४० . इस्रायल की ‘टेन लॉस्ट ट्राईब्ज्’

लगभग दो सौ वर्ष चल रही अस्थिर राजनीतिक स्थिति के कारण ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ पूरी तरह से बेहाल हुआ था। इस दोसौ वर्ष की कालावधि में इस उत्तरी इस्रायली साम्राज्य ने तो कुल मिलाकर उन्नीस राजाओं का शासन अनुभव किया। इनमें से कुछ खूँखार थे; वहीं, कुछ दुर्बल भी थे और ये दुर्बल राजा केवल उनके पिता राजा होने के कारण, केवल भाग्यवश ही राजसत्ता प्राप्त हुए थे। इन सारी बातों के कारण इस्रायली जनता पूरी तरह ऊब चुकी थी और जनता में असन्तोष बढ़ता ही चला जा रहा था।

इस असन्तोष का बार बार कहीं न कहीं पर विस्फोट हो जाता था और सैनिकी ताकत का इस्तेमाल करके उसे कुचल दिया जाता था। जब ईसापूर्व ८वीं सदी मध्य से आगे बढ़ी, तब तक ‘ज्यूधर्मियों की बग़ावतें और उन्हें कुचल देने के लिए राजा ने की कार्रवाई’ यह बात बिलकुल आम बन चुकी थी। मुख्य बात, राजाओं का अधिकांश समय राज्यशासन चलाने के लिए खर्च होने की अपेक्षा इन्हीं सारीं बातों में गुज़रने लगा था। साथ ही, कहीं पर भी यदि नया खर्च उपस्थित हो जाता था, तो उसे प्रजा पर नये कर (टॅक्सेस) लगाकर ही वसुला जाता था।

इसी दौरान कॅनान प्रान्त के आसपास के इला़के में अब ‘असिरियन’ (‘निओ-असिरियन’) राजसत्ता ‘बॅबिलोनिया’ के साथ साथ आजूबाजू की अन्य छोटीं-मोटीं राजसत्ताओं को निगलकर ताकतवर बन चुकी थी। असिरियनों ने ईसापूर्व ७३२ में ही अरामी टोलीवालों पर आक्रमण करके उनकी राजधानी दमास्कस पर अपना कब्ज़ा स्थापित कर लिया था।

उसके बाद अब ‘असिरियन’ राजसत्ता की नज़र इस तरह दुर्बल बन चुके ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ पड़ी।
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तिगलाथ पिलीसर शाल्मनेसर सारगन-२

वैसे तो असिरियन सेनाओं ने कुछ साल पहले से इस्रायलियों को परेशान करना, अर्थात् उत्तरी इस्रायल प्रान्त को नोंचने की शुरुआत की ही थी। तत्कालीन ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ के राजा अन्दरूनी विद्रोह को कुचलने में इतने उलझ गये थे कि वे इस बाह्य आक्रमण से लड़ने की सोच तक नहीं सकते थे और इस कारण असिरियन राजा को रक्षा हेतु ज़बरदस्त सालाना फिरौती भी दे देते थे। इस ज़बरदस्त फिरौती को भी स्वाभाविक रूप में ज्यूधर्मियों पर भारी मात्रा में कर लगाकर ही वसुला जा रहा था।

लेकिन ‘तिगलाथ पिलीसर’ नामक इस पुराने असिरियन राजा की मृत्यु के बाद इस्रायल के तत्कालीन राजा ने नये असिरियन राजा के खिलाफ़ बग़ावत करके उसे फिरौती देने से इन्कार कर दिया। इससे, नये आये और तिलगाथ पिलीसर जितने ही खूँखार होनेवाले ‘शाल्मनेसर’ इस असिरियन राजा ने ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ पर ईसापूर्व ७२२ में बड़ा आक्रमण किया। लेकिन उसकी भी इस आक्रमण के दौरान अचानक मृत्यु हो गयी। उसके बाद आये नये असिरियन राजा ने – ‘सारगन-२’ ने ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ के सारे ही प्रदेश पर कब्ज़ा कर लिया और राजधानी समारिया का ध्वंस किया। इस प्रकार, मूल अखण्डित इस्रायली साम्राज्य के जो दो टुकड़ें हुए थे, उनमें से ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुका था।

साथ ही, असिरियन राजाओं ने, इससे पहले उन्होंने युद्ध में जीते किसी भी प्रदेश के बारे में जो नीति अपनायी थी, उसका यहाँ पर भी इस्तेमाल किया। समूह में रहते मनुष्य और भी ढ़ीठ हो जाता है और उसका बर्ताव अलग रहता है, इस बात को उन्होंने जान लिया था। इस कारण, किसी जीते हुए प्रदेश की जनता के मन में होनेवाला गुस्सा, बदले की भावना, देशप्रेम आदि बातें सामूहिक रूप न धारण करें इसलिए ये असिरियन राजा हमेशा ही, जीते हुए प्रदेश की आम जनता को उनके साम्राज्य के किसी अन्य दूर के भाग में स्थानांतरित कर देते थे और दूर के किसी प्रदेश की जनता को इस भाग में लाकर बसा देते थे। साथ ही, जनता पर प्रभाव रहनेवाले स्थानीय नेताओं के जनता से अलग कर देते थे और उसीके साथ, बुद्धि के काम करनेवालों को राजधानी में ले जाकर उनकी बुद्धि का उपयोग अपने राज्य के लिए कैसे किया जा सकता है, यह देखते थे।
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दरअसल आगे चलकर समय की धारा में, अलग अलग जागतिक सत्ताओं ने, दुनिया के दूरदराज़ के कोनों में स्थापित किये और बढ़ाये अपने अपने साम्राज्य को बरक़रार रखने के लिए जिन तन्त्रों (टेक्निक्स) का इस्तेमाल किया (उदा. ‘डिव्हाईड अँड रूल’), उनका उद्गम; असिरियन लोगों द्वारा अपनाये गये इस – ‘किसी प्रदेश की जनसांख्यिकी संरचना (डेमोग्राफी) ही बदल देने की’ नीति में है, ऐसा कई विश्‍लेषकों का मानना है।

इस इस्रायली जनता के साथ भी असिरियनों ने वही किया। उन्होंने इस ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ पर विजय प्राप्त करने के बाद, वहाँ की अधिकांश इस्रायली जनता को हज़ारों की तादाद में उनके उनके आवासस्थल से दूर (यहाँ तक कि बिलकुल मिड्लईस्ट के प्रदेशों के दूरदराज़ के कोनों में भी) ले जाकर रख दिया; ताकि उनका अन्य ज्यूबाँधवों के साथ कम से कम संपर्क रहें। फिर उन्हें वहाँ भी सुस्थिर होने न देते हुए, कुछ समय बाद उन्हीं में से कुछ लोगों को और दूसरे प्रान्त में स्थानान्तरित किया और उनके स्थान पर अपने ही किसी दूसरे जीते हुए प्रदेश से, वहाँ की दूसरीं टोलियों के लोगों को स्थानान्तरित किया।

इस तन्त्र (टेक्निक) का इस्तेमाल करने के कारण कुछ अरसे बाद मूल दस इस्रायली ज्ञातियों नामोंनिशान तक ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ में नहीं बचा और वे इतिहास के पन्नों से मानो ग़ायब ही हो गयीं, ऐसा कहा जाता है। कई सदियों बाद अभ्यासकों ने इस इला़के में गहरा संशोधन करके उनकी खोज शुरू की, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जो लोग इन ज्यूधर्मीय ज्ञातियों में से हैं ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही थी, उनकी संकल्पनाओं-आचारों-विचारों में भी, कई पीढ़ियों पर हुआ विभिन्न स्थानिक प्रभावों के कारण ज़मीन-आसमान का बदलाव आया था। लेकिन समय समय पर – ‘हम इन दस लॉस्ट ट्राईब्ज के वंशज हैं’ ऐसा दावा करनेवाले भी कई ज्यूधर्मीय सामने आये।
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इस कारण सॉलोमन के पश्‍चात् अखण्डित इस्रायल में से बाहर निकलकर ‘किंगडम ऑफ इस्रायल’ की स्थापना कीं हुईं इन दस मूल ज्यू ज्ञातियों को आज ‘टेन लॉस्ट ट्राईब्ज ऑफ इस्रायल’ ऐसा कहा जाता है और आज के ज्यूधर्मीय ये अधिकांश, शेष दो यानी ज्युडाह तथा बेंजामिन इन ज्ञातियों में से ही हैं, ऐसा दावा कई अभ्यासकों द्वारा किया जाता है।

लेकिन वे हमारे बांधव (‘टेन लॉस्ट ट्राईब्ज ऑफ इस्रायल’) फिर एक बार हममें सम्मिलित होनेवाले हैं, ऐसा गहरा विश्‍वास भी कई कट्टर ज्यूधर्मीय ज़ाहिर करते हुए दिखायी देते हैं।

ज्यूधर्मियों के १३ मूल विश्‍वासों में से एक यह है कि एक दिन ईश्‍वर अपने प्रेषित (‘मसीहा’) को, दुनियाभर में बिखरीं इस्रायली सन्तानों को एक करने के लिए पृथ्वीलोक पर भेजनेवाला है, जो सभी इस्रायली बांधवों को एकत्रित करेगा और जिनमें ये ‘टेन लॉस्ट ट्राईब्ज’ भी होंगी!(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर