशा में बायझन्टाईन साम्राज्य तक सेलजुक तुर्की साम्राज्य का विस्तार पहुँच चुका था|

इसवीसन १०९२ में सेलजुक साम्राज्य

इसवीसन ११वीं सदी समाप्त होने तक तत्कालीन बायझन्टाईन सम्राट ने ख्रिस्तीधर्मियों के तत्कालीन पोप अर्बन (द्वितीय) को आपत्कालीन सन्देश भेजकर मदद की याचना की| पोप को भी, गत साढ़ेचारसौ साल मुस्लिमों के कब्ज़े में होनेवाली ‘होली लँड’ को (जेरुसलेम को) मुस्लीम आक्रमकों के चंगुल से छुड़ाने का यह अच्छा मौक़ा प्रतीत हुआ और उन्होंने ईसाईधर्मिय लड़ाक़ू सैनिकों की सेनाओं को जेरुसलेम में और बायझन्टाईन साम्राज्य में अन्यत्र भी भेजने की योजना बनायी| इन मुहिमों को आगे चलकर इतिहास में ‘क्रुसेड्स’ नाम से जानीं जाने लगीं| लेकिन उनके पीछे ज्यूधर्मियों की सहायता करने का आदि कोई भी विचार न होकर, केवल ईसाईधर्मियों के लिए पवित्र होनेवाले स्थानों को मुस्लीम आक्रमकों के चंगुल से छुड़ाना और यदि हो सके तो, ईसाईधर्मियों में भी जो विभिन्न विचारधाराएँ उद्गमित होकर एक-दूसरे का ही विरोध करने लगी थीं उन्हें एक करना, यही उद्देश्य थे|

इस योजना के अन्तर्गत पहली क्रुसेडर्स की सेना को इसवीसन १०९५ में जेरुसलेम भेजा गया| जेरुसलेम पर उस समय फातिमी वंश के मुस्लीम खलिफा का राज था| चार सालों की घमासान लड़ाई के बाद इसवीसन १०९९ तक फातिमियों के चंगुल से जेरुसलेम क्रुसेडर्स के नियंत्रण में आई गया और वहॉं लॅटिन ‘किंगडम ऑफ जेरुसलेम’ की स्थापना की गयी|

इसवीसन १०९९ में ईसाईधर्मीय क्रुसेडर्स द्वारा जेरुसलेम जीता गया|

लेकिन यह स्थिति भी क़ायम नहीं रही| कभी मुस्लीम आक्रमक हावी हो गये, तो कभी क्रुसेडर्स| ये क्रुसेड्स अगले लगभग २०० साल चालू रहे और जेरुसलेम का कब्ज़ा कभी मुस्लीम खलिफाओं के पास, तो कभी ईसाई क्रुसेडर्स के पास, ऐसा बदलता रहा|

लेकिन ज्यूधर्मियों को उसका कुछ भी फ़ायदा नहीं हुआ; उल्टा इन क्रुसेड्स के दौरान युरोप भर में कई जगह ज्यूधर्मियों का सैंकड़ों की तादाद में क़त्लेआम किया गया|

इसी बीच, आगे चलकर दुनिया भर में फैले ब्रिटीश साम्राज्य में जो परिवर्तित हुआ, उस मूल ‘इंग्लैंड़ और वेल्स’ के राज्य ने निश्‍चित आकार धारण करने की शुरुआत भी इस इसवीसन ११वीं सदी से ही हुई थी|

इसवीसन १२६० से लेकर १२९१ के बीच मंगोलवंशीय आक्रमकों के हमले इस इलाक़े में शुरू हुए| अत्यधिक खूँखार माने जानेवाले इन मंगोलवंशियों के इस प्रदेश के प्रमुख दुश्मन थे, इजिप्त के ताकतवर ‘मामलुक’ वंश के सुलतान| इस दौर में इन दोनों के बीच घमासान युद्ध हुए और आख़िरकार इसवीसन १२९१ में मामलुकों ने मंगोल आक्रमकों को निर्णायक रूप में परास्त किया और जेरुसलेम पर कब्ज़ा कर लिया| अब जेरुसलेमवर मामलुकों का शासन शुरू हुआ, जो इसवीसन १५१७ तक टिका रहा| मामलुकों के राज में इस भाग को सिरियन प्रांत को जोड़ा गया था|

तब तक, अगले सैंकड़ों साल दुनिया के इतिहास को अलग ही मोड़ देनेवाला घटनाक्रम घटित होने लगा था – ‘ऑटोमन’ साम्राज्य मध्यपूर्व में, ख़ासकर ‘अन्तोलिया’ में (विद्यमान तुर्की में) बलशाली होने लगा था| कॉन्स्टॅन्टिनोपल से सटकर होनेवाले एक छोटे से तुर्की राज्य के राजा ने – ऑस्मॉन (ऑथमॉन) ने १३वीं सदी में बोये एक छोटे से पौधे का, उसने और उसके वंशजों ने अथक परिश्रमों से और पराक्रम से विशाल वृक्ष में रूपांतरण किया था|

इसवीसन १७वीं सदी में ऑटोमन साम्राज्य की व्याप्ति

इसवीसन १५१६-१७ में ऑटोमन साम्राज्य और मामलुकों में युद्ध हुए| लेकिन उस समय तक ऑटोमन साम्राज्य की ताकत इतनी बढ़ गयी थी कि उन्हें रोकना बलशाली मामलुकों को भी मुमक़िन नहीं हुआ और मामलुकों का पूरे इजिप्त तथा आसपास के इलाक़े में होनेवाला साम्राज्य ऑटोमन्स ने निगल लिया|

अब जेरुसलेम का समावेश ऑटोमन साम्राज्य में हुआ था| ज्यूधर्मियों के लिए क्या फ़र्क़ हुआ? कुछ भी नहीं| एक ग़ुलामी में से दूसरी ग़ुलामी में|

अगले लगभग ४०० साल – २०वीं सदी की शुरुआत तक जेरुसलेम ऑटोमन साम्राज्य में ही रहा| इस कालखण्ड में ऑटोमन साम्राज्य ने भी सम्पन्नता की बुलंदी को छू लिया था और तत्कालीन जागतिक महासत्ताओं की टक्कर का उसका स्थान था| साथ ही, शासकों की हर पीढ़ी में नया नैसर्गिक वारिस आते रहने के कारण कभी ख़ास सत्तासंघर्ष भी नहीं हुआ| शासक हालॉंकि मुस्लीम थे, उनके अपने साम्राज्यस्थित ज्यूधर्मियों के साथ ताल्लुकात कभी बहुत ज़्यादा बिगड़े नहीं; वे उस उस वक़्त के सुलतान के स्वभाव पर निर्भर रहे और एखाद अपवाद (एक्सेप्शन) को छोड़ वे अच्छे ही रहे|

लगभग इसवीसन ६८ में भारत स्थित केरल के समुद्री किनारे पर कदम रखे ज्यूधर्मियों का वहॉं के तत्कालीन राजा ने प्यार से स्वागत किया होने के उल्लेख पाये जाते हैं|

दरअसल इसवीसन के पहले सहस्राब्द में विभिन्न आक्रमकों की साम्राज्यविस्तार की मुहिमों के कारण जिन्हें जेरुसलेम से निष्कासित होना पड़ा था ऐसे ज्यूधर्मीय फिर युरोप, एशिया, अफ्रिका महाद्वीपों को विभिन्न भागों में गये और वहॉं पर उन्होंने बसेरा किया| उसके बात के कुछ-सौ साल, वे जहॉं कहीं भी बसे, वहॉं पर अपने मेहनती वृत्ति के कारण उन्होंने आर्थिक दृष्टि से बहुत तरक्की की| धीरे धीरे उन्होंने उस उस जगह के समाजजीवन में और कभी कभी तो राजनीतिक जीवन में भी अहम स्थान प्राप्त किया| कई जगहों के राजाओं के भी वे विश्‍वासपात्र बनकर रहे थे|

लेकिन उनके यह मेहनती वृत्ति, उनका ज्यूधर्मतत्त्वों को जान की बाज़ी लगाकर कसकर पकड़े रहना और स्थानीय अन्यधर्मों का स्वीकार न करना यह सब उस उस जगह के स्थानीय लोगों की आँखों में चुभने लगा| ज्यूधर्मियों की तरक्की स्थानीय लोगों के मत्सर का कारण बनने लगी और वे स्थानीय लोगों के तिरस्कार का कारण बनने लगे तथा उनके विरोध में साज़िशें रची जाने लगीं| उनके विरोध में जगह जगह के शासकों के कान भरे जाने लगे और उन्हें अन्यधर्मियों द्वारा पीड़ा की जाने लगी| उनके बारे में होनेवाले क़ानून अधिक ही स़ख्त बनाये जाने लगे| उनपर मज़बूत कर (टॅक्सेस) थोंपे जाने लगे| उन्हें ‘गौण नागरिक’ का दर्ज़ा दिया जाने लगा|

इसवीसन १४-१५वीं सदी से ये ज्यूविरोध के प्रयास बहुत ही ज़ोर पकड़ने लगे| ‘या तो हमारे धर्म का स्वीकार करो या फिर हमारे देश से चले जाओ’ ऐसी ज़्यादती उनपर की जाने लगी| भारत जैसे देश को छोड़कर, पोर्तुगाल, स्पेन, इटाली, ब्रिटन ऐसे अन्य अधिकांश देशों में उनपर धर्मांतर के लिए दबाव डाला जाने लगा और धर्मांतर न करनेवाले ज्यूधर्मियों के लिए देशनिकाले के स़ख्त क़ानून बनाये जाने लगे|

इससे बचने के लिए कुछ ज्यूधर्मीय अक़्लमंदी से पेश आते थे, ऊपरी तौर पर स्थानिक धर्म को अपनाया दिखाते थे, लेकिन भीतर से ज्यूधर्म का ही पालन करते थे| जो ऐसा कर नहीं पाते थे, उन्हें वह देश छोड़कर जाना पड़ता था| इस तरह जगह जगह से निकल जाने के लिए बताये ज्यूधर्मियों ने, अभी भी जेरुसलेम में जाने जैसे हालात न होने के कारण अब, उस समय के सबसे बड़े होनेवाले ऑटोमन साम्राज्य में पनाह लेने की शुरुआत की और ऑटोमन साम्राज्य ने भी उन्हें अपने में समा लिया| अभी भी ज्यूधर्मियों की हक़ की भूमि उनसे दूर ही थी|

इसवीसन के दूसरे सहस्राब्द की भी लगभग ७-८ सदियॉं बीत चुकी थीं और इसवीसन १८वीं सदी में कदम रखते समय ज्यूधर्मीय आधुनिक इतिहास की दहलीज़ पर खड़े थे|

….लेकिन अब हालात जल्द ही बदलनेवाले थे!(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर